एक और युधिष्ठिर

कैलाश वाजपेयी Updated Tue, 27 Nov 2012 11:40 AM IST
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हम जो कहानी कहने जा रहे हैं, वह महाभारत के धर्मराज युधिष्ठिर की नहीं, नरेंद्र देव हॉल में बने मित्रों में से, ज्यादा प्रतिभावान युधिष्ठिर मल्होत्रा की है। यों नरेंद्र देव हॉल में हमें कई और अच्छे लोग मिले, जो मित्र बने, जिनमें से दो नाम विशेष रूप से याद आ रहे हैं। एक भवानीशंकर शुक्ल (श्रीलाल शुक्ल के छोटे भाई), दूसरे विन्दुमाधव मिश्र। मगर युधिष्ठिर का व्यक्तित्व विरल था, युधिष्ठिर का कद छः फीट छः इंच था। युधिष्ठिर सिर्फ सफेद कपड़े पहनता था। वह हमारी ही तरह देर से भोजनागार में आहार के लिए आता था। युधिष्ठिर मितभाषी था। हमारा कमरा बाईं ओर से चलने पर शायद उनतीस नंबर था। युधिष्ठिर का चवालीस। उससे हमारी मैत्री तब हुई, जब हम जापान से पढ़ने आए फूकाजावा से जैन, बुद्धिज्म के विषय में पड़ताल कर रहे थे।

तभी यह छरहरी मुस्कराती काया श्वेत वस्त्र पहने हमारे सामने आकर बैठी। श्वेत वस्त्र क्योंकि हम भी पहनते थे, इसलिए हमें युधिष्ठिर में एक समानता सी दीख पड़ी। युधिष्ठिर से हमने नाम पूछ ही लिया। उच्चारण में युधिष्ठिर ने स्वयं को युधिष्ठिर न कहकर युधिष्ठर कहा। हम अपना बताने ही जा रहे थे कि युधिष्ठिर ने बीच में ही टोककर कहा, ‘आपको जानता कौन नहीं? हमारे विभाग के (जिसे आप छोड़ आए हैं) कई व्याख्याता अक्सर आपका नाम लेकर कुछ-कुछ कहते रहते हैं।’ धीरे-धीरे यह परिचय बढ़ता गया। युधिष्ठिर अंग्रेजी में एम.ए. कर रहा था। मगर किसी तरह के महत्वबोध से पीड़ित नहीं था। एक दफा जब हम दोनों भोजनागार, जो हॉल के धुर दक्षिण में बना था, से लौट रहे थे, युधिष्ठिर ने कहा, ‘जल्दी न हो, तो कुछ देर बैठकर बातें करो।’

युधिष्ठिर ने जब अपना कमरा खोला, तो उसके पढ़ने की मेज पर रखे कांच के नीचे उसी के हाथों मोटे अक्षरों में लिखी एक पंक्ति पढ़ीः पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यते। (ईश्वर के काव्य को देखो, जो न कभी नष्ट होता है, न पुराना पड़ता है।) यह क्या? अंग्रेजी में एम.ए. कर रहे युधिष्ठिर के कमरे में नजर दौड़ाई, तो ऋग्वेद की प्रति का नाम दूर से ही पढ़ा जा रहा था। हमने पूछा, ‘युधिष्ठिर तुम्हें क्या वैदिक साहित्य में भी रुचि है।’

उसने कम से कम शब्दों में बताया कि वह जिस परिवार में पैदा हुआ, वह आर्य समाजी है। (हमें भी याद पड़ा, नानाजी ने बचपन में सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने को दिया था।) सफेद कपड़ों में साम्य के साथ हमें दूसरी समानता रुचि के स्तर पर भी मिली। हमने वेद आदि तो पढ़ा नहीं था, सिर्फ गायत्री मंत्र नानाजी ने बचपन में रटवाया था। या फिर ‘असतो मा सद् गमय आदि।’ आगे की मुलाकातों में युधिष्ठिर ने बताया ऋग्वेद में विश्वदेववाद, एकेश्वरवाद, पाप-पुण्य, सत्य, असत्य, पुनर्जन्म, आस्तिक, नास्तिक जैसे विषयों का निर्वचन किया गया है। उसने कहा, ‘कैलाश, आस्तिक-नास्तिक शब्द अब बिना समझे प्रयोग में लाए जाते हैं।

वैसे मूल रूप से आस्तिक का मतलब है, जो वेदों की सत्ता और सत्यता पर विश्वास करे और नास्तिक का अर्थ है, जो न करे।’ युधिष्ठिर में जहां एक ओर वैदिक संस्कार थे, वहीं दूसरी ओर उसे हिंदी कविता के बारे में भी काफी जानकारी थी। एम.ए. में युधिष्ठिर प्रथम श्रेणी में पास हुआ और उसे तत्काल एस.डी. कॉलेज, अलीगढ़ में नौकरी मिल गई।

हमारा लक्ष्य पी.एच.डी. करके ही विश्वविद्यालय परिसर छोड़ना था। परिणाम यह कि गर्मियों में भी हम नरेंद्रदेव हॉल में ही रहते। रात का खाना हजरत गंज में, सारी शाम आवारागर्दी के बाद मदान रेस्त्रां में खाकर लौटते और दिन में टैगोर लायब्रेरी के बगल में बने बटलर हॉस्टल में कुछ खा-पी लेते।

युधिष्ठिर एक बार जब लखनऊ छोड़कर गया, तो हम यह मान चुके थे कि अब मिलना होगा भी, तो क्योंकर। सही अर्थों में लोग चले नहीं जाते। एक-एक मित्र भीतर कहीं अवचेतन में तिरोहित हो जाता है। सपने में भूला-भटका कहीं आए, वरना कहीं जाता भी नहीं। हम दिसंबर सन् 1959 में मुंबई गए एक रेडियो-कविगोष्ठी में। हमारे शोध प्रबंध पर तीन विशेषज्ञों की स्वीकृति तब तक आ चुकी, फिर वहीं नौकरी भी मिल गई। फिर ग्यारह महीने बाद वह नौकरी छोड़कर लखनऊ लौटे। फिर जुलाई 1961 में दिल्ली विश्वविद्यालय में नौकरी भी मिल गई।

एक वर्ष बाद पता चला कि युधिष्ठिर दिल्ली के एसडी कॉलेज में है। शोध के दिनों में मित्र बनीं दुर्गा पंत के बारे में भी आगे के वर्षों में पता चला कि दिल्ली में ही हैं। युधिष्ठिर से दोबारा मिलना सन् 1968 में हुआ। इस बीच युधिष्ठिर डी.एच. लॉरेस पर पीएचडी कर लौट चुका था। युधिष्ठिर उतनी ही लंबी पत्नी जितने लंबे वह स्वयं थे को ब्याह लाए थे। नाम था हेल्गा। हम रूपा के साथ अपनी गृहस्थी बसाने की प्रक्रिया में थे।

साउथ एक्सटेंशन, पार्ट-1 में हमने एक घर किराए पर लिया था। युधिष्ठिर हेल्गा के साथ साउथ एक्स, पार्ट-2 में रह रहा था। हम दोनों विवाहित लोग पहले एक दवा की दुकान पर मिले। युधिष्ठिर ने हेल्गा से परिचय कराया। हमने रूपा से युधिष्ठिर को मिलाया। युधिष्ठिर ने बताया कि वह मुझे कई वर्षों से दूरदर्शन पर देखकर हेल्गा और अपनी बेटी अन्या को मेरे बारे में बता चुका है। इतना अच्छा लगा जानकर कि हम दोनों पड़ोसी हैं। पारिवारिक स्तर पर हमारे संबंध प्रगाढ़ होते चले गए। दिलचस्प बात यह हुई कि इन्हीं वर्षों में साउथ दिल्ली कैंपस की कक्षाएं साउथ एक्स में होने लगीं।

वर्ष याद नहीं, इतना भर याद है कि युधिष्ठिर उतने ही लंबे डॉक्टर वर्मा के साथ शाम को बैडमिंटन खेला करता था। युधिष्ठिर अपनी साइकिल और छाते के लिए मशहूर था। कालांतर में हमने ऑक्सफोर्ड विवि के प्राध्यापकों को साइकिल पर बेझिझक आते-जाते देखा। युधिष्ठिर के पास वैसे एक जर्मन कार थी, मगर वह हमारे घर जब अकेले आता तो साइकिल पर ही आता था। हमारे साउथ एक्स के घर में तब कई मित्र आते थे। रघुवीर सहाय आते थे। भारत भूषण अग्रवाल और राजेंद्र यादव आते थे।

