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जब मैंने दिनकर को देखा
कैलाश वाजपेयी
Updated Mon, 04 Feb 2013 01:46 PM IST
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लखनऊ के विधानसभा मार्ग के निकट ही स्थित है एक और भवन 'दारूल शफा'। हमने इसी के सभागार में, पहली बार रामधारी सिंह को देखा। गौर वर्ण, आकर्षक देहयष्टि और रोमांचित कर देने वाली काव्य-पाठ शैली। दिनकर जी की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक चिंतनपरक कृति, जिसकी भूमिका पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है, का अवगाहन हम पहले ही कर चुके थे।
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उस शाम दिनकर जी के एकल काव्य पाठ के बाद सारी रात यह सोचते बीती कि सत्ताधीशों से घिरे दिनकर जी अपने रचनाधर्मी स्वत्व की रक्षा कैसे कर पाते होंगे? जबकि रचनाकार, लोकजीवन से मिली ऊर्जा का कलन कर एक सर्वथा नई कृति को जन्म देता है और जैसे ही उसके द्वारा रची गई यह कलाकृति संपन्न हुई नहीं कि विसर्जित हो जाती है, उसी जनसमुद्र में जहां से वह जन्मी थी, जहां उसका उत्स था।
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दिनकर जी से एक औपचारिक परिचय तो उसी शाम हो चुका था। उनके साथ रचना पाठ की बेला तब आई, जब सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया। पहले कभी डॉ. राममनोहर लोहिया ने भविष्यवाणी की थी कि ‘चाइना विल इनवेड इंडिया’ और यही हुआ। अस्तु दिल्ली दूरदर्शन ने एक काव्य गोष्ठी का आयोजन इसी उद्देश्य से किया। जिसकी अध्यक्षता दिनकर जी ने की, तब तक हम भी लखनऊ विश्वविद्यालय से अपना शोध प्रबंध कराकर, मुंबई में एक वर्ष नौकरी कर अंततः दिल्ली विश्वविद्यालय का हिस्सा बन चुके थे। गोष्ठी में हमारे जैसे अदना कवि का मन भयसंकुल था, कहां दिनकर और बच्चन जैसे कवि और कहां हम।
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दिनकर जी ने रचना पढ़ी-
तान-तान फन ब्याल,
कि तुझ पर मैं बांसुरी बजाऊं
हमारी रचना-
मेरा आकाश छोटा हो गया है / मुझे नींद नहीं आती...की सराहना करते हुए दिनकर जी ने हमें अपने सरकारी आवास पर आने के लिए कहा। अगली शाम हम गए। दिनकर जी के पास डॉ. कमलारत्नम बैठी हुई थीं। दिनकर जी ने परिचय कराया। उन्होंने आशीष देते हुए पास बिठा लिया। चर्चा चीनी आक्रमण की ही चल रही थी। दिनकर जी ने कहा, ‘देखिए कमला जी, हमारी विदेश नीति का आधार है पंचशील, जिनकी वजह से हम विश्वमैत्री का स्वप्न देखते हैं, जबकि चीन लाल किताब वालों का देश है। जो यह जानता है कि शक्ति तोप के मुंह में बसती है।’
इसके बाद वर्षों दिनकर जी के यहां जाना होता रहा। वे जब 'शुद्ध कविता की खोज' लिख रहे थे, तब अक्सर फ्रांस के प्रतीक और बिंबवादी कवियों के बारे में विचार-विमर्श किया करते थे। एक शाम हमने दिनकर जी से पूछा- कितनी द्रुपदा के बाल खुले/कितनी कलियों का अंत हुआ -लिखते समय आपको नहीं लगा कि द्रौपदी पर गंभीरता से सोचा ही नहीं गया। तभी डॉ. कमलारत्नम आ गईं। प्रश्न उन्होंने सुन लिया था। बोलीं, ‘दिनकर क्या बताएंगे, यह कुचक्र तो मर्दवादी सोच का परिणाम है।
चाहे वह वाल्मीकि हों अथवा व्यास, सब कवि एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। सबको ज्ञात है सीता भूमिजा थीं। मां पृथ्वी के समान उसने आजीवन दुःख सहे और तो भी वाल्मीकि अनुसूया से सीता को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिलवाते हैं। उसकी सहिष्णुता वहां बेसंभाल हो जाती है, जब आदिकवि द्वारा लव-कुश से घिरी सीता, राम द्वारा पुनः स्वीकार किए जाने के लिए लाई जाती है। यहां भी वह न क्रुद्ध होती है, न विषाक्त, वह चुपचाप धरित्री मां से अपने लिए एक विवर मांगकर विलीन हो जाती हैं।
यही महाभारतकार ने द्रौपदी के साथ किया। व्यास के शब्दों में वह ‘प्रिया च दर्शनीया च पंडिता च पतिव्रता’ थी। आग की लपटों से जन्मी पूर्णतः तरुणी। नियति ने उसके साथ पहला अन्याय यह किया कि मां-बाप का वात्सल्य उसे मिला ही स्वयंवर के समय। युधिष्ठिर अकारण उठकर घर क्यों चले गए? क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि वे स्वयं भी उस पर आसक्त हुए थे। कुंती ने कहीं बदले की भावना से तो यह नहीं कहा, ‘पांचों भाई मिलकर ग्रहण कर लो।’
युधिष्ठिर का यह कथन, ‘गुरु की आज्ञा माननीय है और गुरुओं में भी सर्वोपरि माता है और मेरी भी यही इच्छा है, ‘मम् चैव मनोगतम्’।’ ये सारी स्थितियां और कथन क्या संकेत नहीं देते कि उसे वस्तु की तरह बरता जा रहा है। और द्रौपदी है कि चुप है। इसके बाद उसे विवश किया जाता है कि वह सुभद्रा को सहरानी की तरह स्वीकार करे।'
आगे डॉ. रत्नम ने द्रौपदी पर हुए अत्याचारों से जुड़े श्लोक उदाहरणार्थ प्रस्तुत करने शुरू किए। द्रौपदी पर हुए अत्याचारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि माथा शर्म से झुक जाता है। कमला जी के समक्ष दिनकर भी चुप थे। अंततः दोनों को प्रणाम कर हम यह सोचते हुए घर लौट आए कि द्रौपदी के प्रति कृष्ण के आकर्षण को ‘प्रतियोगितातीत स्पृहा’ क्यों कहा जाता है।
ऐसी स्पृहा, ऐसी ईहा या ऐसी चाह, जो प्रिय को प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं करती। द्रौपदी भी अजब पहेली थी। पांच-पांच पतियों के होते हुए भी आवाज सिर्फ कृष्ण को ही देती थी। यही नहीं, उसने उत्तरा से भी शायद कहा था, ‘दुःख जब असहनीय लगने लगे, तब सिर्फ कृष्ण को पुकारना।’