बदला लेने वाला बचपन!
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यह देश की राजधानी दिल्ली की घटना है। वे दोनों गरीब थे। झोंपड़ियों में रहते थे। साथ-साथ खेलते थे, स्कूल जाते थे, लड़ते-झगड़ते थे। दोनों के माता-पिता मजदूरी करके परिवार पालते थे। इनमें से एक बच्चा अक्सर दूसरे को सताता, डांटता, पीटता। उसकी हंसी उड़ाता। दूसरा बच्चा कुछ न कह पाता। अपमान का कड़वा घूंट पीकर रह जाता। समय गुजरा, दोनों चौदह-पंद्रह साल के हो गए। अब भी सब कुछ साथ-साथ करते थे। एक सवेरे दोनों खेल रहे थे। तब एक ने दूसरे से कहा कि क्यों न वहां जाकर खेला जाए, जहां उन्हें कोई देख न सके। इसलिए वे ऊंचे पेड़ों वाले जंगल में चले गए। दिल्ली की भीड़-भाड़ के बावजूद इस तरफ एकांत रहता था। वहां दोनों खेलने लगे। फिर एक ने दूसरे से कहा कि आज एक नए तरह का खेल खेलते हैं। ऐसा खेल, जो पहले कभी नहीं खेला है। उसने अपने दोस्त से कहा कि वह जमीन पर लेट जाए और कमीज से मुंह ढक ले। लड़के ने वैसा ही किया, जैसा दोस्त ने कहा था। फिर दूसरे लड़के ने पास पड़ी एक ईंट उठाई और लेटे हुए लड़के के सिर को तब तक कुचला, जब तक कि वह मर न गया। बाद में पकड़े जाने पर उसने कहा कि बचपन से वह अपने इस दोस्त का अत्याचार सहता रहा है। उसी का बदला उसने लिया है। एक बच्चे का इस तरह से बदलाखोर हो जाना चौंकाता है, डराता है, असुरक्षा की भावना भरता है। देखने की बात यह है कि आजकल बच्चों द्वारा इस तरह के बदले की भावना से किए गए अपराध अकसर प्रकाश में आते रहते हैं।
हम बड़े प्रायः बचपन को इस तरह से याद करते हैं कि बचपन के दिन भी क्या दिन थे! बचपन एक खुशनुमा याद और खुशबू की तरह होता है, जो गाहे-बगाहे हमारे मन की कुंडियां खटखटाता रहता है। मगर ऊपर लिखी घटना जानकर यह एहसास भी होता है कि बचपन की यादें हिंसक भी बनाती हैं। अक्सर बचपन में झेले अपमान का बदला हिंदी फिल्मों में लिया जाता रहा है। अमिताभ बच्चन की सत्तर के दशक की फिल्मों यथा जंजीर, दीवार, शक्ति या त्रिशूल इसका जीता जागता उदाहरण हैं, जहां नायक के अपमान के लिए अन्य कारणों के अलावा उसकी गरीबी भी जिम्मेदार होती है। इसलिए बड़े होकर हर तरह से सफल और संपन्न होने के बावजूद वह अपने बचपन के खलनायक को नहीं भुला पाता। इसके लिए उसे हिंसा के किसी भी रूप और जघन्यतम कृत्यों का भी सहारा लेना पड़े, तो वह नहीं हिचकता। हालांकि इन फिल्मों को देखकर, न तो पूरा समाज हिंसक होता है, न ही लोग अपने सताने वाले को नेस्तनाबूद करते हैं। लेकिन जिन्हें हिंसा का बदला हिंसा और हत्या का बदला हत्या से लेना होता है, वे लोग भी इसी समाज में रहते हैं। लेकिन बच्चों का बच्चों से बदला लेना एक डरावना तथ्य है। कई बच्चे यह भी कहते पाए गए हैं कि अगर उन्हें दोबारा ऐसा करने का मौका मिला, तो हिचकेंगे नहीं। यही नहीं, अपने दोस्त का सिर ईंट से कुचलने का खयाल कैसे आया, यह पूछने पर उसने बताया कि ऐसा उसने एक सीरियल देखकर किया।
जब फिल्मों और सीरियल बनाने वालों से इस बारे में बात की जाती है, तो वे कहते हैं कि हम तो वही दिखाते हैं, जो समाज में हो रहा है। माता-पिता से पूछिए तो वे कहते हैं कि फिल्में, टीवी कार्यक्रम और इंटरनेट बच्चों को गलत काम करने की सीख देते हैं। फिल्म और टीवी वाले समाज और घर के वातावरण को दोष देते हैं। दोष किसका है या किसका नहीं, इस पर लंबी बहसें चल सकती हैं, मगर बच्चों में बढ़ती हिंसा और दोस्त का दोस्त को मारना दुखद तो है ही।