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शिकार बनीं हसीना: छात्र आंदोलन की आग में कई ताकतें रोटियां सेंकीं; भू-राजनीतिक पेचीदगियां भी बेहद चुनौतीपूर्ण
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शेख हसीना (फाइल)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
इसमें तनिक भर भी संदेह नहीं है कि शेख हसीना के नेतृत्व में दक्षिण एशिया में उभर रही राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय सहयोग कई देशों की आंखों में चुभ रहा था। भारत के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों ने न केवल विद्रोह और आतंकवाद से ग्रस्त क्षेत्र में व्यवस्था कायम की, साथ ही, आर्थिक समृद्धि को भी बढ़ावा दिया। ऐसे परिदृश्य में जब वह इसी वर्ष जून से पहले बांग्लादेश पर मजबूती से नियंत्रण रखती दिखाई दी हों, तो उनके तख्तापलट में विदेशी भागीदारी के होने का संदेह जताया जाना, चौंकाता नहीं है।
हसीना के तख्तापलट में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका जताने वाले अक्सर अमेरिका को प्रमुख संदिग्ध के रूप में इंगित करते हैं। दरअसल, बांग्लादेश की आजादी से भी पहले वहां के एक सैन्य अड्डे पर अमेरिका की नजर है। इसके पुख्ता प्रमाण हैं कि पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मुक्ति संग्राम के दौरान अमेरिका ने सेंट मार्टिंस द्वीप पर सैन्य अड्डा स्थापित करने की अनुमति के बदले पूर्वी पाकिस्तानी नेताओं को समर्थन की पेशकश की थी। यह बात दीगर है कि इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया। लेकिन बांग्लादेश की आजादी के बाद भी अमेरिका इसके लिए प्रयास करता रहा। यह मुद्दा खासकर वरिष्ठ अमेरिकी सैन्य अधिकारियों की बांग्लादेश यात्रा के दौरान द्विपक्षीय यात्राओं में अक्सर उठता रहा। हाल ही में शेख हसीना ने भी खुलासा किया था कि अमेरिका के एक प्रतिनिधि ने बांग्लादेश में अमेरिकी सैन्य अड्डे के प्रस्ताव के साथ उनसे संपर्क किया था। हालांकि अपने राष्ट्रवादी रुख और अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान की विरासत को लेकर अपनी प्रतिबद्धता का हवाला देते हुए उन्होंने अमेरिका के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उन्होंने यह भी कहा था कि वह सत्ता में बने रहने के लिए बांग्लादेश को नहीं बेचेंगी। इसके अतिरिक्त, अमेरिका बांग्लादेश को अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति में शामिल करने की भी कोशिश कर रहा है, जिसका लक्ष्य अमेरिका के साथ उसके रक्षा संबंधों को मजबूत करना और उसे सैन्य उपकरण बेचना है। बांग्लादेश ने अमेरिकी हथियारों में तो रुचि दिखाई, लेकिन उन्हें इंडो-पैसिफिक ढांचे के तहत खरीदने से इन्कार किया, क्योंकि उसे डर था कि इससे उसका प्राथमिक सैन्य आपूर्तिकर्ता चीन नाराज हो जाएगा।
हसीना को सत्ता से बेदखल करने में एक और विदेशी शक्ति के शामिल होने का संदेह है और वह है चीन। बहुआयामी संबंधों के बावजूद भारत और बांग्लादेश की बढ़ती निकटता से चीन के असंतोष का बढ़ना छिपा नहीं है। कई रिपोर्ट तो यह खुलासा भी करती हैं कि चीन ने हसीना को सलाह दी थी कि वह अपनी चीन यात्रा से पहले भारत की यात्रा न करें। हालांकि हसीना ने चीन की सलाह को नजरअंदाज कर दिया था।
चीन मुख्य रूप से अपनी बेल्ट ऐंड रोड पहल (बीआरआई) परियोजनाओं और देशों के साथ व्यक्तिगत सैन्य सहयोग के माध्यम से दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने का इच्छुक रहा है। गौरतलब है कि चीन और भारत दोनों ने बांग्लादेश में तीस्ता नदी पर जल प्रबंधन परियोजना में रुचि जताई है। हालांकि अपनी भारत यात्रा के दौरान शेख हसीना ने यह पुष्टि की थी कि वह भारत के साथ संवेदनशील और राजनयिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए इस परियोजना को भारत को सौंपेंगी। दरअसल, बांग्लादेश की भविष्य की जल संबंधी जरूरतों के लिहाज से तीस्ता नदी के ऊपरी तटवर्ती देश के रूप में भारत का सहयोग महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, श्रीलंका के कर्ज संकट के बाद दक्षिण एशियाई देश चीन से कर्ज लेने में जो अतिरिक्त सावधानी बरतते हैं, उसने भी हसीना के निर्णय में बड़ी भूमिका निभाई।
जुलाई की अपनी चीन यात्रा के दौरान बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा संकट को कम करने के लिए पांच अरब डॉलर के कर्ज को हासिल करने की हसीना की उम्मीदें तब धराशायी हो गईं, जब चीन ने महज दस करोड़ डॉलर की पेशकश की। यही नहीं, उन्हें अपेक्षित प्रोटोकॉल भी नहीं मिला। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उन्हें पर्याप्त समय तो नहीं ही दिया, चर्चा को आगे बढ़ाने का दायित्व भी प्रधानमंत्री ली केकियांग पर छोड़ दिया। निराश होकर हसीना को अपना दौरा छोटा करना पड़ा। चीन के इस तरह के व्यवहार से गहरी रणनीतिक गणनाओं के संकेत मिलते हैं, जो उनके तख्तापलट में चीन की भागीदारी के बारे में लगाए जा रहे अनुमानों को मजबूत आधार भी देते हैं।
दक्षिण एशिया में चीन का सबसे करीबी रणनीतिक सहयोगी पाकिस्तान भी संदेह पैदा करता है। भारत और बांग्लादेश के मजबूत रिश्ते पाकिस्तान को हमेशा से ही नागवार गुजरे हैं। हसीना के कार्यकाल से पहले पाकिस्तान के आतंकी समूह बांग्लादेश में अपेक्षया ज्यादा आजादी के साथ काम करते थे। 2009 में हसीना द्वारा बांग्लादेश की सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तान की आईएसआई ने बांग्लादेश राइफल्स के भीतर विद्रोह भड़का कर उनकी सरकार को अस्थिर बनाने का असफल प्रयास भी किया था।
हालांकि हालिया छात्र विरोध प्रदर्शन ने हसीना के लिए अप्रत्याशित चुनौतियां खड़ी कर दीं। बीएनपी के साथ ऐतिहासिक रूप से बांग्लादेश की मुक्ति का विरोध करने वाले जमात-ए-इस्लामी कैडरों ने भी छात्र आंदोलन का पूरा फायदा उठाया। नहीं भूलना चाहिए कि 1971 में जब बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम लड़ा गया, तब जमात ने अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, और उनके सदस्यों को ही रजाकार कहा जाता था। यह संकेत भी मिलते हैं कि विपक्षी नेता खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान ने कथित तौर पर लंदन में आईएसआई के साथ मिलकर राजनीतिक फायदे के लिए छात्रों के विरोध प्रदर्शन का इस्तेमाल किया। गौरतलब है कि भ्रष्टाचार के कई आरोपों के चलते लंदन में रह रहे तारिक अब बांग्लादेश वापसी कर रहे हैं। बांग्लादेश में जो हुआ, उसमें प्रत्यक्ष तौर पर विदेशी भागीदारी साबित करना तो चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि ये देश खुलकर सामने नहीं आते। लेकिन यह स्पष्ट है कि छात्र आंदोलन ने अराजकता की जो आग भड़काई, उसमें कई विदेशी ताकतों ने अपनी रोटियां सेकी हैं। भू-राजनीतिक पेचीदगियां यह भी रेखांकित करती हैं कि शेख हसीना किस तरह दक्षिण एशिया की जटिल अंतरराष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीति का शिकार बनीं।