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कारों के बोझ तले शहर

Wed, 24 Oct 2012 08:14 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Wed, 24 Oct 2012 08:14 PM IST
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article of jayanti lal bhandari
बढ़ते शहरीकरण का एक परिणाम यह भी है कि भारतीय शहर कारों के बोझ तले बेहाल हैं। हमारे शहरों की प्रमुख समस्याओं के बारे में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो रहे सर्वेक्षणों में इसे एक गंभीर समस्या बताया जा रहा है। कारों का कारवां बढ़ने से ट्रैफिक, पार्किंग के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषण की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है।
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विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अभी इस समस्या से निपट पाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में परिवहन व्यवस्था में सुधार के लिए सार्वजनिक परिवहन के प्रसार और अन्य अभिनव तरीकों को तलाशना जरूरी हो गया है।
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देश में कारों की संख्या में इजाफे का अंदाजा वाहन विनिर्माताओं के संगठन सियाम के नवीनतम आंकड़ों से लगाया जा सकता है। इसमें कहा गया है कि सितंबर, 2012 के अंत तक देश में तकरीबन एक करोड़ 82 लाख कारें दौड़ रही थीं। देश में प्रतिमाह डेढ़ लाख से अधिक कारों की बिक्री हो रही है।
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प्रमुख क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के आकलन के अनुसार, छोटी कारों की कम कीमत और देश में समृद्ध होते मध्य वर्ग के कारण यह संख्या लगातार बढ़ रही है। चूंकि पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, ऐसे में अगर कारों की संख्या में इजाफा जारी रहा, तो महंगा ईंधन पूरी अर्थव्यवस्था पर कितना भारी असर डालने वाला है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

तेल विपणन कंपनियों का घाटा बढ़ता जा रहा है, जिसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। यह विडंबना ही है कि सरकार किसानों और अन्य उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए डीजल पर भारी सबसिडी देती है, लेकिन इसका फायदा डीजल कार इस्तेमाल करने वालों को मिलता है। इसलिए डीजल कारों में लगने वाले करों में इजाफा करने की जरूरत है।

विभिन्न सरकारों ने शहरीकरण की तरफ तो ध्यान दिया, लेकिन पार्किंग को लेकर ठोस नीति नहीं बनाई। आने वाले वक्त में बढ़ती हुई लाखों कारों के लिए मजबूत और चौड़ी सड़कों के लिए हमारे पास क्या योजना है, यह सवाल भी अहम है। सवाल यह भी है कि मौजूदा स्थितियों में पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए उठाए जा रहे सभी कदम क्या निष्प्रभावी नहीं हो जाएंगे?

इस परिप्रेक्ष्य में देश में कारों के काफिले को बढ़ाने की नीति पर पुनर्विचार के साथ ही सभी शहरों में सार्वजनिक परिवहन की कारगर व्यवस्था पर विचार करने की जरूरत है। इस समय देश के कई शहरों में सार्वजनिक परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। वर्ष 1951 में बिकने वाले प्रत्येक दस वाहनों में से एक वाहन बस होती थी, पर आज ऐसे प्रत्येक 100 वाहनों में से केवल एक वाहन बस है।

देश के वाहन बाजार में बसों की पूर्ति का यह परिदृश्य सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की दयनीय स्थिति की कहानी बयां करने के लिए काफी है। दूसरी ओर, दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली से लोगों को काफी सहूलियत मिलती है।

मसलन, टोक्यो में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से रोजाना 80 लाख लोग आवागमन करते हैं। यह बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का ही नतीजा है कि लंदन, सिंगापुर, सिडनी जैसे कई बड़े शहरों में ज्यादातर लोग सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं।

कई देशों में तो लोग सप्ताह के आखिरी दिन या फिर छुट्टी वाले दिन निजी वाहन का इस्तेमाल करते हैं। इंडोनेशिया में सप्ताह में एक दिन कार मुक्त दिवस मनाया जाता है। इस दिन लोग कारों का इस्तेमाल नहीं करते। इन उदाहरणों को ध्यान में रखते हुए हमें भी बढ़ती हुई कारों से हो रही समस्याओं का हल खोजना चाहिए। इस कड़ी में बीआरटीएस (बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम) के जरिये सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को मजबूत बनाने की कोशिश की जानी चाहिए।

इस व्यवस्था से शहरों में अधिक से अधिक लोग सरलतापूर्वक आवागमन कर सकेंगे। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में सर्वेक्षणों में यह पाया गया है कि बीआरटीएस के एक भीड़भाड़ वाले स्थान पर अत्यधिक ट्रैफिक वाले समय में जितने लोग सड़क से गुजरते हैं, उसकी तुलना में ऐसे वक्त में किसी अन्य भीड़भाड़ वाली सड़क पर आधे लोग ही गुजरते हैं। अहमदाबाद में भी बीआरटीएस का प्रयोग सफल रहा है।

जिन शहरों में यह प्रयोग ज्यादा सफल नहीं रहा है, वहां इसके पीछे की खामियां खोजकर निराकरण करना चाहिए। बड़े शहरों में मेट्रो रेल और बीआरटीएस मिलकर यातायात की समस्या का बहुत हद तक निराकरण कर सकते हैं। साथ ही इस मामले में हमें विकसित देशों से सबक लेना चाहिए, जहां परिवहन समस्या कम होने की बड़ी वजह शहरों में निजी वाहनों पर उपयोग सरचार्ज लगाया जाना है। हमारे यहां भी महंगी कारों से अतिरिक्त कर वसूला जा सकता है।


इसके अलावा सड़कों का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले वाहनों से ज्यादा कर वसूला जाना चाहिए। इसकी जानकारी कारों में नई तकनीक वाली कंप्यूटरीकृत स्मार्ट चिप लगाकर हासिल की जा सकती है। उपभोक्ता से वसूले जाने वाले इस शुल्क का इस्तेमाल केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा सार्वजनिक परिवहन के साधनों पर सबसिडी देने के साथ-साथ करों में भी राहत की व्यवस्था की जानी चाहिए।
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