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जमीन के बंजर होने से पहले
नितिन यादव
Updated Fri, 28 Dec 2012 12:32 AM IST
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आपकी थाली में क्या जहर है? यह सवाल अक्सर विज्ञापनों की पंच लाइनों से लेकर अखबारों की सुर्खियां बना रहता है। कई मेडिकल रिपोर्ट यह कह चुकी हैं कि खाने के उत्पादों में बढ़ते रसायनों के प्रयोग के कारण मानव शरीर में कई प्रकार की विसंगतियां हो रही हैं। पर ऐसा क्यों हो रहा है? किसी किसान से आप पूछिए कि क्या खेती-किसानी फायदे का सौदा है, तो जवाब 'न' में ही आएगा।
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नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट भी यह कह चुकी है कि हमारे देश में लगभग 50 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। अब किसानों की इस स्थिति पर देश के क्या हालात होंगे, जबकि देश की जीडीपी में कृषि का योगदान 17.8 प्रतिशत है। इतना ही नहीं, देश की 60 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। ऐसे में यदि खेती-किसानी पर संकट आ जाएगा, तो इतनी बड़ी आबादी का क्या होगा? किसी भी गांव का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाती है कि अब जोत की जमीन घटती जा रही है। एनएसएसओ अपनी रिपोर्ट में यह कह चुका है कि देश में 80 प्रतिशत से भी अधिक छोटे किसान हैं। रसायनों के अंधाधुंध उपयोग के कारण फसल चक्र बिगड़ता जा रहा है। अब ऐसे में घटती जोत और रसायनों के प्रयोग से बचकर बेहतर खेती-किसानी कैसे की जाए?
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जमीन को बचाने के लिए ऑर्गेनिक क्रांति की बात कही गई। ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारी तौर पर कई इंतजाम करने का दावा किया गया। राष्ट्रीय जैविक केंद्र के साथ-साथ छह क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना भी की गई। सरकार की कवायदों का कितना असर हुआ, इसका आकलन करना तो बहुत कठिन है, लेकिन कुछ निजी हौसलों के कारण अवश्य जैविक क्रांति में आहुति डल रही है।
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मेरठ के गांव भटीपुरा के किसान वीरेंद्र सिंह को क्या नजीर नहीं बनाया जाना चाहिए, जो अपने उपयोग के लिए जैविक खेती करते हैं और उनके परिवार के लोग केवल जैविक उत्पाद ही खाते हैं। गांव मउखास में एक किसान रणबीर तोमर केवल एक एकड़ जमीन के बल पर उद्यमी बनने की राह पर चल रहे हैं। उन्होंने गेहूं-गन्ने की खेती से हटकर हल्दी, आलू और लहसुन का जैविक तरीके से उत्पादन किया। ऐसे में जब जब कम होती जोत की जमीन चिंता का विषय बन रही हो, तो रणबीर तोमर का यह उदाहरण एक आस तो जगाता ही है। हमारे देश में किसानों के उत्पादों को सुरक्षित रखना भी एक बड़ी समस्या है।
छोटे किसान कोल्ड स्टोरेज आदि का खर्च नहीं उठा पाते हैं और इसलिए बिचौलियों को औन-पौने दामों में अपनी फसल बेच देते हैं। मेरठ के ही गांव धनपुरा के एक किसान बिजेंद्र सिंह ने जब जैविक तरीकों से प्याज उगाया, तो वह रासायनिक तरीकों से उगाए गए प्याज के मुकाबले अधिक दिनों तक सुरक्षित रहा। इस वर्ष कम बारिश हुई, तो देश में किसानों में हाहाकार मच गया। ऐसे में यह आंकड़ा राहत दे सकता है कि ऑर्गेनिक ढंग से पैदा की जा सकने वाली फसलों में पानी की आवश्यकता रासायनिक खेती की अपेक्षा 30 से 35 प्रतिशत कम रहती है। ये उदाहरण बेशक कम हैं।
किसान रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग कर अपनी हसरतों के आकाश को पाना चाहता है। पर क्या, उसके इन सपनों की आंधी में उस पर निर्भर रहने वाली 60 प्रतिशत जनता नहीं उड़ जाएगी? आज अधिक उत्पादन के लिए रसायनों का प्रयोग हो रहा है, लेकिन जब जमीन ही बंजर हो जाएगी, तो किसान बोएगा क्या और हम खाएंगे क्या? क्या हमारे नीति निर्माता तभी जागेंगे, जब हम दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे?
सरकारें सहकारी समितियों पर रासायनिक खाद उपलब्ध कराती हैं और उम्मीद करती हैं कि जैविक खेती को बढ़ावा मिले। सरकारी वायदों और सामाजिक संगठनों के इरादों के सहारे कई किसानों ने जैविक खेती का रास्ता अपनाया, पर उचित प्रोत्साहन न मिलने के कारण वे फिर वापस रासायनिक खेती करने पर ही मजबूर हो गए। समय रहते सही नीतियों का निर्माण नहीं हुआ तो फिर वीरेंद्र सिंह, बिजेंद्र और रणबीर तोमर जैसे उदाहरण भी शायद हमारे पास न रहे। थाली में परोसे गए जहर खाने के अलावा हमारे पास कोई और चारा न हो।