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मुंहतोड़ जवाब जरूरी: आतंकियों को स्थानीय समर्थन के सुबूत मिलना कठिन.., अब सीएम-एलजी मिलकर बनाएं भरोसे का माहौल
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पहलगाम में आतंकी हमला (फाइल)
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
आतंकवाद, जो वास्तविकता में जम्मू-कश्मीर से कभी गया ही नहीं था, इस अशांत क्षेत्र में फिर घातक रूप में लौट आया है। इस बार फिर इसने नागरिकों और देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों को निशाना बनाया है, जिसे जम्मू-कश्मीर के 35 साल के आतंकवादी दौर का पर्यटकों पर हुआ सबसे बड़ा हमला बताया जा रहा है। कई भयावह दृश्यों में से एक शोक संतप्त महिला का अपने घायल या मृत पति के शव के पास बैठना लोगों की सबसे बुरी यादों में हमेशा के लिए शामिल हो गया है।
पहलगाम हमले ने कई तरह की चुनौतियां पैदा की हैं, जो राज्य से एक दृढ़ और बहुआयामी समाधान की मांग करती हैं। छह साल पहले जम्मू-कश्मीर के सर्वांगीण विकास और उसे राजनीतिक तौर पर स्थिर बनाने के उद्देश्य से उसका विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किया गया। इससे यहां चुनावों का मार्ग प्रशस्त हुआ और दुनिया को भी यह आश्वासन दिया गया कि यह क्षेत्र, जिसे कई लोग विवादित मानते थे, शेष भारत के साथ जुड़ रहा है।
फिलहाल, जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए शांति अब भी कुछ दूर है, जबकि आतंकवाद पूरी तरह कायम है। पर्यटन इस राज्य की रीढ़ है, परंतु पर्यटन के लिहाज से चरम सीजन में यह फिर बाधित हुआ है, और घरेलू व विदेशी, दोनों पर्यटक लौटने लगे हैं, जिससे वे स्थानीय परिवार यकीनन प्रभावित होंगे, जो पर्यटन पर आश्रित हैं। पहलगाम की बैसरन घाटी में मंगलवार को हुए आतंकी हमले ने दुनिया को भारत के ‘स्विट्जरलैंड’ या ‘धरती के स्वर्ग’ के सबसे खूबसूरत और वनों से भरे पर्यटन स्थलों में से एक तक पहुंचने से रोकने का काम किया है।
प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के सबसे समृद्ध मुस्लिम राष्ट्रों में से एक सऊदी अरब के पूर्ण समर्थन के वादे के साथ अपनी आधिकारिक यात्रा बीच में स्थगित कर भारत लौट आए हैं। उन्होंने दिल्ली एयरपोर्ट पर ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल समेत तमाम अधिकारियों के साथ बैठक की। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से अपनी अमेरिका यात्रा बीच में ही रोकने के लिए बोला गया है। शीर्ष अधिकारियों ने तत्काल कार्रवाई शुरू की है, जिसका नतीजा यह हुआ कि पहलगाम हमले के एक दिन बाद ही बारामूला के उरी में मुठभेड़ में दो आतंकवादियों को मार गिराया गया है।
पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-ताइबा (एलईटी) से जुड़े एक संगठन जिसे द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) के नाम से जाना जाता है, ने कथित तौर पर हमले की जिम्मेदारी ली है। इस तरह के कृत्यों, दावों और आतंकवादियों को स्थानीय समर्थन के सुबूत मिलना भले ही कठिन हो, लेकिन इस चुनौती का शीघ्र और मुंहतोड़ जवाब देना बहुत जरूरी है।
