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बहुपक्षवाद के बुरे दिन

Wed, 31 Aug 2016 07:19 PM IST
वरुण गांधी
वरुण गांधी Updated Wed, 31 Aug 2016 07:19 PM IST
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बहुपक्षवाद की बखिया उधड़ रही है। जब वैश्विक समस्याओं के दौर में प्रभावी वैश्विक तालमेल की व्यापक जरूरत है, हाल के समय में बहुपक्षीय सहयोग का रास्ता बंद हो गया है। वर्ष 2008 में दोहा व्यापार सम्मेलन की विफलता के बाद विश्व व्यापार संगठन में गतिरोध बना हुआ है और वह अप्रांगिक होने के कगार पर है। आखिरी सफल विश्व व्यापार वार्ता आज से 23 वर्ष पूर्व उरुग्वे में हुई थी। ऐसे में, जब व्यापार वार्ता में बहुपक्षीय प्रासंगिकता संदिग्ध दिखती है, दुनिया क्षेत्रीय और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों की तरफ बढ़ रही है, जैसे- मौजूदा ट्रांस अटलांटिक ट्रेड ऐंड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप (टीटीआईपी), ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप (टीपीपी), रीजिनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी), मर्कोसुर, ईस्ट अफ्रीकन कम्युनिटी आदि। खुला क्षेत्रवाद फल-फूल रहा है और द्विपक्षीय भागीदारी के जरिये संचालित हो रहा है, जबकि विश्व व्यापार संगठन परस्पर दोषारोपण से अटा पड़ा है। एकलतावाद की लोकप्रियता बढ़ी है। यही वजह है कि जब डोनाल्ड ट्रंप विदेशी माल पर 45 फीसदी शुल्क लगाने की बात करते हैं, तो उन्हें कामगारों का हितैषी माना जाता है। आप्रवासन के कारण चिंताएं बढ़ी हैं। यहां तक कि भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे बहुपक्षीय संस्थानों से दूर हो रही है।

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रूस ने जहां क्रीमिया का शोषण किया, वहीं संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि का हस्ताक्षरी होने के बावजूद हेग स्थित पर्मांनेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने चीन के दावे को खारिज कर दिया, जो कि वैश्विक व्यवस्था में बदलाव का अग्रदूत है। ऐसा मालूम होता है कि उदार लोकतंत्र और मुक्त व्यापार की वैश्विक संस्थाओं के साथ गतिविधि बंद हो गई है। हम युद्धोपरांत बहुपक्षवाद के स्वर्णिम युग के समापन की ओर हैं।
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व्यापक क्षेत्रवाद की दिशा में यह झुकाव अनैतिहासिक नहीं है, भूमंडलीकरण का पतन पहले भी हुआ है। वर्ष 1846 में ब्रिटेन में मक्का कानून को खारिज किए जाने के बाद वहां 1860 में मुक्त व्यापार प्रणाली स्थापित की गई थी। सस्ते खाद्य और उद्योगों के लिए कच्चे माल के आयात ने संरक्षणवादी राज्यों की जगह ले ली। पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री ग्लैडस्टोन के शासन की इस क्रांति से ब्रिटेन के कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्र में भारी प्रतिस्पर्धा देखी गई, जबकि सब्सिडी, सेवा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा और ब्रिटिश उदारता को प्रोत्साहन देना खत्म हो गया। यूरोप में संरक्षणवाद बढ़ने के साथ मुक्त व्यापारियों ने बदले में भारत सहित अन्य उपनिवेशों में मुक्त व्यापार थोपने की मांग की। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका और जर्मनी के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की बड़ी ताकत के रूप में उदय होने के बाद शीघ्र ही यह व्यवस्था पलट गई। युद्ध के दौरान (1919-1938) महामंदी ने आयात शुल्क में वृद्धि के साथ गरीबी बढ़ाई। विश्व व्यापार जो एकबार एकजुट हुआ था, तुरंत बिखर गया और विभिन्न साम्राज्यवादी खेमों में बंट गया। उदारवाद से पीछे हटने के इस कदम को शीघ्र ही सामाजिक लोकतंत्र के खंडहर के बीच फासिज्म और कम्युनिज्म की जीत बताया गया। इस तरह उदारवाद की अजीब मौत हुई।
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बहुपक्षवाद का उदय युद्ध के बाद उपजे अनूठे कारकों (युद्ध के बाद लोकतंत्र के लाभ पर आम सहमति, कल्याणकारी राज्य और मुक्त व्यापार के साथ अमेरिकी वर्चस्व) के कारण हुआ था और उसका पतन संरचनात्मक कारणों से हो रहा है। बहुपक्षतवाद निरंतर अड़ियल बना हुआ है, उनकी सदस्यता और उससे संबद्ध पदानुक्रम के मामले में वह अनुदार है, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल होने के लिए भारत के संघर्ष में देखा जा सकता है। इन संस्थाओं पर भी आम सहमति के बजाय तेजी से विवाद का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि बड़े खिलाड़ी वीटो लगाकर, एजेंडा कमजोर करके और अड़ंगा डालकर व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करते हैं। विरोधी संस्थानों के उदय (जैसे विश्व बैंक की प्रतिक्रिया में एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर बैंक, नाटो एवं जी-7 की प्रतिक्रिया में शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स) ने परिदृश्य को गंदा करने, कूटनीतिक क्षमता को खत्म करने और सहायता संसाधनों में सेंध लगाने में मदद की है। इसी बीच विकसित समाज बदल गया, सामाजिक लोकतंत्र के ऊपर व्यक्तिवाद हावी हो गया।

