तृणमूल की तानाशाही
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पश्चिम बंगाल में राज्यव्यापी विरोध कार्रवाइयों के साथ इस साल का अंत हो रहा है। कोलकाता में 22 दिसंबर को वाम मोर्चे के जुलूस पर हुए जघन्य हमले के खिलाफ आवाज उठाने के लिए इन विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया गया है। राज्य वाम मोर्चे के अध्यक्ष तथा माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य विमान बसु के नेतृत्व में निकले इस जुलूस को तृणमूल कांग्रेस के हथियारबंद लोगों ने हिंसा के जरिये रोकने की कोशिश की थी। लाठियों, सरियों तथा ईंटों से लैस गुंडों ने जुलूस में शामिल लोगों पर हमला किया, जिससे कुछ महिला कार्यकर्ताओं को गंभीर चोटें आईं। उस हमले के बावजूद जुलूस ने कोलकाता शहर में अपना सफर जारी रखा।
जैसा कि तृणमूल के राज में कायदा ही हो गया है, राज्य पुलिस का दस्ता इस सबके बीच सिर्फ तमाशबीन बना रहा और उसने घटना की एफआईआर दर्ज करने तक से इन्कार कर दिया। यह इस तरह की अकेली घटना नहीं। यह आतंक तथा दबाव-धौंस के जरिये राज्य में समूचे विपक्ष को डराने की सत्तारूढ़ पार्टी की रणनीति का ही हिस्सा है।
2011 के विधानसभा चुनाव के बाद से, जिसमें तृणमूल और कांग्रेस की गठजोड़ ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी, पश्चिम बंगाल में जनतंत्र तथा जनतांत्रिक अधिकारों पर हमलों का सिलसिला जारी है। तृणमूल का शासन आने के बाद से इस दिसंबर की शुरुआत तक वाम मोर्चे के करीब डेढ़ सौ नेताओं तथा कार्यकर्ताओं की तो हत्याएं ही की जा चुकी थीं, जबकि लगभग साढ़े सात हजार लोगों को घायल कर अस्पताल पहुंचाया जा चुका था।
जनतंत्र पर इस तरह के हमलों के विरोध में पश्चिम बंगाल के सांसदों, विधायकों और स्थानीय निकायों के चुने हुए सदस्यों ने विगत 18 दिसंबर को संसद के सामने धरना दिया। संसद के दोनों सदनों में वाम मोर्चे ने यह मुद्दा उठाने के साथ राष्ट्रपति भवन तक विरोध मार्च आयोजित किया। उसके अगले दिन एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त से भेंट की और आयोग का ध्यान ऐसे हालात पैदा करने की उसकी सांविधानिक जिम्मेदारी की ओर आकर्षित किया, जो स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव आयोजित करने के अनुकूल हो, और जो स्थिति आज पश्चिम बंगाल में नहीं है।
राजनीतिक हमलों के अलावा पश्चिम बंगाल में अब सत्तारूढ़ कांग्रेस यह सुनिश्चित करने के लिए ताकत और धौंस के तमाम रूपों का इस्तेमाल कर रही है कि हाल के स्थानीय निकायों के चुनावों में चुने गए विपक्ष के सदस्य इस्तीफा दे दें या फिर शासक पार्टी के पक्ष में अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता बदल लें। विपक्षी पार्टियों के संभावित उम्मीदवारों और जो उम्मीदवार चुन लिए गए, उनकी पत्नियों के पास शासक पार्टी के गुंडे पहुंचे और उन्हें विधवाओं द्वारा पहनी जाने वाली सफेद साड़ियां भेंट कीं। साथ ही, धमकी भी दी कि अगर उनके पति चुनाव मैदान से नहीं हटे या शासक पार्टी में शामिल नहीं हुए, तो उन्हें ऐसे ही गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। राजनीतिक हथियार के रूप में बलात्कार का जैसे अचूक रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल में जनतंत्र तथा नागरिक स्वतंत्रताओं पर इस तरह के हमले उस समय हो रहे हैं, जब भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी झुकाव दिखाई दे रहा है। यह सर्वविदित है कि तृणमूल कांग्रेस को भाजपा के साथ काम करने में कोई हिचक नहीं है। ममता बनर्जी ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री के रूप में काम किया था। कुछ वजहों से राजग को कुछ समय के लिए छोड़ने के बाद गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक नरसंहार के फौरन बाद वह फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गई थीं। इसे देखते हुए आज पश्चिम बंगाल में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए चिंता के उनके दिखावे में नीयत तथा ईमानदारी, दोनों का ही अभाव है।
इसलिए अगर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की ओर से भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए अनुकूल रुख दिखाई दे, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर और मनमोहन सिंह की सरकार में रेल मंत्री के रूप में काम कर ममता बनर्जी ने किसी भी तरह की राजनीतिक प्रतिबद्धता या गंभीरता के प्रति अपनी अवहेलना का ही प्रदर्शन किया है। सत्ता के लाभ हासिल करनेवाली पार्टी होने के नाते तृणमूल भाजपा या कांग्रेस किसी के भी साथ काम करने के लिए उत्सुक रहेगी।
लेकिन राजनीतिक अवसरवाद के जरिये अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए उन्हें जनतंत्र और जनतांत्रिक संस्थाओं की बुनियादों को नष्ट करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। पश्चिम बंगाल में माकपा और वाम मोर्चा ने अतीत में भी अपने हजारों सदस्यों तथा समर्थकों की बेहिसाब कुर्बानियों की कीमत पर जनतंत्र को बहाल किया है। बीती सदी के सत्तर के दशक में जब माकपा को निशाना बनाया गया था, तब पांच साल तक अनेक धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक विपक्षी पार्टियां यही सोचती रही थीं कि यह हमला सिर्फ माकपा और वामपंथ तक ही सीमित रहेगा। पर जब 1975 में आंतरिक आपातकाल थोप दिया गया और जनतंत्र तथा जनतांत्रिक अधिकारों पर हमले शुरू हुए, तभी जाकर उन्हें यह सच्चाई समझ में आई कि ये हमले किसी एक पार्टी या देश के किसी एक हिस्से तक सीमित रहनेवाले नहीं हैं।
माकपा वाम मोर्चे के अपने सहयोगियों के साथ ऐसे हमलों का बेहिचक प्रतिरोध जारी रखेगी, जैसा कि वह करती रही है, और फिर से उबरकर सामने आएगी, ताकि देश में जनतंत्र तथा जनतांत्रिक अधिकारों को सुदृढ़ता दी जा सके।