{"_id":"5ebf50c9d2dbf707f14c2f06","slug":"badrinarayan-editorial-disaster-can-turn-into-opportunity","type":"story","status":"publish","title_hn":"अवसर में बदल सकती है आपदा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
अवसर में बदल सकती है आपदा
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : pexels.com
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी हाल-फिलहाल में ‘आपदा को अवसर’ में बदलने की बात की है। मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी शिक्षा जगत के संदर्भ में कोविड-19 के कारण उत्पन्न आपदा को अवसर में बदलने की प्रतिबद्धता दर्शाई है। आपदा को प्रायः विपदा के रूप में देखा जाता है। आपदा को अवसर में तब्दील करने की सोच हम सबके लिए एक नया परिप्रेक्ष्य है। निशंक भारतीय विश्वविद्यालयों को भारतीय छात्रों के साथ-साथ दुनिया के अनेक देशों के छात्रों एवं शिक्षकों के लिए आकर्षक बनाना चाहते हैं।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
इस दिशा में मानव संसाधन विकास मंत्रालय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के साथ मिलकर योजनाएं एवं नीतियां बनाने का कार्य करता भी रहा है। आपदा का सामना करने की दिशा में यह दूसरे चरण का आरंभ है। पहला चरण ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से लॉकडाउन झेल रहे विश्वविद्यालयों एवं शिक्षण संस्थाओं में शिक्षण कार्य चलाते हुए उनको व्यवस्थित करने का था। इस दूसरे चरण में भारतीय उच्च शिक्षा जगत कैसे इस आपदा को अवसर में बदल पाएगा, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
यह दूसरा चरण इस मूल आशा एवं विश्वास पर टिका है कि उत्तर कोरोना समय में दूसरे देशों के विद्यार्थियों की शिक्षा हेतु भारत आने की गति तेज हो सकती है। दूसरे देशों के छात्रों के संदर्भ में अगर विचार करें, तो शिक्षा के लिए पश्चिमी देशों के छात्रों के भारत आने की आशा शुरुआत में तो कम ही दिख रही है। किंतु भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था अपने को दक्षिण एशिया या यों कहें कि एशियाई मुल्कों के छात्रों के लिए शिक्षा हब के रूप में विकसित कर सकती है।
अगर भारत अपने कुछ बड़े एवं नामी विश्वविद्यालयों को एक्सीलेन्स मॉडल यूनिवर्सिटी के रूप में विकसित करने में सफलता पा लेता है और ये विश्वविद्यालय बाहरी छात्रों को भारत आने के लिए आकर्षित कर पाते हैं, तो भारत एशियाई, विशेषतः दक्षिण एशियाई शिक्षा का केंद्र या हब हो सकता है। एशिया में अगर समाज विज्ञान, मानविकी, विज्ञान एवं प्रबंधन की शिक्षा केंद्र के रूप में देखें, तो चीन, जापान, सिंगापुर एवं भारत ही बड़े एवं प्रभावी शिक्षा के केंद्र के रूप में हमें दिखाई पड़ते हैं।
माना जा रहा है कि कोरोना महामारी के कारण पश्चिमी एवं अमेरिकी विश्वविद्यालयों में चीनी एवं एशियाई देशों के छात्रों के साथ भेदभाव,हिंसा एवं उपेक्षा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। एशियाई दिखने वाले छात्र इन देशों में तरह-तरह के अपमानों का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में उन्हें अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाले ऐसे देश चाहिए, जहां उनके साथ सामंजस्य एवं समरसता का व्यवहार हो तथा उत्कृष्ट उच्च शिक्षा भी मिल सके। उन्हें एक शांतिपूर्ण एशियाई देश में येल, शिकागो, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज एवं प्रिन्सटन विश्वविद्यालयों का स्थानापन्न चाहिए।
