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विदेशी दालों का फीका स्वाद

Thu, 17 Nov 2016 06:53 PM IST
भारत डोगरा
भारत डोगरा Updated Thu, 17 Nov 2016 06:53 PM IST
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Bad taste of foreign pulses
भारत डोगरा

विभिन्न दालों की बढ़ती कीमतों के बीच कुछ समय पहले सरकार ने साढ़े छह लाख टन दालों के आयात का निर्णय लिया था। दालों की कमी पूरी करने के लिए आयात करना सरकार के लिए भले मजबूरी हो, पर यह सवाल उठाना जरूरी हो गया है कि आखिर हम इस स्थिति में क्यों पहुंचे कि इतने बड़े पैमाने पर दाल का आयात करना पड़ा। तथ्य यह है कि इतनी अधिक दालों का आयात पहले कभी नहीं किया गया। हमारे देश में दलहन उत्पादन की दृष्टि से बड़ा अनुकूल क्षेत्र है। आखिर ऐसी स्थिति क्यों आई कि दलदल का उत्पादन कम हुआ और आयात की जरूरत पड़ी।

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हाल के वर्षों में अनेक कारणों से दलहन की खेती की बहुत उपेक्षा हुई है। हरित क्रांति के दौर में तकनीक में जो बदलाव आए और मुख्य अनाजों की जिन किस्मों का प्रसार हुआ, उनका दलहन की फसलों के साथ मिश्रित खेती पर प्रतिकूल असर पड़ा। इस कारण केवल हमारे देश में नहीं, उस दौर में अनेक देशों में भी दलहन की फसलों में कमी आई। चूंकि दालें हमारे देश में प्रोटीन का सबसे प्रमुख स्रोत रही हैं, अतः प्रोटीन की कमी से कुपोषण की समस्या और विकट हुई।
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दलहन की खेती में कमी आने से मिट्टी के प्राकृतिक उपजाऊपन पर भी बहुत प्रतिकूल असर पड़ा। दलहन की फसलों में वायुमंडल से नाइट्रोजन प्राप्त कर मिट्टी को देने की अदभुत क्षमता है। गेहूं जैसी फसल, जो नाइट्रोजन मिट्टी से प्राप्त करती है, उसे दलहन की फसल मिट्टी में लौटा देती है। इस तरह सैकड़ों वर्ष की खेती के बाद भी मिट्टी का प्राकृतिक उपजाऊपन बना रहा। पर इस संतुलन के टूटने से मिट्टी की उर्वरता का तेजी से ह्रास हुआ व वह कृत्रिम उर्वरक पर निर्भर होती गई। इससे मिट्टी की गुणवत्ता, पर्यावरण और स्वास्थ्य पर अन्य प्रतिकूल असर हुए। पहले जो फसल चक्र चलते थे, उसमें या तो अनाज की फसल के बाद दलहन की फसल जरूर लगाई जाती थी या मिश्रित खेती करते हुए अनाज की फसल के साथ ही दलहन की फसल भी लगाई जाती थी। इससे धरती को भी पोषण मिल जाता था और गांववासियों के लिए भी पोषण का संतुलन बना रहता था। इस तरह के फसल चक्र और मिश्रित खेती में कमी आने से सदियों से चली आ रही यह व्यवस्था हाल के समय में बुरी तरह से टूटी।
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दलहन की विभिन्न फसलों से पशुओं के लिए पौष्टिक चारा और ग्रामीणों को दैनिक जीवन के उपयोग की बहुत-सी अन्य वस्तुएं भी मिल जाती थीं। दलहन उत्पादन में कमी आने से इसमें भी कमी आई है। इसके अलावा दालों की प्रोसेसिंग से जुड़े जो अनेक कुटीर उद्योग हैं, उनमें भी कमी आई है।

अब यदि बड़ी मात्रा में आयात कर दालों की कमी दूर की जाती है, तो इससे शहरी उपभोक्ता की समस्या तो चाहे कम हो जाए, पर गांववासियों के पोषण, उनके पशुओं के पोषण, उनके खेतों के पोषण की समस्या तो दूर नहीं हो सकेगी। इसके अलावा शहरी उपभोक्ता प्रायः अपने देश की दालों को ही पसंद करते हैं। आयतित दाल वे मजबूरी में ही खाते हैं। अतः दालों के दीर्घकालीन अधिक आयात से हमारी समस्याएं हल नहीं होंगी।


अतः देश में दलहन उत्पादन बढ़ाना जरूरी है। जबकि इसके बजाय म्यांमार व मोजांबिक जैसे देशों से दाल आयात के समझौते की संभावना बनी है। लंबे समय तक ऐसा आयात हितकारी नहीं होगा। जब हमारे देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने की तमाम संभावनाएं मौजूद है, तो उचित नीतियां अपनाकर इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

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