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स्वास्थ्य की कीमत पर
Wed, 19 Dec 2018 07:03 PM IST
Nootan Gupta
सुभाष चंद्र कुशवाहा
सुभाष चंद्र कुशवाहा
Published by: Nootan Gupta
Updated Wed, 19 Dec 2018 07:03 PM IST
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सुभाष चंद्र कुशवाहा
बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने लाभ के लिए किस तरह अमानवीय व्यवहार करती हैं, इसका खुलासा अमेरिकी संवाद एजेंसी रॉयटर्स की लंबी जांच प्रक्रिया और ओवरी (अंडाशय) के कैंसर से पीड़ित महिला डेर्लेन कोकर की शंका, दृढ़ इच्छाशक्ति और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हुआ है। दुनिया भर में बेबी पाउडर और अन्य उत्पादों के जरिये कैंसर परोसने वाली एक नामचीन कंपनी के खिलाफ लंबे समय से कुछ डॉक्टर जहां लड़ते रहे हैं, वहीं कुछ संस्थान उसका समर्थन भी करते रहे हैं। दरअसल डेर्लेन कोकर को पता चला कि उन्हें जो कैंसर है, वह एस्बेस्टस के प्रभाव में आने पर होता है।
खान मजदूरों में यह बीमारी पाई जाती रही है, पर कोकर परेशान थीं कि एस्बेस्टस के संपर्क में वह आईं कैसे। उनके वकील से उन्हें पता चला कि बेबी पाउडर की वजह से ही उन्हें कैंसर हुआ है। उन्होंने उस कंपनी के खिलाफ मुकदमा दायर किया। कंपनी की अपनी आंतरिक जांच में 1957-58 में ही बेबी पाउडर में एक से तीन प्रतिशत एस्बेस्टस पाया गया था, पर कंपनी ने इसका खुलासा नहीं किया।
रॉयटर्स ने 1971 से 2000 तक बेबी पाउडर की जांच में एस्बेस्टस की मात्रा की पुष्टि की, पर उस कंपनी ने निजी जांच एजेंसियों, अपने वैज्ञानिकों और अधिकारियों के हवाले से इसे खारिज कर दिया। इस बीच कोकर की ही तरह बीमारी के अन्य मामलों में न्यू जर्सी और कैलिफोर्निया की अदालतों ने उस कंपनी को क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। 2016 में अमेरिका के मिसौरी राज्य में सेंट लुइस सर्किट कोर्ट ने उस कंपनी पर 720 लाख अमेरिकी डॉलर का जुर्माना ठोक दिया।
इसके बावजूद बेबी पाउडर का उत्पादन रोका नहीं गया। इस बीच कोकर की 2009 में 63 साल की उम्र में मृत्यु हो गई। उन्हें 4.69 अरब डॉलर की क्षतिपूर्ति का आदेश हुआ था, मगर कंपनी ने उसके खिलाफ अपील की। कोकर की बेटी ने मुकदमा जारी रखा। इस बीच कोकर के वकील ने कंपनी की आंतरिक रिपोर्ट हासिल कर ली, जिसमें कंपनी के वैज्ञानिक खुद मानते थे कि बेबी पाउडर में एस्बेस्टस की मात्रा है। अब उस कंपनी की करतूत सामने आ चुकी थी। कनाडा ने तुरंत अपने यहां उस पर रोक लगा दी।
इन फैसलों से भारतीय स्वास्थ्य संगठनों का सतर्क होना जरूरी है, क्योंकि वह कंपनी भारतीय बाल रोग परिषद के नाम का भी इस्तेमाल करती रही है। यह बेहद चौंकाने वाली बात है कि ऐसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में पूरे चिकित्सा तंत्र को शामिल कर लिया जाता है और इस तरह गैरजरूरी उत्पादों की वैधता स्थापित कर दी जाती है।
दवा कंपनियों द्वारा तैयार किए गए स्वास्थ्य संबंधी अनावश्यक प्रचार की गिरफ्त में मुल्क की आम जनता ही नहीं, मध्यवर्ग का व्यापक तबका भी शामिल हो रहा है। बच्चों की सेहत के लिए बने किसी गैरजरूरी उत्पाद की वकालत अगर डाक्टरों की कोई शीर्ष संस्था करे, तो जाहिर है, आम आदमी उस उत्पाद के प्रति आकर्षित होगा। आखिर सौंदर्य प्रसाधन या दवा बनाने वाली कंपनियों द्वारा चिकित्सकों या चिकित्सा संस्थानों को दी गई धनराशि को घूस क्यों न माना जाए?
