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किस राह पर बांग्लादेश: चुनाव से पहले बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले, अंतरिम सरकार पर सवाल

Thu, 12 Feb 2026 05:45 AM IST
अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Thu, 12 Feb 2026 05:45 AM IST
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सार
चुनाव के ठीक पहले बांग्लादेश में एक और हिंदू की हत्या मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में चल रहे अंतरिम शासन के माथे पर स्याह धब्बा है। अगर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का यह सिलसिला नहीं थमा, तो आशंका है कि बांग्लादेश दूसरा पाकिस्तान न बन जाए।
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bangladesh on which way Attacks on minorities before election questions on muhammad yunus interim government
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बांग्लादेश में आज होने वाले मतदान से सिर्फ तीन दिन पहले एक हिंदू व्यापारी की नृशंस हत्या, जो देश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं पर बढ़ते हमलों की ताजा कड़ी है, वाकई क्षुब्ध करने वाली है। हैरानी की बात है कि यह वारदात भी उसी मैमनसिंह जिले में हुई है, जहां कुछ महीने पहले बजेंद्र बिस्वास नाम के व्यक्ति की गोली मारकर हत्या हुई थी और फिर इसी क्षेत्र में एक फैक्टरी कर्मचारी दीपू चंद्र दास को भी भीड़ ने पहले पीटा और फिर जलाकर मार डाला था। ताजा मामले में भी हमलावरों ने 62 वर्षीय व्यापारी सुशेन चंद्र सरकार की निर्मम हत्या कर शव को उनकी दुकान के भीतर ही फेंक दिया। अगस्त, 2024 में जब शेख हसीना सरकार के पतन के बाद अंतरिम सरकार की बागडोर मोहम्मद यूनुस ने संभाली थी, तब उम्मीद जताई गई थी कि वह लोकतंत्र की बहाली और सामाजिक सद्भाव बहाल करने की दिशा में काम करेंगे, लेकिन हुआ ठीक इसके विपरीत। एक रिपोर्ट के अनुसार, यूनुस शासन के दौरान अल्पसंख्यकों पर 2,900 से अधिक हमले हो चुके हैं। ऐसी 51 घटनाएं तो पिछले वर्ष दिसंबर में ही हुई थीं। ये आंकड़े गवाह हैं कि बांग्लादेश में कट्टरपंथियों को किस कदर छूट मिली हुई है। अफसोस की बात है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के बजाय यूनुस सरकार ने इन्हें झूठ बताकर खारिज करने की कोशिश की है। नतीजा सामने है। शेख हसीना के शासन में जिन कट्टरपंथी तत्वों पर लगाम लगी थी, वे अब खुलेआम सक्रिय हैं। इस पूरे परिदृश्य में यूनुस की भूमिका खलने वाली है, जो पिछले डेढ़ वर्ष से पाकिस्तान को खुश करने में ही लगे रहे, लेकिन इससे भी दुखद यह है कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की लगातार हत्याओं के बावजूद अब तक बांग्लादेश पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी तरह का दबाव बनाने की कोशिशें होती नहीं दिखी हैं। चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का जरिया नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का आईना भी होते हैं। इस आईने में अगर भय व हिंसा की छवि उभरती है, तो यह किसी भी देश के लिए चिंताजनक है। बांग्लादेश के सामने अब भी अवसर है कि वह सख्त और निष्पक्ष कदम उठाकर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दे, क्योंकि ऐसा करना केवल उसका कानूनी और नैतिक दायित्व ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वसनीयता की बुनियादी शर्त भी है। अगर ऐसा हुआ, तभी आम चुनाव बांग्लादेश के लोकतंत्र को और परिपक्व बना सकता है, वरना वह जिस दिशा में बढ़ रहा है, आशंका है कि कहीं उसका भी हाल पाकिस्तान जैसा न हो।
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