रिकॉर्ड बताते हैं कि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे का ‘अंतरराष्ट्रीयकरण’ करने का बार-बार प्रयास करता रहा है, जिसमें सबसे ताजा प्रयास उसके सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर का वह भड़काऊ भाषण है, जिसमें वह कश्मीर को पाकिस्तान के ‘गले की नस’ बताते हुए हिंदुओं पर मुस्लिम ‘श्रेष्ठता’ की बातें करते हैं। हालांकि, इसका उद्देश्य महज भारत को भड़काना और पाकिस्तान में चल रहे आर्थिक संकट से वहां के लोगों का ध्यान भटकाना ही था। यह तब है, जब इस्लामिक देशों के संगठन (आईओसी), मुस्लिम उम्माह (वैश्विक मुस्लिम समुदाय) और पूरा विश्व समुदाय भी इस विवाद में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के कुत्सित प्रयास पाकिस्तान तब ही करता है, जब भारत में चुनाव हों या फिर कोई बड़ी हस्ती देश का दौरा कर रही हो। अनंतनाग में एक ऐसा ही प्रयास तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की यात्रा के दौरान हुआ था, जिसके बाद उन्होंने पाकिस्तान की निंदा की थी। पहलगाम हमला भी ऐसे वक्त में किया गया है, जब अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भारत दौरे पर हैं और प्रधानमंत्री मोदी रियाद में थे। भारत के साथ व्यापार करने के सऊदी अरब के संकल्प पर पाकिस्तान की नाराजगी जगजाहिर है। यह सऊदी-पाकिस्तान का मुद्दा तब बन गया था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने कश्मीर पर आईओसी की बैठक का समर्थन न करने के लिए रियाद की आलोचना की थी। खाड़ी देशों द्वारा व्यापार के लिए भारत और कार्य वीजा के लिए भारतीयों को प्राथमिकता दिए जाने से भी पाकिस्तान में हताशा है।
पहलगाम में हुए हमले की समय-योजना का विश्लेषण करें, तो ऐसा लगता है कि हमले की पूरी साजिश रची गई थी। आतंकवादियों के पास एम-4 कार्बाइन सहित अत्याधुनिक हथियार थे। आतंकवादियों ने एक ऐसी जगह चुनी, जहां वाहन नहीं चल सकते, वहां केवल पैदल और टट्टू से पहुंचा जा सकता है। पर्यटकों से उनके नाम पूछे गए, जाहिर तौर पर उनके धर्म के बारे में जानने के लिए और देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले हिंदुओं को अलग से चुना गया।
जैसा शुरुआती रिपोर्टें इशारा भी कर रही हैं, इस मामले में सुरक्षा तंत्र की चूक भी हो सकती है, जहां दो हजार से ज्यादा पर्यटक थे, वहां पर सेना या पुलिस की उपस्थिति अपर्याप्त थी। लेकिन अच्छी बात यह है कि जम्मू-कश्मीर के अनेक निवासियों ने विभिन्न स्थानों, जैसे-बारामूला, श्रीनगर, पुंछ और कुपवाड़ा में कैंडल मार्च निकालकर आतंक का विरोध जताया। जम्मू में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने रैली निकालकर आतंकी हमले का विरोध किया। पहलगाम का हमला ऐसे वक्त में हुआ है, जब दुनिया के कई देश टैरिफ युद्ध से परेशान चल रहे हैं और पश्चिम एशिया व यूरोप में संघर्ष जारी हैं। इसके बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में साथ देने का वादा किया है, जबकि उपराष्ट्रपति वेंस ने पीड़ितों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भी समर्थन मिला है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने किसी भी परिस्थिति में हमले को अस्वीकार्य बताते हुए पीड़ित परिवारों के प्रति शोक जताया है।
जम्मू-कश्मीर में, जहां एक दशक के बाद पिछले साल चुनाव हुए, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि यह हमला ‘हाल के वर्षों में नागरिकों पर किए गए किसी भी हमले से कहीं बड़ा था।’ यह मुश्किल होगा, लेकिन उन्हें लोगों को साथ लेकर चलना होगा और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के साथ मिलकर स्थिति को और बिगड़ने से बचाने के लिए एक भरोसे का माहौल बनाना होगा।