सौंदर्य प्रसाधन या दवा बनाने वाली कंपनियों का खेल कोई नया नहीं है। बच्चों की हड्डियों को मजबूत करने के लिए तेल, त्वचा की हिफाजत के लिए अलग तेल और नहाने के लिए भिन्न प्रकार के साबुन के प्रयोग की वकालत की जाती है। यह दवा कंपनियों के भ्रामक प्रचार पर आधारित धन कमाने का एक षड्यंत्र है। इसे जितनी जल्दी समझ लिया जाए, वह उतना ही अच्छा होगा।
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खान मजदूरों में यह बीमारी पाई जाती रही है, पर कोकर परेशान थीं कि एस्बेस्टस के संपर्क में वह आईं कैसे। उनके वकील से उन्हें पता चला कि बेबी पाउडर की वजह से ही उन्हें कैंसर हुआ है। उन्होंने उस कंपनी के खिलाफ मुकदमा दायर किया। कंपनी की अपनी आंतरिक जांच में 1957-58 में ही बेबी पाउडर में एक से तीन प्रतिशत एस्बेस्टस पाया गया था, पर कंपनी ने इसका खुलासा नहीं किया।
रॉयटर्स ने 1971 से 2000 तक बेबी पाउडर की जांच में एस्बेस्टस की मात्रा की पुष्टि की, पर उस कंपनी ने निजी जांच एजेंसियों, अपने वैज्ञानिकों और अधिकारियों के हवाले से इसे खारिज कर दिया। इस बीच कोकर की ही तरह बीमारी के अन्य मामलों में न्यू जर्सी और कैलिफोर्निया की अदालतों ने उस कंपनी को क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। 2016 में अमेरिका के मिसौरी राज्य में सेंट लुइस सर्किट कोर्ट ने उस कंपनी पर 720 लाख अमेरिकी डॉलर का जुर्माना ठोक दिया।
इसके बावजूद बेबी पाउडर का उत्पादन रोका नहीं गया। इस बीच कोकर की 2009 में 63 साल की उम्र में मृत्यु हो गई। उन्हें 4.69 अरब डॉलर की क्षतिपूर्ति का आदेश हुआ था, मगर कंपनी ने उसके खिलाफ अपील की। कोकर की बेटी ने मुकदमा जारी रखा। इस बीच कोकर के वकील ने कंपनी की आंतरिक रिपोर्ट हासिल कर ली, जिसमें कंपनी के वैज्ञानिक खुद मानते थे कि बेबी पाउडर में एस्बेस्टस की मात्रा है। अब उस कंपनी की करतूत सामने आ चुकी थी। कनाडा ने तुरंत अपने यहां उस पर रोक लगा दी।
इन फैसलों से भारतीय स्वास्थ्य संगठनों का सतर्क होना जरूरी है, क्योंकि वह कंपनी भारतीय बाल रोग परिषद के नाम का भी इस्तेमाल करती रही है। यह बेहद चौंकाने वाली बात है कि ऐसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में पूरे चिकित्सा तंत्र को शामिल कर लिया जाता है और इस तरह गैरजरूरी उत्पादों की वैधता स्थापित कर दी जाती है।
दवा कंपनियों द्वारा तैयार किए गए स्वास्थ्य संबंधी अनावश्यक प्रचार की गिरफ्त में मुल्क की आम जनता ही नहीं, मध्यवर्ग का व्यापक तबका भी शामिल हो रहा है। बच्चों की सेहत के लिए बने किसी गैरजरूरी उत्पाद की वकालत अगर डाक्टरों की कोई शीर्ष संस्था करे, तो जाहिर है, आम आदमी उस उत्पाद के प्रति आकर्षित होगा। आखिर सौंदर्य प्रसाधन या दवा बनाने वाली कंपनियों द्वारा चिकित्सकों या चिकित्सा संस्थानों को दी गई धनराशि को घूस क्यों न माना जाए?
सौंदर्य प्रसाधन या दवा बनाने वाली कंपनियों का खेल कोई नया नहीं है। बच्चों की हड्डियों को मजबूत करने के लिए तेल, त्वचा की हिफाजत के लिए अलग तेल और नहाने के लिए भिन्न प्रकार के साबुन के प्रयोग की वकालत की जाती है। यह दवा कंपनियों के भ्रामक प्रचार पर आधारित धन कमाने का एक षड्यंत्र है। इसे जितनी जल्दी समझ लिया जाए, वह उतना ही अच्छा होगा।