आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बचती जिंदगियां
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बारे में अलग-अलग राय है। कोई इसे डरावना बताता है, तो कोई जटिल। किसी के मुताबिक, इसे जरूरत से ज्यादा महत्व मिला है, तो कोई इसे आश्चर्यजनक बताता है। उदाहरण के लिए, सैनफ्रांसिस्को स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधार्थी इस साल सोचने और बोलने की क्षमता खो चुके लोगों में ब्रेन मॉनिटर स्थापित कर पाने में सफल हुए। इसका उद्देश्य स्ट्रोक, एएलएस या दौरों के कारण बोलने की क्षमता खो चुके लोगों को बातचीत कर पाने में सक्षम बनाना है। यह एक असाधारण उपलब्धि है।
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बारे में अलग-अलग राय है। कोई इसे डरावना बताता है, तो कोई जटिल। किसी के मुताबिक, इसे जरूरत से ज्यादा महत्व मिला है, तो कोई इसे आश्चर्यजनक बताता है। उदाहरण के लिए, सैनफ्रांसिस्को स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधार्थी इस साल सोचने और बोलने की क्षमता खो चुके लोगों में ब्रेन मॉनिटर स्थापित कर पाने में सफल हुए। इसका उद्देश्य स्ट्रोक, एएलएस या दौरों के कारण बोलने की क्षमता खो चुके लोगों को बातचीत कर पाने में सक्षम बनाना है। यह एक असाधारण उपलब्धि है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता जिस एक क्षेत्र में हमारी असंदिग्ध मदद कर सकती है, वह मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र है। बीमारियों के बारे में पता करने के लिए कई तरह की जांच व्यवस्था है। लेकिन कोई भी जांच ठीक-ठीक यह नहीं बता सकती कि अमुक व्यक्ति को डिप्रेशन है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंदों के डॉक्टर इतने साधारण होते हैं कि वे किसी व्यक्ति के डिप्रेशन के बारे में नहीं बता सकते, न ही यह भविष्यवाणी कर सकते हैं कि अमुक व्यक्ति आनेवाले दिनों में डिप्रेशन का शिकार हो सकता है। हमारे आसपास बहुत-से ऐसे लोग हैं, जो आत्महत्या करने के बारे में सोचते हैं। लेकिन पहले से यह कह पाना बहुत कठिन है कि कौन-सा व्यक्ति खुद को खत्म कर देने के बारे में गंभीर है। बहुत-से लोग तब तक अपना इलाज नहीं करवाते, जब तक उनकी बीमारी गंभीर न हो जाए।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का लाभ यह है कि इसका इस्तेमाल कर डॉक्टर मरीज को पहले से यह बता पाने में सक्षम हो सकते हैं कि कौन अगले सप्ताह डिप्रेशन में जा सकता है या कौन खुद को मारने की कोशिश कर सकता है। क्राइसिस टेक्स्ट लाइन आत्महत्याओं को रोकने की एक हॉटलाइन है, जिस पर फोन करने के बजाय लोग टेक्स्ट मैसेज करते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल कर इस हॉटलाइन से संबंधित संगठन ने करीब दस करोड़ टेक्स्ट मैसेज का विश्लेषण किया है। इस संगठन का लक्ष्य काउंसिलरों की मदद करते हुए उन्हें समझाना है कि किसकी मानसिक बीमारी पर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
इन टेक्स्ट मैसेज का विश्लेषण बेहद दिलचस्प है। हमने यह मान लिया है कि जो लोग उठते-बैठते आत्महत्या शब्द का इस्तेमाल करते हैं, वे बेहद खतरनाक मानसिक स्थिति से गुजर रहे हैं। लेकिन अध्ययन बताता है कि जो लोग एडविल या इबुप्रोफेन जैसी दवाओं का बार-बार नाम लेते हैं, उनके आत्महत्या कर लेने की आशंका हमेशा आत्महत्या की बात करने वालों की तुलना में चौदह गुना अधिक होती है। ऐसे ही मैसेज में रोने वाली इमोजी का बार-बार इस्तेमाल करने वाले लोगों को आत्महत्या की बात कहने वाले लोगों की तुलना में मानसिक चिकित्सा की ग्यारह गुना अधिक जरूरत होती है।
मानसिक बीमारियों को मापने के दूसरे तरीके भी हैं। माइंडस्ट्रांग नाम की एक कंपनी स्मार्टफोन के इस्तेमाल के तौर-तरीके देखकर ही अवसाद की पहचान कर लेती है। अपनी किताब डीप मेडिसिन में एरिक टोपोल ने यह बताने की कोशिश की है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किस तरह दुनिया भर में मानसिक बीमारी की दवा बदलने में सक्षम हो रहा है। पिछले सप्ताह एक हेल्थ कॉन्फ्रेंस में मुझे टोपोल से मिलने और बातें करने का अवसर मिला। उनका कहना था कि बीमारियों की पहचान और समाधान सुझाने, सही समय पर जांच करने आदि के मोर्चे पर हम अब भी बहुत पीछे हैं।
जब हम किसी रोगी के बारे में डॉक्टर के निष्कर्ष और बीमारी से उस व्यक्ति की मौत की रिपोर्ट पढ़ते हैं, तो दोनों में भारी फर्क पाते हैं। सबसे ज्यादा बिकने वाली दस दवाओं का सेवन दुनिया की तीन चौथाई आबादी करती है। लेकिन इन दवाओं की बिक्री के आंकड़े बीमारी से निदान की गारंटी नहीं हैं। यानी अनेक रोगियों को ये दवाएं गलती से या चिकित्सकों की अज्ञानता के कारण दी जाती हैं। एक दवा या भोजन के एक जैसे चिकित्सकीय निर्देशों से बीमारी का उन्मूलन संभव नहीं है, क्योंकि लोग एक दूसरे बिल्कुल अलग होते हैं। ऐसे में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की जरूरत बढ़ जाती है।
हम एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जिसमें अपरिचित लोगु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिये हमारी बातचीत के तरीकों से हमारी भावुक दुनिया के अंदरूनी विवरणों के बारे में जान पाने में सक्षम होंगे।
© The New York Times 2019