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सेना को भी साथ लेना होगा

Mon, 07 Oct 2013 07:20 PM IST
मारूफ रजा
मारूफ रजा Updated Mon, 07 Oct 2013 07:20 PM IST
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army should on peace table

यह किसी दुर्योग से कम नहीं कि जब भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ न्यूयॉर्क में हाथ मिला रहे थे, तभी भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिशें भी हो रही थीं। यह स्थिति कई आशंकाओं को जन्म दे रही है, जिनमें सर्वप्रमुख यही है कि क्या एक बार फिर पाकिस्तान की तरफ से हमारी पीठ पर छुरा घोंपने की कोशिश तो नहीं हो रही है।

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अगर ऐसा नहीं है, तो फिर नवाज शरीफ का अपने देश की सेना पर किस तरह का नियंत्रण है, क्योंकि जब सेना ही उनके हाथ में नहीं है, तो वह कैसे सीमा पर शांति प्रक्रिया के अपने वायदे को पूरा करेंगे? सवाल यह भी है कि जब पाकिस्तानी सेना दोस्ती का हाथ बढ़ाना नहीं चाहती, तो कैसे भारत-पाकिस्तान सीमा पर शांति बहाल हो सकेगी।
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इन सारे सवालों के हल ढूंढने से पहले कश्मीर की वास्तविक स्थिति पर ध्यान देना समीचीन होगा। यह सर्वविदित है कि सीमा पर भारी संख्या में आतंकियों की घुसपैठ हो रही है। नियंत्रण रेखा पर दोनों तरफ जिस तरह सैनिकों की बसावट है, उसमें यह कल्पना मुश्किल है कि घुसपैठ बिना पाकिस्तानी सेना की जानकारी के हो। हां, यह हो सकता है कि अब आतंकी सेना की हाथ से बाहर निकल चुके हैं और सीमा पर अशांति फैला रहे हैं।
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लेकिन जब पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व प्रमुख हामिद गुल यह खुलासा करते हैं कि पाकिस्तानी सेना के ही कुछ अधिकारी यह नहीं चाहते कि सीमा पर शांति हो, तो इस तथ्य की ही कमोबेश पुष्टि होती है कि पड़ोस की सेना आतंकी गुटों का पोषण कर रही है। वैसे भी जिस तरह के आतंकी सीमा पार कर रहे हैं, वे सामान्य आतंकी नहीं लगते।

हालांकि घुसपैठ की स्थिति समझने के लिए नियंत्रण रेखा को भी समझना होगा, जिसके नक्शे और जमीनी स्थिति में काफी अंतर है। इतना ही नहीं, दोनों देशों की सेना ने नियंत्रण रेखा से थोड़ा हटकर अपने-अपने मोर्चे बनाए हैं। यह कमोबेश सीमा से आधा से एक किलोमीटर दूर होते हैं। साथ ही, टेंट भी नियंत्रण रेखा से दूर ही लगाए जाते हैं।

अब अगर आतंकी नियंत्रण रेखा पार करते हैं और भारतीय सेना की नजर उन पर पड़ती भी है, तब भी आतंकी एकाध किलोमीटर भारतीय सीमा में आ चुके होते हैं। इसी तरह, जब सीमा के आसपास के गांवों द्वारा इन आतंकियों को जाने-अनजाने पनाह दी जाती है अथवा वे आराम करने के लिए वहां रुकते हैं और सेना के सर्चिंग ऑपरेशन में फायरिंग होती है, तो यह दुष्प्रचारित किया जाता है कि आतंकियों ने गांव पर कब्जा कर लिया। पर वास्तव में ये भ्रामक बातें हैं।

इन सबके बावजूद सवाल यही है कि आखिर क्यों पाकिस्तानी सेना सीमा पर घुसपैठ कर रही है और इसका निराकरण क्या है। असल में, पाकिस्तानी सेना तीन मोर्चों पर जूझ रही है- पहला अफगानिस्तान, दूसरा, देश की आंतरिक हालत और तीसरा नियंत्रण रेखा। पाकिस्तानी सेना अपने देश में आतंकी गुटों की सक्रियता को नियंत्रित करने के लिए उसका भारत के खिलाफ इस्तेमाल करती है। ऐसा कर वह अपने जवानों का हौसला-अफजाई भी करती है।

लिहाजा अगर दोनों देशों को शांति ढूंढनी है, तो सबसे पहले वहां की सेना को शांति-वार्ता में शामिल करना होगा। आजादी के बाद कम से कम तीन ऐसे उदाहरण हैं, जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि जिस समझौते का हिस्सा सेना बनी है, वह टिका है। मसलन, 1947-48 का ही उदाहरण लें। तब हुए सीजफायर समझौते पर पाकिस्तानी सेना के जनरल ने हस्ताक्षर किए थे, लिहाजा उसका हमेशा सम्मान किया गया। कम से कम 1971 तक उसकी इज्जत जरूर की गई। इसी तरह, बांग्लादेश के जन्म के बाद जिस समझौते पर हस्ताक्षर हुआ, उस पर भी पाकिस्तानी सैन्य कमांडरों ने दस्तख्त किए थे। सिंधु जल समझौता भी आज तक इसलिए जारी है, क्योंकि उस पर पाकिस्तानी जनरल और तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। इन सारे समझौतों का सम्मान किया गया।

इन सभी समझौतों के बनिस्बत हम शिमला और लाहौर समझौते का हश्र देख सकते हैं, जिस पर असैन्य शासकों ने हस्ताक्षर किए थे। इसलिए आज अगर मनमोहन सिंह और नवाज शरीफ कोई शांति समझौता चाहते हैं, तो उसकी सफलता तभी सुनिश्चित होगी, जब तक सेना उसका सम्मान करेगी। और सेना किसी समझौते का सम्मान करे, इसके लिए जरूरी है कि उसे भी समझौते का एक पक्ष बनाया जाए।

हालांकि अभी नवाज शरीफ ने डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन) की बैठक करने की घोषणा की है, जो संभवतः इस महीने के अंत में होगी। यह होशियारी से उठाया गया कदम लगता है। कारगिल युद्ध के बाद यह पहला मौका होगा, जब दोनों देश के डीजीएमओ एक साथ बैठेंगे। डीजीएमओ असल में, नियंत्रण रेखा के लोकल कमांडरों (जिनकी भारी मौजूदगी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उनकी संख्या कारगिल युद्ध के बाद दो से ढाई गुना बढ़ चुकी है) से बात करेंगे और फिर बीच का रास्ता निकालने का प्रयास करेंगे। इस हालत में भारतीय सेना की यही मांग होगी कि वह तो फायरिंग का जवाब देती है। सीजफायर का उल्लंघन तो उधर से होता है; फिर चाहे वह आतंकियों को घुसपैठ कराने के बहाने हो अथवा अन्य किसी वजह से।


लेकिन हमारे नीति-नियंताओं को यह भी ध्यान रखना होगा कि सैनिकों से बात कर हालात संभालने की कोशिश भी तभी सफल होगी, जब इस तरह का कोई 'सैन्य' प्रयास हो। आखिर 2004 में मुशर्रफ ने सीजफायर करवाया ही था और आतंकियों की दुम पकड़ी ही थी। इसलिए अब भी शांति प्रक्रिया के लिए वहां की सेना पर ही दबाव बनाना होगा। क्या नवाज शरीफ इसके लिए तैयार हैं?

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