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यूरो से अलग हो जाए ग्रीस!
पॉल क्रुगमैन
Updated Wed, 01 Jul 2015 02:33 AM IST
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यदि ग्रीस के मतदाता यूरोपीय आयोग, यूरोपीय सेंट्रल बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबाव में मितव्ययिता बढ़ाने के पक्ष में मतदान करते हैं, तो प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ सकता है।
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पिछले कुछ समय से यह महसूस किया जा रहा है कि यूरो का सृजन एक गंभीर चूक थी। यूरोप की परिस्थितियां कभी ऐसी नहीं रहीं, जिसमें कोई एकल मुद्रा सफल हो सके।
वहां ऐसा कोई वित्तीय या बैंकिंग संघ नहीं था, जो हालात को नियंत्रित रख सकता था। मसलन अमेरिका की तरह— जहां फ्लोरिडा में आवास ऋण का बुलबुला फूटने पर न तो वरिष्ठ नागरिकों की चिकित्सा सेवा पर कोई फर्क पड़ने दिया गया और न ही बैंकों में जमा उनकी पूंजी को नुकसान हुआ— वहां कोई ऐसी व्यवस्था नहीं थी।
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किसी करेंसी यूनियन या मुद्रा संघ में शामिल होने की तुलना में उससे हटना हालांकि बेहद कठोर और भयावह फैसला है और अभी हाल तक इस महाद्वीप की सबसे संकटग्रस्त अर्थव्यवस्थाएं तबाही के कगार तक बार-बार पहुंचती रही हैं। सरकारों को कर्जदाताओं की मितव्ययिता की कठोर मांगों के आगे झुकना पड़ा है। हालांकि यूरोपीय सेंट्रल बैंक बाजार में अफरा-तफरी को नियंत्रित करने में सफल रहा है।
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लेकिन ग्रीस (यूनान) आज उस स्थिति में पहुंच चुका है, जहां से उसका लौटना मुश्किल है। बैंक अस्थायी रूप से बंद हो चुके हैं और सरकार ने पूंजी पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं। देश से बाहर ले जाने वाले धन को भी नियंत्रित किया गया है।
इस बात की पूरी संभावना है कि सरकार को जल्द ही पेंशन और पारिश्रमिक का भुगतान प्रतिभूति के रूप में करना पड़े। एक तरह से यह समानांतर मुद्रा की स्थापना करने जैसा होगा।
अगले हफ्ते देश में इस बात पर जनमत संग्रह होना है कि क्या यूरोपीय आयोग, यूरोपीयन सेंट्रल बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की तिकड़ी की मितव्ययिता की मांग के आगे झुका जाए या नहीं। इस तिकड़ी को कर्जदाताओं के हितों का प्रतिनिधि माना जाता है।
ग्रीस को जनमत संग्रह में इस मांग को खारिज कर देना चाहिए और ग्रीक सरकार को जरूरत पड़ने पर यूरो से हटने के लिए तैयार रहना चाहिए। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं, इसे समझने के लिए आपको इस बात का एहसास होना चाहिए कि अभी तक आपने ग्रीस की फिजूलखर्ची और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार के बारे में जो कुछ सुना है, उसमें से अधिकांश गलत है।
यह बिल्कुल सच है कि ग्रीक सरकार ने पिछले दशक के अंतिम वर्षों में अपनी आय से अधिक खर्च किया। लेकिन उसके बाद से उसने लगातार अपने खर्च में कटौती की है और कर बढ़ाए हैं। सरकारी रोजगार 25 फीसदी से अधिक गिर चुका है और पेंशन (जो वास्तव में बहुत अधिक थी) में तेजी से कटौती की गई है।
यदि आप मितव्ययिता के सारे उपायों को एक साथ करके देखें, तो पता चलेगा कि मूल घाटे को खत्म करने के लिए ये न केवल पर्याप्त हैं, बल्कि इससे बड़ा सरप्लस तक इकट्ठा हो सकता है। लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो सका? इसलिए क्योंकि ग्रीस की अर्थव्यवस्था मितव्ययिता के इन उपायों के कारण ध्वस्त हो गई और राजस्व गिर गया।
अर्थव्यवस्था की इस गति का यूरो से काफी हद तक संबंध है, जिसने ग्रीस को आर्थिक संकट में डाल दिया है। ऐसे मामले हैं, जब मितव्ययिता ने सफलतापूर्वक देशों को मंदी में डूबे बिना घाटे को नियंत्रित करने में मदद की है, वहां बड़े पैमाने पर मुद्रा का अवमूल्यन किया गया, जिससे निर्यात और प्रतिस्पर्धात्मक हो गया।
1990 के दशक में कनाडा में ऐसा किया गया था और अभी हाल में आइसलैंड में। लेकिन ग्रीस के पास अपनी मुद्रा नहीं होने से ऐसा कोई विकल्प मौजूद नहीं है।
इसलिए मैं 'ग्रेक्जिट' (ग्रीक एक्जिट) यानी ग्रीस के यूरो जोन से बाहर निकलने की वकालत कर रहा हूं। हालांकि ग्रेक्जिट के साथ हमेशा यह आशंका जुड़ी रही है कि इससे वित्तीय अफरा-तफरी मच सकती है, बैंकिंग प्रणाली बदहवासी में की जाने वाली निकासी से ध्वस्त हो सकती है, कारोबार लड़खड़ा सकता है और कर्ज की कानूनी स्थिति अनिश्चित हो सकती है।
इसीलिए ग्रीस की सरकारें मितव्ययिता की मांगों के आगे झुकती आई हैं और इसलिए ही सत्तारूढ़ वामपंथी गठबंधन सिरिजा मितव्ययिता को स्वीकार करने का इच्छुक था, जो पहले ही थोपी जा चुकी है। वह अब सिर्फ यह कह रहा है कि और अधिक मितव्ययिता की मांग न की जाए।
लेकिन 'तिकड़ी' इसके लिए तैयार नहीं है। बावजूद इसके, अहम बिंदु यह है कि ग्रीस से कहा जा रहा है कि वह या तो इस प्रस्ताव को स्वीकार करे या फिर उसे कुछ भी नहीं मिलेगा। पिछले पांच वर्ष से इसी नीति पर चला जा रहा है।
ग्रीस के प्रधानमंत्री एलिक्सिस सिप्रास इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि यह उनके राजनीतिक अस्तित्व को खत्म कर देगा।
यदि अगले हफ्ते होने वाले जनमत संग्रह में ग्रीस के मतदाता तिकड़ी से टकराव से भय की वजह से कहीं इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करें, तो मुमकिन है कि उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़े।
लेकिन उन्हें तीन कारणों से ऐसा नहीं करना चाहिए। पहला, हम जानते हैं कि और कठोर मितव्ययिता का मतलब होगा बर्बादीः क्योंकि पांच वर्ष बाद ग्रीस सबसे बुरी स्थिति में होगा। दूसरा, ग्रेक्जिट से उत्पन्न भय से जो नुकसान होना था, वह हो चुका है।
बैंकों में ताला लग चुका है, पूंजी के प्रवाह को नियंत्रित कर दिया गया है, लिहाजा और अधिक क्या नुकसान हो सकता है।
और आखिर में तिकड़ी के अल्टीमेटम के आगे झुकने से ग्रीस की स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी। तिकड़ी के अधिकारियों के दावों पर मत जाइए, वे सिर्फ टेक्नोक्रेट्स हैं।
वह सिर्फ सपने दिखा सकते हैं। यह मामला विश्लेषण का नहीं है, इसका संबंध कर्जदाताओं को और मजबूत करने से है, ताकि वे ग्रीस की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से नियंत्रित करने लगें। इसलिए इस अनिश्चय पर विराम लगाने का समय आ गया है।