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असली भारत की उपेक्षा

Sun, 10 May 2015 03:24 PM IST
के.सी. त्यागी
के.सी. त्यागी Updated Sun, 10 May 2015 03:24 PM IST
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Avoid of real india

देश की राजधानी के अतिसुरक्षित क्षेत्र जंतर मंतर पर दौसा (राजस्थान) के किसान गजेन्द्र की आत्महत्या ने गरीबी, कृषि की स्थिति, कर्ज, फसल की बर्बादी को पुनः राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। वहीं सी.ए.सी.पी. ने खरीफ की प्रमुख फसल धान के समर्थन मूल्य में मात्र 50 रुपये प्रति क्विंटल की सिफारिश करके साबित किया है कि मोदी सरकार किसान हितैषी नहीं है।

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इस समय किसान पिछले कुछ दशकों में सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति से गुजर रहा है। प्राकृतिक प्रकोप से जूझ रहे किसान को इस सरकार ने अपने चुनावी वायदों से विपरीत आचरण कर निराश किया है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने चुनावी घोषणा पत्र में लिखित तौर पर स्वीकार किया था कि वह किसानों को फसल के लागत मूल्य के साथ 50 फीसदी अधिक मूल्य दिलाएगी। आश्चर्य है कि जब इस चुनावी घोषणा को पूरा करवाने के लिए एक समाज सेवी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो चुनावी वायदों और जुमलों में ज्यादा फर्क न करने वाली सरकार ने वहां एक हलफनामा दायर करके कहा कि वह असमर्थ है, बल्कि ऐसा करने से अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगड़ जाएगा।
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भाजपा का वायदा कृषि वैज्ञानिक डॉ. स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों पर आधारित था। 18 नवंबर, 2004 को डॉ. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में इस कमीशन का गठन किया गया था। इस संस्था को राष्ट्रीय किसान आयोग का नाम दिया गया। आयोग ने क्रमश: चार बार अपनी संस्तुतियां प्रस्तुत कीं। अंतिम रिपोर्ट चार अक्तूबर, 2006 को प्रस्तुत की गई, जिसमें तेजी के साथ समावेशी विकास की ओर ग्रामीण भारत को अग्रसर करने की प्रतिबद्धता थी। उसमें किसानों द्वारा की जा रही निरंतर आत्महत्या की प्रवृत्ति के कारणों का उपचार करना, भूमि सुधार, संस्थागत कर्ज उपलब्ध कराना, बाजार को लाभकारी मूल्य से संतुलित करना आदि शामिल हैं। इसमें कृषि को संविधान की समवर्ती सूची में शामिल करने की भी सिफारिश की गई।
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सिंचाई कृषि उत्पादन के लिए सबसे आवश्यक है, सिंचित भूमि जो इस समय मात्र 45 फीसदी है, उसके क्षेत्र का विस्तार करना भी जरूरी है । भारत में कृषि उत्पादकता का प्रतिशत दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले में काफी कम है, उसमें वृद्धि करने का लगातार प्रयत्न एवं उपाय करने के साथ ही किसानों को अधिकतम चार फीसदी ब्याज पर कर्ज उपलब्ध कराने जैसी सिफारिशें भी शामिल थीं। इसी आयोग की सिफारिश के मुताबिक भाजपा ने 50 फीसदी एमएसपी बढ़ाने की घोषणा की थी। परंतु पिछले एक साल में सरकार द्वारा सभी फसलों का जो लागत मूल्य घोषित किया गया था, उसमें मात्र तीन प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई है। समर्थन मूल्य निर्धारित करने की प्रकिया भी दोषपूर्ण है। सरकार की संवेदनहीनता इससे पता लगती है कि जिस समय समूचे देश में लगभग 1.81 करोड़ हेक्टेयर की फसल बर्बाद हो चुकी है, जिससे एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, उस समय खरीफ की प्रमुख फसल धान के लिए समर्थन मूल्य में उसने न्यूनतम वृद्धि की है।


अगर पिछले कई दशकों को देखें, तो पता लगता है कि किस प्रकार औद्योगिक उत्पादों का दाम निरंतर बढ़ता रहा है और उनके मुकाबले कृषि उत्पादों के दाम गिर रहे हैं। गिरते उत्पादों के दाम, सरकार की उदासीनता और प्राकृतिक प्रकोप ने किसानों को बेबस कर दिया है।

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