वीरेंद्र नारायण तो अक्सर आ जाते थे। अज्ञेय और सुमित्रानंदन पंत भी एक-दो बार आए। युधिष्ठिर के घर हमें निसीम एजकील, डॉ. देवेंद्र कोहली और मंजू जैन आदि से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। ऐसे ही कई वर्ष बीत गए। हेल्गा स्वभाव से बड़ी मिलनसार थी। याद आ रहा है। सन् 1971 में युधिष्ठिर के बच्चों अन्या और मन्यु को देखकर रूपा ने कहा था, `अगर अपने घर लड़की हुई, तो हम दोनों उसका नाम अन्या रखेंगे और यदि लड़का हुआ तो मन्यु।’ इसके बाद सन् 1972 के अंत में अपनी नियुक्ति मैक्सिको में हो गई। हम घर में ताला लगा 4 वर्षों के लिए बाहर चले गए।

सन् 1982 के अंत में घोषणा हुई कि कैलाश मानसरोवर जाने की सुविधा यात्रा का कार्यक्रम पहली बार शुरू होने जा रहा है। युधिष्ठिर हमारे लिए भी प्रार्थना-पत्र का एक फार्म ले आया। युधिष्ठिर ने तुरंत प्रार्थना-पत्र भरकर उसे भेज भी दिया। इसी बीच क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो अपने मित्र गाब्रियल गार्सिया मारक्वेज के साथ दिल्ली आए। हमारी दो पुस्तकें जो मैक्सिको से स्पानी भाषा में छपी हैं, उन्हें शायद कास्त्रो ने पढ़ा होगा। तभी उन्होंने इंदिराजी से कहलाया और इंदिराजी की सेक्रेटरी उषा भगत ने हमें फोन किया कि हम फलां दिन सफदरजंग में फिदेल के साथ चाय पीने आने को आमंत्रित हैं।

इस बीच उषा ने यह भी कहा कि हम फिदेल के मित्र गाब्रियल से, जो अकबर होटल में ठहरा है, जाकर मिलें। जिस दिन इंदिराजी के यहां चाय थी, शायद उसी दिन राजा राधा रेड्डी, मुझे और मार्ग्रेट अल्वा को फिदेल के देश की राजधानी हवाना भेजे जाने की योजना भी बन गई। हम इस सरकारी पेंच में फंस जाने के कारण युधिष्ठिर के साथ मानसरोवर न जा सके। युधिष्ठिर अपने दल के साथ मानसरोवर चला गया। हेल्गा को आज्ञा नहीं मिली (विदेशी होने के कारण)।

त्रासदी की शुरुआत यहीं से होती है। युधिष्ठिर को मानसरोवर ले जानेवाला यह दल गोरखपुर से होकर जानेवाली किसी पुरानी सड़क से होकर गया, जिसमें काला पत्थर या शायद पानी से आगे चीनियों की देखरेख में मानसरोवर जाना होता था। यह दल जब यात्रा पूरी कर लौट रहा था, तो युधिष्ठिर को लगा कि शायद कोई अधेड़ महिला पीछे छूट गई। करुणा और सरोकार भरे मन वाले युधिष्ठिर को यह अमानवीय लगा कि कोई पीछे छूटा जा रहा है और बर्फानी चक्रवात ऊपर आता जा रहा है। दल में आगे जा रहे साथियों ने आवाज दी कि कोई पीछे नहीं छूटा, जल्दी आगे बढ़कर आओ।

पहाड़ के घुमावदार रास्ते पर पीछे छूटा प्राणी दिखता भी नहीं। लोग चीखते रहे, `युधिष्ठिर, प्रोफेसर युधिष्ठिर।’ मगर बर्फानी तूफान युधिष्ठिर को उड़ा ले जाकर किसी गहरी खाई में फेंक आया। युधिष्ठिर के खो जाने की खबर हमें हवाना से लौटकर आने पर मिली। मंत्रालय का खोजी दल युधिष्ठिर को खोजने गया भी, मगर युधिष्ठिर की काया बर्फ में कहां गुम हो गई, आज तक पता नहीं चला। अभी हाल में हेल्गा ने बताया पागल हुई सी वह युधिष्ठिर को खोजने उसी रास्ते से युधिष्ठिर-युधिष्ठिर चिल्लाती गई भी थी। वह युधिष्ठिर, जिसे उसने प्यार किया था, वह युधिष्ठिर जिसकी याद में दिल्ली विश्वविद्यालय एक छात्रवृत्ति देता है, वह युधिष्ठिर जिसके साथ हमें भी जाना था, वह युधिष्ठिर अभी भी स्वप्न में आता है, सफेद कपड़े पहने हुए।   

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