फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Apart Ganga, other rivers too important

गंगा के अलावा भी कई दूसरी नदियां हैं

Wed, 04 Jun 2014 07:25 PM IST
अनिल जोशी
अनिल जोशी Updated Wed, 04 Jun 2014 07:25 PM IST
विज्ञापन
Apart Ganga, other rivers too important

एक बार फिर गंगा चर्चा में है। आखिर नए प्रधानमंत्री ने वाराणसी में संकल्प जो लिया है। मगर ऐसा करके हम मूलतः कई बिंदुओं को नकार रहे हैं। गंगा एक प्रतीक हो सकती है, पर कई नदियों के हालात गंगा से भी खराब हो चुके हैं। यमुना ज्वलंत उदाहरण है। गंगा से यमुना को अलग कर देने की बड़ी भूल हुई है। इन दोनों नदियों का साथ हमेशा रहा है, जिसका उल्लेख वेदों से लेकर पुराणों तक में है। मगर गंगा को बचाने के लिए जो हो-हल्ला मचाया गया, यमुना और अन्य नदियां पीछे छूट गईं।

विज्ञापन


नदियों के संरक्षण की इस लड़ाई में अन्य नदियों को लेकर योजनाकारों में ज्यादा चिंता नहीं दिखाई देती। सामाजिक संगठनों ने दिल्ली के आस-पास मैली यमुना की साफ-सफाई को लेकर सरकार को धमकी अवश्य दी, पर जैसा होता चला आया है, सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगी। भूलना नहीं चाहिए कि यह नदी पवित्रता व पोषकता में उतनी ही बलशाली है, जितनी गंगा। यह भी उत्तराखंड से लेकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश के हजारों गांवों की उपजाऊ भूमि को सींचती है। देश की सभ्यता व आगरा, मथुरा जैसे महत्वपूर्ण स्थान भी यमुना की कृपा से हैं। लेकिन राजधानी दिल्ली को ही हजारों वर्षों से पानी पिलाने वाली यमुना जहरीली हो गई है। दिल्ली व अन्य शहरों तथा उद्योगों का कूड़ा-करकट इस नदी में डाल दिया जाता है। इसे मुक्त करने के सारे दावे भी खोखले साबित हो गए। देश की राजधानी में एक नदी के साथ जो व्यवहार किया गया है, उसके लिए हमारी व सरकार, दोनों की ही जवाबदेही है। समझा जा सकता है कि जहां ससद हो, वहां अगर एक नदी के हालात पर बहस नहीं हो सकती, तो दूसरी नदियों पर चर्चा कैसे होगी।
विज्ञापन


कहना अतिशयोक्ति नहीं कि देश की कमोबेश सभी नदियां अपने उद्गम से ही पीड़ित हैं। बड़ी नदियों की सहायक नदियां, तालाब और तलैया आज गहरे संकट में हैं। उदाहरण के लिए, यमुना को ही देखिए। लगातार गिरता हिमपात, पब्बर और टौंस जैसी सहायक नदियों के जलागम क्षेत्रों की घटती क्षमताओं ने यमुना के पानी में अप्रत्याशित कमी कर दी है। नदियों के इन बदलावों के प्रति कहीं चिंता भी नहीं दिखाई देती। गंगा के पक्ष में उठा आंदोलन सभी नदियों के संरक्षण का प्रतीकात्मक भाव है। मगर दुर्भाग्य है कि हमारी सारी मेहनत गंगा तक सिमट कर रह गई हैै। यह जानने की जरूरत है कि मात्र सरकारी योजनाओं से ही नदियों का भला नहीं हो सकता, आम आदमी को भी पहल करनी होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन


हमारे नीति-नियंताओं को भी नहीं भूलना चाहिए कि नदियों के प्रति हमारा रुख यही रहा, तो अगले 20-25 वर्षों में हम बड़ी आपदा के शिकार हो सकते हैं। यमुना की अन्य सहायक नदियों का ही नहीं, चंबल, सिंधु, बेतवा, केन जैसी नदियों का भी दम-खम कम हुआ है। लगभग छह करोड़ लोग यमुना के पानी से जीवित हैं। दिल्ली का तो 70 प्रतिशत पानी यमुना की ही देन है। मगर विडंबना है कि सूर्य की बेटी और यमराज की बहन यमुना में जिस स्नान से मोक्ष मिलता है, वह स्वयं मृत्यु के कगार पर है। और अगर यमुना विलुप्त हो गई, तो न सिर्फ इस पर निर्भर लगभग 10 करोड़ लोग पानी के लिए मोहताज हो जाएंगे, बल्कि इससे जुड़े राज्य अकाल ग्रस्त हो जाएंगे।


गंगा-यमुना की चिंता से जुड़े लोगों को चाहिए कि नदियों के हालात पर राष्ट्रीय चर्चा करें, क्योंकि नदियों को जोड़ने जैसी महत्वाकांक्षी योजना पहले सिरे ही ढेर हो जाएगी, अगर ऐसे ही एक के बाद एक नदियां सूखती चली गईं। फिर सूखी नदियों को बड़ी नदियों से जोड़कर हम सिर्फ कामचलाऊ व्यवस्था कर सकते हैं, जिससे परिस्थिति के विरुद्ध एक और विनाश को जन्म देंगे। लिहाजा जरूरी यह है कि हम सभी नदियों के पुनर्जीवित करने पर ज्यादा ध्यान दें, ताकि प्रकृति के साथ जी सकें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed