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आपबीती: मेरे साथ जो हुआ, जिहादियों के मुताबिक अल्लाह ने ही मुझे नास्तिक होने की सजा दी
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सार
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सोशल मीडिया
विस्तार
मेरी मां और दोनों भैया की साठ वर्ष के आसपास किसी न किसी वजह से मृत्यु हो गई थी। उनकी मृत्यु पर दुखी होते हुए भी मेरे मन में कहीं न कहीं यह एहसास था कि मैं उनसे ज्यादा दिनों तक इस पृथ्वी पर रहूंगी। इस आत्मविश्वास की वजह यह रही कि अपने स्वास्थ्य के बारे में मैं हमेशा से ही सजग हूं। मैं नियमित स्वास्थ्य जांच कराती हूं। साइकिल चलाती हूं। तेज गति से टहलती हूं और ट्रेडमिल पर चलती हूं। पिछले एक साल के दौरान वजन घटाकर मैं एकदम फिट और रोगमुक्त हो गई हूं।
लेकिन लगभग एक महीने पहले, 13 जनवरी को घुटने में चोट लगने पर अस्पताल में मैं यह जानने के लिए गई थी कि मेरे घुटने के जोड़ में कुछ हुआ तो नहीं। अगले ही दिन दोपहर को मेरे कूल्हे के जोड़ और जांघ की हड्डी (फीमर) को काटकर अलग कर दिया गया। मैं कुछ समझ पाती, उससे पहले ही दुर्घटना घट चुकी थी। यह दुर्घटना देश की राजधानी के एक अत्याधुनिक निजी अस्पताल में घटी। उस अस्पताल की इमरजेंसी में जिस वरिष्ठ डॉक्टर से मैंने संपर्क किया था, वह कूल्हा और घुटना बदलने के विशेषज्ञ थे।
उस डॉक्टर से जब मैंने अपने घुटने के दर्द के बारे में बताया, तो उन्होंने किसी तरह की कोई जांच नहीं की। न मुझसे यह पूछा कि घुटने के अलावा शरीर में कहीं और भी दर्द है या नहीं। उन्होंने मुझसे पैर हिलाने-डुलाने के लिए नहीं कहा। उन्होंने मुझे सीधे खड़े होने या कुछ कदम चलने के लिए नहीं कहा। उन्होंने मुझे एक्स-रे और फिर सीटी स्कैन करने के लिए भेजा। फिर उन्होंने कहा कि मेरा नेक फीमर फ्रैक्चर हुआ है और इसमें चिकित्सा के दो विकल्प हैं-जोड़ना यानी फिक्सेशन और बदलना यानी रिप्लेसमेंट। मैं स्वाभाविक ही जोड़ने के विकल्प पर राजी थी। डॉक्टर ने कहा कि चूंकि मेरा वजन कम है, ऐसे में जोड़ने का विकल्प ही बेहतर होगा।
पर अगले दिन उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से मुझे कहा कि वह फिक्सेशन नहीं, बल्कि हिप रिप्लेसमेंट करेंगे, यानी कूल्हा बदलेंगे। मैंने कहा कि मैं दूसरे डॉक्टरों की राय लूंगी। उनका कहना था कि उन्होंने इस बारे में राय ली है और सबने कूल्हा बदलने की राय दी है। मैंने कहा कि मैं आज नहीं करवाऊंगी। इस पर थोड़ा नाराज होते हुए डॉक्टर ने कहा कि कल वह नहीं आएंगे, और परसों तक रोके रखने से नुकसान हो जाएगा। तब मैंने उसी अस्पताल के एक परिचित बंगाली डॉक्टर को फोन किया। पर हिप रिप्लेसमेंट की महिमा का बखान करते हुए उन्होंने मुझे डॉक्टर पर आंख मूंदकर भरोसा करने की सलाह दी। उनका यह भी कहना था कि हिप रिप्लेसमेंट इतना कारगर है कि अगले दिन मैं अस्पताल से पैदल चलकर घर जा सकूंगी। पूर्व परिचित डॉक्टर ने मुझे ऑपरेशन के लिए जल्दी करने के लिए कहा, क्योंकि ऑपरेशन थियेटर तैयार था।
कूल्हा बदले जाने के तीन बाद मैं और अच्छी तरह समझ पाई कि यह विकल्प मेरे लिए तो कतई नहीं था। जो लोग जोड़ का भीषण दर्द झेलते हैं और किसी भी दवा से दर्द कम नहीं होता, जिनके जोड़ जम गए हों, जिनके जोड़ में कैंसर या ट्यूमर हुआ हो, रूमेटाइड अर्थराइटिस (संधिवात) या गठिया से ग्रस्त जो बुजुर्ग चलने-फिरने की क्षमता खो चुके हों, उन्हें कूल्हा बदलने का विकल्प दिया जाता है, ताकि जितने भी दिन की उनकी आयु बची हो, वे थोड़ा-बहुत चल-फिर सकें। ऑपरेशन के पांच दिन बाद एक्स-रे की एक प्लेट देखकर मैं चौंक गई। उसकी रिपोर्ट में लिखा था कि जोड़ में पुराना कोई फ्रैक्चर था, जिसे जोड़ दिया गया है। नया कोई फ्रैक्चर नहीं है। इस पर मैंने डॉक्टर को बुलाकर जब कहा कि रिपोर्ट में तो कोई नया फ्रैक्चर बताया ही नहीं गया था। फिर आपने कूल्हा बदलने का फैसला कर लिया? इस पर वह अस्पताल के निदेशक को ले आए और सफाई देते हुए कहा कि उस रिपोर्ट में तकनीकी त्रुटि है। सीनियर रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट में तकनीकी त्रुटि का बहाना विश्वसनीय नहीं था।
अगले दिन मैंने यह कहकर जबर्दस्ती डिस्चार्ज लिया कि इस अस्पताल पर मुझे भरोसा नहीं है। लेकिन घर लौटकर डिस्चार्ज रिपोर्ट देखकर मैं स्तब्ध रह गई। उसमें घुटने के दर्द की बात न लिखकर यह झूठ लिखा हुआ था कि कूल्हे के जोड़ में असहनीय दर्द की शिकायत के साथ मैं अस्पताल आई थी। उसमें यह भी लिखा हुआ था कि डॉक्टर ने मुझे इलाज का विकल्प दिया था, लेकिन मैं हिप रिप्लेसमेंट पर ही अड़ी हुई थी। जो डॉक्टर ऐसी झूठी कहानी गढ़ सकते हैं, उनके लिए इस डिजिटल युग में फर्जी एक्स-रे रिपोर्ट और सीटी स्कैन तैयार करने में भला क्या मुश्किल हो सकती है? मनुष्य पर भरोसा कर हर बार ही मैं ठगी गई हूं। लेकिन इस बार मेरे साथ हुई ठगी तो मर्मांतक है, क्योंकि मेरे शरीर, मेरे जीवन के साथ खिलवाड़ हुआ है। मान लें कि अगर सचमुच फ्रैक्चर हुआ था, तो भी उसका इलाज सीधे कूल्हा बदलना तो नहीं था। यदि इलाज से कोई सुधार नहीं होता और अंत में कूल्हा बदलने का फैसला लिया जाता, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं थी। यदि किसी भीषण सड़क दुर्घटना में कूल्हे की हड्डी चूर-चूर हो जाती, तो मैं समझती कि मेरा सही इलाज हो रहा है। लेकिन मामला ऐसा नहीं है।
मैंने सुना है कि नामचीन निजी अस्पतालों में ऑपरेशन के लक्ष्य निश्चित तक दिए जाते हैं। ऐसे अस्पतालों के मालिक सर्जन को बता देते हैं कि इतने ऑपरेशन का लक्ष्य पूरा होना चाहिए। मेरे बारे में शायद यह छवि भी बनी कि यह विदेशी हैं, अपने देश में लौटकर मर भी गईं, तो कुछ नहीं होगा। जहां तक मेरा मानना है, ऑपरेशन करने वाला डॉक्टर निश्चित तौर पर यह नहीं जानते रहे होंगे कि मैं एक लेखिका हूं, और खुद डॉक्टर रह चुकी हूं। उन्होंने मुझे आत्मीय जनों से वंचित एक विदेशी मुस्लिम मरीज समझ लिया होगा।
पिछले तीस साल से जिहादी मेरी हत्या की कोशिश में नाकाम हुए हैं। लेकिन उस दिन कुछ ही घंटे में एक कॉरपोरेट अस्पताल ने जिहादियों की मंशा पूरी कर दी। सोशल मीडिया पर जिहादी अब खुशी से नाच रहे हैं। वे उस डॉक्टर और उस अस्पताल के प्रति गद्गद हैं, जिन्होंने उनकी वर्षों पुरानी इच्छा पूरी कर दी है। उन जिहादियों का कहना है कि मैं अब पंगु हो गई हूं। उनके मुताबिक, अल्लाह ने ही मुझे नास्तिक होने की सजा दी है। बेशक मैं नास्तिक हूं। परलोक के बजाय यह इहलोक ही मेरे लिए सब कुछ है। तथा इस जीवन को और अर्थपूर्ण बनाने के लिए मैं अब एक पैर पर खड़ी हूं।