मौजूदा परिदृश्य विश्वयुद्ध से पूर्व की स्थिति जैसा है, जब उदारतावाद पीछे हट गया था। कभी सामाजिक विधानवाद का आदर्श रहे यूरोपीय कल्याणकारी राज्य की स्थिति खराब है, वह प्रवासियों और शरणार्थियों की बाढ़ तथा असमानता में होती वृद्धि से तालमेल बिठाने में असमर्थ है। पश्चिमी समाज के भीतर सामाजिक प्रबंधन वर्ग संघर्ष के कारण भंग हो गया है। यह एक ऐसा संघर्ष है, जो एक फीसदी लोगों और शेष समाज के बीच है। कभी पश्चिमी समाज के नागरिकों को सेवा अर्थव्यवस्था का वायदा करने वाला भूमंडलीकरण खोखले विनिर्माण क्षेत्र के कारण थम गया है। ट्रांस अटलांटिक बहुपक्षीय संस्थाएं वैश्विक चुनौतियों (ग्लोबल वार्मिंग, वित्तीय अस्थिरता, ऊर्जा प्रतिस्पर्धा, प्रवासियों में वृद्धि, परमाणु प्रसार में वृद्धि) का सामना करने में विफल रही हैं।


बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने के लिए विश्व व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन की जरूरत होगी। नई व्यवस्था में क्षेत्रीय और महान शक्तियों की विविधता के साथ तालमेल बिठाना होगा। इसके अलावा नागरिक समाज का सशक्तिकरण, बहुराष्ट्रीय सहयोग और अति समृद्ध व्यक्तियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय प्रवाह बढ़ाना होगा। भूमंडलीकरण की मजबूती, देशों की संप्रभुता और लोकतंत्र के बीच तालमेल पर फिर से विचार करना होगा। ये सब अतीत की बची हुई जटिल समस्याएं हैं। महाशक्ति देशों को विवाद निपटाने के लिए एक नए तंत्र की जरूरत होगी और वैश्विक मंच पर उन्हें अपने उन्माद पर रोक लगाना होगा। बहुपक्षवाद के पतन से अनिश्चितता की स्थिति बन गई है। लंबे समय तक एकजुट रहने वाली विश्व व्यवस्था बंट गई है। इसे व्यवस्थित होने में दशकों लगेंगे।

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