इस दिशा में चीन के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा उतनी प्रभावी नहीं है। जापान की शिक्षा व्यवस्था काफी कुछ सेलेक्टिव एवं महंगी है। ऐसे में सिंगापुर एवं भारत के विश्वविद्यालय ऐसे एशियाई एवं दक्षिण एशियाई छात्रों को आकर्षित कर सकते हैं। अमेरिका एवं चीन के बाद भारत दुनिया की तीसरी बड़ी शिक्षा व्यवस्था माना जाता है। सिंगापुर, थाईलैंड, इंडोनेशिया जैसे बेहतर विश्वविद्यालय वाले देशों में भी समाज विज्ञान में जेएनयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय एवं पंजाब विश्वविद्यालय, विज्ञान एवं प्रबंधन की शिक्षा में बीएचयू एवं कई आईआईटी एवं आईआईएम की धाक है।
ऐसे में भारत अपने कुछ विशिष्ट विश्वविद्यालयों एवं उनके कैंपस को इस दिशा में विकसित कर बड़े पैमाने पर एशियाई देशों के छात्रों के लिए शिक्षा का आकर्षक केंद्र बन सकता है। इसके लिए हमें दो बातों की जरूरत पड़ेगी, एक तो भारत में पश्चिम प्रभावित शिक्षा विमर्श को थोड़ा किनारे कर एशियाई चिंतन एवं विमर्श को भी उचित महत्व देना है। इसके लिए एशियाई समाजों के ज्ञान, तकनीकी, विज्ञान, देशज विवेक, भारतीय एवं दक्षिण एशियाई चितंन, संस्कृति, साहित्य, कला को ऐसे मॉडल विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में हमें महत्व देना होगा।
इन विमर्शों का भारतीय ज्ञान विमर्श के साथ समानता, विविधता एवं एकसूत्रता भी हमें तलाशना ही होगा। दूसरा, इन मॉडल विश्वविद्यालयों में एक सुविधापूर्ण, शांत एवं सम्मानजनक माहौल निर्मित करना होगा। भारतीय उच्च शिक्षा को विश्व शिक्षा के एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में विकास की संभावना एवं शक्ति, दोनों ही उसे एशियाई, विशेषतः दक्षिण एशियाई शिक्षा के हब बनने की आरंभिक पहल से गहरे जुड़ी है।
शिक्षा के क्षेत्र में आपदा को अवसर बनाने की प्रक्रिया में कुछ समस्याएं भी हैं।
जैसा कि हमें पता है, दुनिया भर में महामारियां ‘वर्ग विभाजन’ को और ज्यादा तीक्ष्ण करती हैं। आर्थिक मंदी, गरीबी का विस्तार एवं मजलूमों की संख्या में वृद्धि करती है। ऐसे में भारतीय उच्च शिक्षा को एक तरफ ऐसे आकर्षक मॉडल शिक्षा केंद्र तो विकसित करने ही होंगे, साथ ही साथ भारत, जो कि अनेक अंतर्विरोधों का देश है, जहां गरीबों की एक बड़ी संख्या निवास करती है, वहां चाहे ऑनलाइन शिक्षा हो या कैंपस आधारित शिक्षा का संदर्भ हो, हमें लगातार कोशिश करनी होगी कि उपेक्षित एवं गरीब सामाजिक समूहों के छात्रों को हम बेहतर इंटरनेट की गति वाले स्मार्टफोन, लैपटॉप रखने की आर्थिक एवं सामाजिक शक्ति तो विकसित करें ही, साथ ही साथ उनमें कैंपस में रहकर शिक्षा लेने की क्षमता भी विकसित कर सकें।
इस संदर्भ में भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय एवं मंत्रालयों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में गरीबों के समाहन के लिए वर्तमान नीतियों के साथ कुछ नए तरह के समर्थन की नीति भी जोड़नी पड़ सकती है। इस प्रकार यह आपदा हमें यह भी अवसर देती है कि हम अपने समाज के गरीबों को शिक्षा क्षेत्र में समाहित करते जाएं। प्रसिद्ध कवि ब्रेख्त ने एक जगह कहा है, ‘गरीबी हमें भूख देती है, तो बुद्धिमान भी बनाती है।’ इसी बुद्धिमत्ता का नए एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में उपयोग करने का अवसर भी आज ज्यादा स्पष्ट ढंग से हमारे सामने उपस्थित है।