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आंसुओं की भी अपनी सत्ता है!

Sun, 06 Jan 2013 03:15 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 06 Jan 2013 03:15 PM IST
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article of patralekha chatrjee

वर्ष 2013 की शुरुआत आम लोगों के अपने हक के लिए लड़ने का जज्बा दिखाने के साथ हुई है। दिल्ली में एक चलती हुई बस में 23 वर्षीय फिजियोथेरेपी छात्रा के गैंगरेप और यातना के बाद हुई मौत ने लोगों को आलस्य छोड़कर सड़कों उतरने पर मजबूर कर दिया। पिछले कुछ दिनों से युवा, पुरुष और महिलाएं कड़ाके की ठंड में सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा की मांग को लेकर पुलिस के डंडों और अवरोधों को चुनौती देते हुए जंतर-मंतर और राजधानी की सड़कों पर इकट्ठे हो रहे हैं। यह सिर्फ दिल्ली की बात नहीं है। देश के दूसरे शहरों में भी ऐसे ही विरोध प्रदर्शन और मोमबत्ती जुलूस निकाल जा रहे हैं।

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शहरी युवा खासकर महिलाएं कह रही हैं कि इस बार वे किसी झूठी सांत्वना से नहीं मानने वाली। इसने राजनीतिक वर्ग को हिला कर रख दिया है, जो कि पहले ही बड़े घोटालों और रोजमर्रा के भ्रष्टाचार को लेकर जनता के विरोध का सामना कर चुका है। इसके बावजूद यह वर्ग जवाबदेह नहीं बन पाया है। उस छात्रा के साथ हुई बर्बरता पर आंसू बहाने वालों में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो ऐसी पार्टियों से जुड़े हैं, जिनके कुछ सदस्यों पर पहले ही बलात्कार के आरोप दर्ज हैं।
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मैं जब यह कॉलम लिख रही हूं, तब गैंगरेप और हत्या के छह आरोपियों में से पांच के खिलाफ चार्जशीट दायर हो चुकी है और छठे नाबालिग आरोपी पर दूसरे न्यायालय में चार्जशीट दायर होगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इससे जमीनी स्तर पर क्या बदलाव होगा? इसका जवाब किसी के पास भी नहीं है। मेरे ख्याल से अगर बलात्कार की समस्या का हल ढूंढना है, तो हमें इसकी जड़ तक पहुंचना होगा। इसका अर्थ है कि इसे महिलाओं के खिलाफ हिंसा और लड़कियों को कमतर आंकने की प्रवृत्ति से जोड़ कर देखना होगा।
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इसमें संदेह नहीं कि हमें पुलिस सुधारों, त्वरित न्यायालयों और तेज गति से काम करने वाले न्यायिक तंत्र की जरूरत है, ताकि यौन हमलों और बलात्कार जैसे अपराधों के जोखिम को कम किया जा सके। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि बलात्कार एक ऐसे पूर्वाग्रह की जहरीली अभिव्यक्ति है, जिसके लिए महिला के जीवन का कोई मूल्य नहीं है। भारत में न सिर्फ बलात्कार बढ़े हैं, बल्कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले विभिन्न अपराधों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों की मानें तो 2010 में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों की 2,13,585 वारदातों की तुलना में 2011 में 7.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ ऐसी 2,28,650 वारदातें दर्ज की गईं।

आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों को अंजाम देने वाले ज्यादातर सामान्य लोग थे, जो सोचते थे कि वे बच निकलेंगे या मामूली सजा पाएंगे। ऐसे कानूनों और उनके अमल को सख्त किए जाने की जरूरत है।  ध्यान देने वाली बात है कि जो लोग गर्भ में भ्रूण की हत्या करने में या लड़की होने के कारण किसी नवजात को मारने में नहीं हिचकते या जो भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक में लड़के और लड़की के साथ असमान व्यवहार करते हैं या एक महिला को इसलिए जला देते हैं कि वह पर्याप्त दहेज नहीं लाई, क्या ऐसे लोगों से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे किसी महिला पर एक आदमी या किसी समूह के जुल्म से व्यथित होंगे ? छात्रा के गैंगरेप और हत्या के ताजा मामले को लेकर लोगों में जो नाराजगी और गुस्सा दिखा, उसकी वजह वारदात में दिखी क्रूरता थी। लेकिन इस तथ्य पर ध्यान देना बहुत जरूरी है कि बलात्कार अपने आप में एक जघन्य अपराध है।

यौन अपराधों और बलात्कार को रोकने की शुरुआत सत्ता प्रतिष्ठानों से करनी होगी। 2009 के लोकसभा चुनावों में बहुत से राजनीतिक दलों ने ऐसे छह प्रत्याशियों को टिकट दिया जिनपर बलात्कार के आरोप लगे थे। इसके अलावा बहुत से दलों ने राज्य चुनावों में भी पिछले पांच वर्षों में बलात्कार के आरोपी 27 लोगों को चुनाव में खड़ा किया। इन 27 प्रत्याशियों में से 10 उत्तर प्रदेश से और पांच बिहार से थे। इन दलों के जो राजनीतिज्ञ टेलीविजन पर ऐसी वारदातों के खिलाफ उग्र होते दिखाई दे रहे हैं, वे अपने ही दल के ऐसे सदस्यों के खिलाफ मुंह क्यों नहीं खोलते।

यह सच है कि आज देश में राजनीति, कारोबार और विभिन्न व्यवसायों में कई कामयाब और ताकतवर महिलाएं दिख रही हैं। लेकिन इससे गांवों और भीड़ से भरे शहरों की ज्यादातर महिलाओं के जीवन में कोई सुधार नहीं आता दिखता। एक लड़की का संघर्ष तो उसके जन्म लेने के पहले ही शुरू हो जाता है। कई बार तो उसे जन्म लेने तक का मौका नहीं मिलता। मैंने कई वर्ष पहले पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के एक सरकारी अस्पताल की यात्रा की। वहां सघन चिकित्सा कक्ष में कई बीमार नवजात बच्चे भर्ती थे। मैंने गौर किया कि उनमें से ज्यादातर लड़के थे। डॉक्टरों ने बताया कि ज्यादातर गरीब परिवार अपनी कमाई को लड़कियों पर खर्च करने की इच्छा नहीं रखते। गैर-कानूनी होने के बावजूद लाखों लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में कर दिया जाता है। इसके अलावा दहेज हत्या के मामले भी सामने आए हैं।


दरअसल, यह केवल गरीबों और अशिक्षितों की समस्या नहीं है। अगर महिलाओं के खिलाफ बढ़ते हुए अपराधों पर रोक लगानी है, तो जमीनी स्तर पर लड़कियों और महिलाओं को कमतर आंकने और उनके साथ भेदभाव की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा।

(पत्रलेखा चटर्जी वरिष्ठ पत्रकार हैं। विकास के मुद्दों पर दुनिया की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में नियमित स्तंभ लेखन)

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