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बांग्लादेश: शेख हसीना को चरम भ्रष्टाचार और विकराल बेरोजगारी पर पाना होगा काबू तभी दे पाएंगी नया संदेश
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बांग्लादेश में आरक्षण को लेकर भड़की हिंसा
- फोटो :
PTI
विस्तार
बांग्लादेश एक बार फिर संकट के कगार से वापस लौट आया है, जिसमें न्यायालय के उस निर्णय से मदद मिली है, जिसमें 1971 में पाकिस्तान के साथ मुक्ति युद्ध में संघर्ष करने वाले लोगों के वंशजों के लिए शैक्षणिक संस्थानों एवं नौकरियों में आरक्षण कोटे में भारी कटौती की गई है। अदालत ने स्वतंत्रता सेनानियों के कोटे को 30 फीसदी से घटाकर पांच फीसदी कर दिया है, जबकि नस्लीय अल्पसंख्यकों के दो फीसदी के कोटे को बरकरार रखा है और योग्यता आधारित चयन के लिए 93 फीसदी सीटें खुली रखी हैं।
शीर्ष अदालत ने आरक्षण को पूरी तरह खत्म नहीं किया, बल्कि निचली अदालत के उस फैसले को रद्द किया है, जिससे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था। शीर्ष अदालत के इस फैसले ने शेख हसीना सरकार और आंदोलनकारी छात्रों, दोनों की प्रतिष्ठा बचाई है। लेकिन काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि हसीना सरकार, जो विरोध प्रदर्शन की गंभीरता का आकलन करने में पूरी तरह विफल रही, बाद के हालात से कैसे निपटती है। यह एक लंबी प्रक्रिया की केवल शुरुआत है, जबकि सभी स्तरों पर भ्रष्टाचार और युवाओं में बेरोजगारी जैसे गहरे कारण अब भी बने हुए हैं।
हसीना के इस बयान ने भी आंदोलन को हवा दी कि 'अगर स्वतंत्रता सेनानियों को नहीं, तो क्या रजाकारों के लिए आरक्षण होना चाहिए।' उनका यह बयान इस्लामवादियों के खिलाफ उनके राजनीतिक हमले का एक हिस्सा था, जो अंदर और बाहर से उन्हें चुनौती देते रहते हैं। ‘रजाकार’ उन समूहों को कहा जाता है, जिनका इस्तेमाल पाकिस्तानी अधिकारियों ने 1971 में बांग्लादेश के हितों के खिलाफ किया था। इसने आंदोलनकारियों को भड़का दिया, जो किसी भी राजनीतिक दल के साथ संबद्धता से इन्कार करते हैं। लेकिन बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के आंदोलन का एक लंबा इतिहास है, जिन्हें कथित रूप से बाहर से बढ़ावा मिलता है, जो किसी भी विरोध प्रदर्शन को हथिया लेते हैं और मौजूदा प्रदर्शन इसका अपवाद नहीं है।
आंदोलनकारी छात्र आरक्षण की इस व्यवस्था को भेदभावपूर्ण मानते हैं और योग्यता के आधार पर भर्ती की मांग करते हैं। आजादी के बाद से यह बांग्लादेश का सबसे खराब संकट है, जिसमें अनुमानतः 100 से 130 लोगों की मौतें हुई हैं (आलोचकों का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक है)। आंदोलन कई हफ्तों तक चला। इस आंदोलन में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया, जमात-ए इस्लामी एवं अन्य सामाजिक रूप से शक्तिशाली इस्लामी कट्टरपंथी समूहों की भूमिका देखी जा सकती है।
पंद्रह साल से अधिक समय से लगातार सत्ता में काबिज हसीना, दुनिया की सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली महिला नेता हैं, जो वस्तुतः एकतरफा शासन करती हैं और उन पर तानाशाही के आरोप हैं। उन्हें बढ़ते मध्यम वर्ग से भी निपटना है, जो उनकी सरकार की आर्थिक प्रगति से मजबूत हुआ है, जो महत्वाकांक्षी है और नौकरी व बेहतर जीवन चाहता है। मुक्ति आंदोलन बांग्लादेशियों की भावनात्मक जीवन रेखा है, लेकिन आबादी के एक बड़े वर्ग ने उसमें भाग नहीं लिया था। इसी वर्ग की तीसरी पीढ़ी स्वतंत्रता सेनानियों एवं उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ियों को मिलने वाले आरक्षण को गैर-जरूरी मानती है, और अपनी कीमत पर कुछ लोगों को विशेषाधिकार दिए जाने से नाराज है।
17 करोड़ की आबादी वाले इस दक्षिण एशियाई राष्ट्र में आंदोलन कोई नई बात नहीं है, पिछले हफ्ते के प्रदर्शन जितने तीव्र थे, वैसे आज तक नहीं देखे गए। हालांकि 2009 में शेख हसीना के सत्ता में लौटने के बाद से बांग्लादेश तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन अन्य विकासशील देशों की तरह इसने पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं की है। यह कोविड-19 महामारी के कारण मंदी से जूझ रहा था, जब यूक्रेन युद्ध के कारण तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। एक अनुमान के मुताबिक, 1.8 करोड़ बांग्लादेशी युवा रोजगार की तलाश में हैं।
कम पढ़े-लिखे की तुलना में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं में बेरोजगारी दर ज्यादा है। यह संकट मुल्क में सामाजिक बदलाव की स्थिति को भी दर्शाता है। पिछले आंदोलनों का नेतृत्व सरकारी विश्वविद्यालयों ने किया था, लेकिन इस बार निजी विश्वविद्यालयों की भागीदारी भी बराबर रही, जहां धनी परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं। इस संकट ने बांग्लादेश के पड़ोसी देशों को भी चिंतित किया। वास्तव में यह आंदोलन तभी पनपने लगा था, जब हाल ही में हसीना ने दो बार भारत का दौरा किया। हसीना सरकार के प्रति दोस्ताना रवैया रखने वाले भारत ने इसे बांग्लादेश का अंदरूनी मामला बताया है, जबकि बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करने वाले भारत के पूर्वोत्तर राज्यों ने नेपाली, भूटानी एवं अन्य राष्ट्रों के छात्रों को वहां से निकलने में मदद की। 4,300 किलोमीटर की सीमा के दोनों ओर 600 से ज्यादा ट्रक फंसे हुए हैं, जिससे व्यापार और मानव आवाजाही प्रभावित हो रही है।
विधायिका एवं कार्यपालिका पर काफी पकड़ रखते हुए भी हसीना मदद के लिए न्यायपालिका पर निर्भर थीं। उनकी सबसे बड़ी चुनौती हर स्तर पर फैला भ्रष्टाचार है, जिसके कारण देश ही नहीं, विदेश में भी उनकी आलोचना होती है। आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेश के जन्म के साथ ही जिस तरह से शासन चलाया जाता रहा है, उसमें भ्रष्टाचार व्याप्त है, जिसका फायदा सत्ता केंद्र के आसपास के लोग तो उठाते ही हैं, प्रशासन एवं बढ़ते व्यवसायी वर्ग भी उठाते हैं।
पिछले हफ्ते हसीना ने कहा कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई कर रही हैं और यह बहुत पुरानी समस्या है। उन्होंने अपने एक घरेलू सहायक (चपरासी) के खिलाफ कार्रवाई की, क्योंकि उसने कथित तौर पर 3.4 करोड़ डॉलर जमा कर लिए थे। बांग्लादेशी मीडिया का कहना है कि इतनी धनराशि केवल सरकारी ठेकों के लिए पैरवी, भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी से ही जमा की गई होगी। सत्ता में उनका लंबे समय तक बने रहना आकांक्षाओं और गुस्से, दोनों को जन्म देता है। यह संकट हसीना के लिए चेतावनी है कि अगर वह देश को मध्यम आय वाला राष्ट्र बनाना, इसे बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथियों से सुरक्षित रखना और अपने पिता व बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की विरासत को पूरा करना चाहती हैं, तो उन्हें कई मुद्दों से निपटना होगा।