क्योंकि हम अमेरिका नहीं हैं
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कल 9/11 हमले के सत्तरह वर्ष पूरे हो रहे हैं। न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में उन लोगों के परिजन फिर से इकठा होंगे, जो 11 सितंबर, 2001 को बेमौत मारे गए थे। उनके नाम पढ़े जाएंगे और उनको बिल्कुल वैसे ही याद किया जाएगा, जैसे उस दर्दनाक घटना के एक वर्ष बाद याद किया गया था। इस स्मरण समारोह में अमेरिका के बड़े राजनेता भाग लेंगे, क्योंकि वे ऐसी घटनाओं को याद रखना बहुत जरूरी मानते हैं। अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को खोजना तब तक बंद नहीं किया, जब तक उसे पाकिस्तान की एक छावनी में पकड़ कर मारा नहीं गया। जितने भी आतंकवादी 9/11 की साजिश में शामिल थे, उन सबको खोज-खोजकर दंडित किया गया है। कई अन्य जेहादी साजिशें होने से पहले ही रोक दी गई हैं, क्योंकि अमेरिका ने 9/11 को कभी भुलाया नहीं।
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भारत में ऐसा नहीं होता है। हम जेहादी आतंकवाद की घटनाओं को याद रखना नहीं, भुलाना पसंद करते हैं। याद रखते हम, तो आज तक टाइगर मेमन को हमारी खुफिया संस्थाओं ने पकड़ कर दंडित कर दिया होता। याद रखते, तो मौलाना अजहर मसूद संसद पर हमले के सत्तरह वर्ष बाद आजाद नहीं घूम रहा होता। हाफिज सईद राजनीतिक दल का प्रधान न बन गया होता पाकिस्तान में। हमारी समस्या यही है कि हम बहुत जल्दी उन घटनाओं को भूल जाते हैं, विकसित देश जिन्हें याद रखते हैं।
हमारी समस्या यह भी है कि न्याय की गाड़ी यहां बैलगाड़ी की चाल से चलती है। सो मुंबई में 1993 में हुए आतंकवादी हमले पर फैसला आने में बीस वर्ष से ज्यादा लग गए। पिछले सप्ताह उन आतंकवादियों को सजा मिली, जिन्होंने 2009 में हैदराबाद में बम विस्फोट किए थे, जिसमें 44 लोग मारे गए थे और 68 घायल हुए थे। पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय के अगले प्रधान न्यायाधीश के तौर पर न्यायमूर्ति रंजन गोगोई का नाम सुझाया गया है। वह उन जजों में थे, जिन्होंने इस वर्ष की शुरुआत में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर सर्वोच न्यायालय की पीठों के चयन को लेकर शिकायत की थी। मैं उन लोगों में से हूं, जो मानते हैं कि ऐसा करके उन न्यायाधीशों ने सर्वोच न्यायालय का कद नीचा किया, क्योंकि इनकी शिकायतें गंभीर नहीं थी और न जनता के हित में था उनका पर्दाफाश।
वे अगर इस बात पर शिकायत करते कि आतंकवाद, हत्या और बलात्कार जैसे संगीन मामलों में अदालती कार्रवाई की एक समय सीमा तय होनी चाहिए, तो इससे देश का भला होता। वे अगर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर समझाते कि अदालतों में मुकदमों को इतने दशक क्यों लगते हैं, तो देश का भला होता। सो, क्या अगले प्रधान न्यायाधीश से हम आशा कर सकते हैं कि वह इन चीजों पर ज्यादा ध्यान देंगे? क्या हम उनसे उम्मीद रख सकते हैं कि भविष्य में कम से कम जेहादी आतंकवादियों को कई-कई वर्ष जेलों में रखा नहीं जाएगा?
याद रखिए कि मौलाना मसूद अजहर और उमर शेख को आईसी, 814 के यात्रियों के बदले में रिहा करने से पहले पांच वर्ष से ज्यादा समय तक हमारी जेलों में रखा गया था। ऐसा उन्हीं देशों में होता है, जहां याद करने के बदले शासक भुलाने की आदत डाल लेते हैं। ऐसा उन देशों में नहीं होता, जहां दशकों बाद भी वे नाम याद किए जाते हैं, जो आतंकवादी हमलों में बेमौत मरते हैं। ये लोग देश के लिए शहीद होते हैं, पर पता नहीं क्यों, इनकी शहादत को हम शहादत नहीं मानते। कल न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में जो स्मरण समारोह होंगे, उन्हें जरूर देखना चाहिए और ध्यान देना चाहिए कि किस तरह वहां हर शहीद को नाम लेकर याद किया जाता है।