कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर क्या सच, क्या झूठ: तकनीक के कारण अब निजी जीवन में हस्तक्षेप आसान, भरोसा सोच-समझकर करें
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विस्तार
ज्यादातर शहरी शिक्षित भारतीय और शायद कई अन्य लोग, जो गांवों में रहते हैं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) शब्द से परिचित हैं। लेकिन यह जानना ही अब पर्याप्त नहीं है कि एआई का मतलब एक ऐसी तकनीक है, जो कंप्यूटरों और मशीनों को मानवीय ढंग से सीखने, समझने, समस्या का समाधान करने, निर्णय लेने और रचनात्मकता व स्वायत्तता का अनुकरण करने में सक्षम बनाती है, बल्कि यह जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि धोखेबाज कैसे एआई का उपयोग भोले-भाले लोगों को लूटने के लिए कर सकते हैं। हाल ही में दिल्ली पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया है, जो अपने साथियों के साथ मिलकर भोले-भाले लोगों को एआई आधारित ट्रेडिंग के झांसे में फंसाकर ठगी कर रहे थे। जांच में खुलासा हुआ है कि आरोपी धोखाधड़ी करने के लिए दिग्गज उद्योगपतियों की फर्जी तस्वीरों और वीडियो का इस्तेमाल करते थे, ताकि लोगों को यह विश्वास हो जाए कि वे सही जगह अपना निवेश कर रहे हैं।
बीते साल दिल्ली पुलिस को मिली शिकायत में दक्षिणी दिल्ली निवासी पीड़ित ने बताया कि उसने सोशल मीडिया पर वीडियो विज्ञापन में देखा कि एक दिग्गज उद्योगपति एआई आधारित ट्रेडिंग का प्रचार कर रहे थे। झांसे में आकर उसने मेल के माध्यम से मार्केटिंग प्रतिनिधि से संपर्क किया। इसके बाद एक व्यक्ति ने व्हाट्सएप नंबर पर उसे एक वेबसाइट की लिंक भेजी। शिकायतकर्ता को एक व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ा गया और उसे विश्वास दिलाया गया कि बिटकॉइन खरीदकर बहुत सारा पैसा कमाया जा सकता है। पुलिस ने बताया कि पीड़ित ने फर्जी प्लेटफॉर्म के माध्यम से कई बार रुपयों के लेन-देन में 9.53 लाख रुपये का निवेश किया। पुलिस जांच में एक ऐसी फर्म का पता चला है, जो फर्जी कंपनियों के लिए मुखौटा निदेशकों और स्वामित्व का इस्तेमाल करती थी और इनके नाम पर बैंक खाते खोलने में मदद करती थी।
नए तरह के साइबर अपराधों से जुड़े मामलों का यह तो बस एक उदाहरण है, जिसमें धोखेबाज फर्जी योजनाओं को संचालित करने के लिए एआई का उपयोग कर प्रमुख हस्तियों और उद्योगपतियों के नाम का दुरुपयोग करते हैं। धोखेबाज आकर्षक और भ्रामक तरीके से अपनी योजनाओं को पेश कर लोगों को फंसाते हैं। इसके लिए वॉइस क्लोनिंग और डीपफेक जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। यह डिजिटल भारत का कमजोर पक्ष है, जहां अधिक से अधिक लोगों की डिजिटल दायरे में मौजूदगी है, लेकिन लोग भोले बने हुए हैं और अक्सर जल्द पैसा कमाने के चक्कर में आसानी से धोखा खा जाते हैं। ठगे जाने वाले लोगों ने ‘एआई’ शब्द सुना है, लेकिन धोखेबाज इस तकनीक का किन तरीकों से इस्तेमाल कर सकते हैं, इनकी उन्हें कम जानकारी है। देश भर में डिजिटल वित्तीय लेन-देन अपनाने पर जोर दिया जा रहा है, कई लोग यूपीआई जैसी भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन आम तौर पर डिजिटल बचाव और सुरक्षा को लेकर अब भी जागरूकता की कमी है।
यह समस्या किसी विशेष क्षेत्र या राज्य की नहीं है। यहां तक कि उच्च साक्षरता और शिक्षा वाले राज्यों में भी एआई से संबंधित धोखाधड़ियां होती रही हैं। बीते वर्ष एक धोखेबाज ने एआई निर्मित डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल कर केरल के कोझिकोड निवासी 73 वर्षीय सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी से 40 हजार रुपये ठग लिए थे। विश्वसनीय आपात स्थिति निर्मित करने के लिए आवाज और वीडियो में छेड़छाड़ की गई। फर्जी कॉल को वैध दर्शाने के लिए धोखेबाजों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कुछ तकनीकों जैसे-पीड़ित की संपर्क जानकारी, नाम और अन्य उपयोगी सूचनाओं का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए इनके प्रति जागरूक होना बहुत जरूरी है।
उदाहरण के लिए, आवाज का सैंपल हासिल करने के लिए जालसाजों द्वारा गलत नंबर से फोन कॉल की जाती है या फिर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए ऑडियो और वीडियो के जरिये जुटाते हैं। इसके बाद इन नमूनों का इस्तेमाल जिसे निशाना बनाना होता है, उसकी आवाज के पैटर्न, स्वर और बातचीत की विशेषताओं को सीखने तथा उनकी नकल करने के लिए एआई एल्गोरिदम को प्रशिक्षित करने के लिए किया जाता है। पिछले वर्ष तमिलनाडु पुलिस ने एक सलाह जारी कर लोगों को सामान्य जालसाजियों, जैसे-वॉइस क्लोनिंग धोखाधड़ी से बचाव के लिए जागरूक किया और चेतावनी जैसे संकेतकों पर नजर रखने के लिए कहा गया। इसके जरिये लोगों को आगाह किया गया कि उन हालात में विशेष सतर्कता बरतें, जब कोई असामान्य तरीके से पैसे मांगे, विशेषकर जब कोई तनावपूर्ण स्थिति में हो और भावनात्मक रूप से विचलित हो। इसके साथ ही सुरक्षित संचार माध्यमों, जैसे-एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप या वीडियो कॉल का उपयोग करके तत्काल वित्तीय सहायता मांगने वाले लोगों की पहचान सत्यापित करने का आह्वान भी किया गया।
इस तरह की जालसाजी के परिणाम वैश्विक स्तर पर महसूस किए जा रहे हैं। हांगकांग में पिछले साल तकनीक से धोखाधड़ी करने का एक हाईप्रोफाइल मामला सामने आया था, जिसमें जालसाज ने डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल कर एक कंपनी का मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) बनकर 2.5 करोड़ डॉलर की चपत लगाई थी। इस तरह की तकनीक के बढ़ने का मतलब है कि अब न केवल हाईप्रोफाइल, बल्कि कोई भी व्यक्ति इसका शिकार हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया में धोखेबाजों ने लोगों को बिटकॉइन में निवेश करने के लिए धोखा देने के प्रयास में क्वींसलैंड के प्रीमियर स्टीवन माइल्स की आवाज का क्लोन बनाया। अमेरिका में एक किशोर की आवाज का क्लोन बनाकर धोखेबाजों ने अपहरण का झांसा देकर उसके माता-पिता से फिरौती मांगी।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सच और झूठ के बीच की रेखा को धुंधला कर रहा है और हम ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जहां छलना इतना आसान कभी नहीं था। एआई के प्रस्तुत अवसरों के साथ-साथ उससे जुड़े खतरों को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है। चूंकि तकनीक अपराधियों के लिए हमारे निजी जीवन में हस्तक्षेप को आसान बना रही है, इसलिए इसके उपयोग को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूक रहना जरूरी हो गया है। एआई के उदय ने तस्वीर बनाने, लिखने, आवाज निर्माण और मशीन लर्निंग के लिए संभावनाएं निर्मित की हैं। लेकिन एआई धोखेबाजों को लोगों का पैसा ऐंठने का नया तरीका भी प्रदान करता है। नई तकनीक समेत किसी भी व्यक्ति या किसी चीज पर अंधविश्वास करना मुसीबत में डाल सकता है। एआई धोखाधड़ी के दौर में भरोसा भी सतर्कता से करें।