फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   awais sheikh a peacemaker in black coat

काले कोट में शांतिदूत

Sat, 18 May 2013 03:13 PM IST
हेमेन्द्र मिश्र
हेमेन्द्र मिश्र Updated Sat, 18 May 2013 03:13 PM IST
विज्ञापन
awais sheikh a peacemaker in black coat

जरा सोचिए, किसी भी उदार समाज में गलती से पकड़े गए किसी शख्स के पक्ष में आवाज उठाने वाले को क्या इनाम मिल सकता है! जवाब होगा-मानवाधिकारवादियों की सराहना, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान, प्रतिष्ठा और शोहरत। लेकिन शहीद सरबजीत के पक्ष में आवाज उठाने वाले अवैस शेख इतने भाग्यशाली नहीं हैं।

विज्ञापन


एक अपेक्षाकृत कट्टर समाज में रहने के कारण बतौर 'इनाम' उन्हें धमकियां मिलीं, उनके खिलाफ माहौल बनाया गया, उनका अपहरण हुआ और बाद में उन्हें छोड़ भी दिया गया। अब वह पाकिस्तान की जेलों में बंद अन्य 'सरबजीतों' की लड़ाई के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।
विज्ञापन


पाकिस्तान की कट्टर जमात के लिए अवैस 'काफिर' से कम नहीं। उन्होंने उस शख्स की वकालत की, जिसे 'पड़ोसी देश का आतंकवादी' बताया गया था। यही वजह है कि जब अवैस ने सरबजीत का मुकदमा मुफ्त में लड़ने का निर्णय लिया, तब उन्हें जान से मारने तक की धमकियां मिलीं।
विज्ञापन
विज्ञापन


अवैस ने अपना इरादा नहीं बदला, तो जिस बिल्डिंग में उनका ऑफिस था, उसके मालिक ने उन्हें अपना कार्यालय बदलने का अल्टीमेटम जरूर दे दिया। हालांकि इसके लिए भी वह अपने मकान मालिक को दोष नहीं देते। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है, राजनेता, नौकरशाह और सेना सही सूचनाएं आम लोगों तक नहीं पहुंचने देतीं।

अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उन्होंने देश में ऐसा माहौल बना दिया है, जहां भारत के पक्ष में बात करना किसी गुनाह से कम नहीं। इसलिए वह वकील से पहले खुद को मानवाधिकारवादी और शांतिदूत कहलाना पसंद करते हैं, जो भारत और पाकिस्तान के बीच अमन के लिए अपने खून के आखिरी कतरे तक काम करना चाहता है। समझौता एक्सप्रेस और सरबजीत सिंह की अजब दास्तान जैसी किताबें उनकी इसी कोशिश का हिस्सा हैं।


आज जब कट्टरपंथी ताकतें पाकिस्तानी सियासत का हिस्सा बनती जा रही हैं, अवैस शेख के लिए चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं। पर उन्हें अपने ईश्वर पर पूरा विश्वास है। सरबजीत के साथ न्याय न करवा पाने का मलाल उन्हें जरूर है, लेकिन यह भरोसा भी है कि भविष्य में दोनों पड़ोसियों के बीच सरहदी दीवार टूटेगी। वह कहते हैं, फ्रांस और जर्मनी के बीच की लंबी दुश्मनी दोस्ती में बदल गई, तो भारत-पाकिस्तान के बीच एकता क्यों नहीं हो सकती? रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed