फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   bangladesh.

अशांत बांग्लादेश हमारे हक में नहीं

Fri, 20 Feb 2015 10:59 PM IST
कुलदीप तलवार
कुलदीप तलवार Updated Fri, 20 Feb 2015 10:59 PM IST
विज्ञापन
bangladesh.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक ऐसे समय बांग्लादेश के दौरे पर गई हैं, जब वह मुल्क लगातार सुलग रहा है। खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में पिछले करीब डेढ़ महीने के दौरान सरकार-विरोधी आंदोलन, हिंसा और तोड़फोड़ में वहां सौ से भी अधिक बेकुसूर लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि 10 अरब डॉलर से भी अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है। यात्रियों से भरी बसों, ट्रकों और रेलगाड़ियों पर पेट्रोल बम फेंके जा रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। वस्त्र उद्योग पर इसका सबसे प्रतिकूल असर पड़ा है। शिक्षा भी लगभग ठप्प पड़ गई है।

विज्ञापन


लाखों बच्चों की वार्षिक परीक्षा को देखते हुए सरकार ने बीएनपी की मुखिया खालिदा जिया को सरकार-विरोधी प्रदर्शन बंद करने के लिए कहा था, लेकिन वह नहीं मानीं। इस कारण उन्हें अभिभावकों की नाराजगी का सामना करना पड़ा। व्यापारियों और उद्योगपतियों ने जुलूस की शक्ल में रैली भी निकाली, फिर भी सरकार-विरोधी प्रदर्शन बंद नहीं हुए। सुरक्षा कारणों से ढाका और अगरतला के बीच चलने वाली बस को फिलहाल बंद कर दिया गया है। यात्रियों से भरी एक बस पर पेट्रोल बम फेंकने के मामले में खालिदा को आरोपी माना गया है। उनको हमले के लिए उकसाने वालों के रूप में नामजद किया गया है।
विज्ञापन


बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति की मुख्य वजह है, दो बेगमों में आपसी टकराव जारी रहना। खालिदा जिया कट्टरपंथी जमायते इस्लामी की मदद और हिंसा का सहारा लेकर मौजूदा सरकार पर नया चुनाव कराने का दबाव बनाए हुए है। वह जनवरी, 2014 के चुनाव को नहीं मानतीं। उनके मुताबिक, वह चुनाव निष्पक्ष नहीं था। जबकि शेख हसीना नया चुनाव कराने के लिए तैयार नहीं। उनका कहना है कि चूंकि खालिदा ने पिछले चुनाव का बहिष्कार किया था, इसलिए अब उन्हें 2019 के चुनाव तक इंतजार करना होगा। जमायते इस्लामी भी सरकार से नाराज है। स्वतंत्र बांग्लादेश के गठन के समय उसने पाक सेना का साथ दिया था, जिस कारण उसके कई नेताओं को मौत की सजा दी गई है। पिछले बुधवार को उसके एक और वरिष्ठ नेता को फांसी की सजा सुनाई गई।
विज्ञापन
विज्ञापन


काबिल-ए-गौर है कि 2011 में शेख हसीना ने संविधान में संशोधन कराकर सर्वदलीय सरकार के तहत चुनाव कराने का रास्ता खोल दिया था। तब से इस मुद्दे पर शेख हसीना व खालिदा जिया के बीच टकराव बना हुआ है। खालिदा गैरदलीय सरकार के तहत चुनाव कराने की जिद और शेख हसीना के इस्तीफा देने की मांग पर अड़ी हैं। उनके बहिष्कार के बावजूद जो चुनाव हुए, वे निष्पक्ष थे। खालिदा जिया का ख्याल है कि जैसे उन्होंने खुद दबाव में आकर 1996 में सत्ता संभालने के चार महीने बाद दोबारा चुनाव कराया था, ऐसे ही हसीना भी दबाव में आकर नया चुनाव कराने पर मजबूर हो जाएंगी और वैसे में वह अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हो जाएंगी। देश को नुकसान पहुंचाने का उन्हें कोई अफसोस नहीं है। वह कट्टरपंथियों के बूते नया चुनाव कराना चाहती हैं, जो मौजूदा हालात में मुश्किल है। सच यह है कि बीएनपी और जमायते इस्लामी वहां हाशिये पर पहुंच गई है।


जहां तक भारत का सवाल है, वह हमेशा बांग्लादेश के साथ बेहतर रिश्ता बनाना चाहता है। इस पड़ोसी देश के भारत के साथ संबंध सभ्यता, संस्कृति, संगीत, सामाजिक व आर्थिक जैसे विषयों के साथ जुड़े हुए हैं। शेख हसीना ने भी इन संबंधों को नया आयाम दिया है। इसलिए बांग्लादेश में जारी राजनीतिक अस्थिरता भारत के गले नहीं उतर रही। पड़ोस में हिंसा और उथल-पुथल, जाहिर है, हमारे लिए भी अच्छा नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed