नए साल में क्या कुछ बदलेगा?
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बनफशा के पौधों में समय से पहले खिले फूलों को चुनते हुए माली शिकायती स्वर में भुनभुना रहे हैं, जो आगे आने वाले महीनों में वसंत की शुरुआत में खिलते हैं। वे कहते हैं कि इस तरह जल्दी फूल आने से पौधे कमजोर हो जाते हैं। फिर वे गुलदाउदी पर नजर डालते हैं, जो देर से खिला है और अब पूरे शवाब पर है। उन्हें सर्दियों की बारिश के साथ ही खत्म हो जाना चाहिए और वसंत में खिलने वाले पौधों को उनकी जगह लेनी चाहिए। लेकिन पंजाब प्रांत के ज्यादातर इलाके, खासकर रावलपिंडी इस बार सर्दियों की बारिश से मरहूम रहा, ऋतुचक्र टूटने के कारण मौसम ज्यादा ठंड और सूखे पतझड़-सा दिखता है। आम तौर पर सर्दियों में एक हफ्ते से ज्यादा बारिश होती है, जिस कारण लोग गैस हीटर के पास बैठकर सीरी पायस, हलीम, खिचड़ी और गाजर के हलवे का आनंद लेते हैं।
खैर, मौसम से अलग पाकिस्तान में क्या बदला है? जैसे-जैसे पाकिस्तान की सियासत नए साल में प्रवेश की तरफ बढ़ रही है, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता आसिफ अली जरदारी की उस घोषणा पर सवाल उठ रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा है कि वह अपने बेटे बिलावल भुट्टो के साथ अगले चुनाव में खड़े होंगे। पाकिस्तान में जरदारी एक ऐसी शख्सियत के तौर पर याद किए जाएंगे, जिन्होंने अकेले मुल्क की सबसे उदार पार्टी को बर्बाद कर दिया और पंजाब प्रांत में उसका सूपड़ा साफ कर दिया। गौरतलब है कि पंजाब ऐसा प्रांत है, जो प्रधानमंत्रियों को बनाता और बिगाड़ता है।
अगर पूर्व राष्ट्रपति जरदारी नेशनल एसेंबली में प्रवेश पाते हैं, तो किसी को भी मुल्क की सियासत में बदलाव की उम्मीद नहीं होगी। सरकार के ज्यादातर फैसले निचली सदन से बाहर लिए जाते हैं और दो तिहाई बहुमत होने के बावजूद नवाज शरीफ सरकार के लिए कोरम को बनाए रखना मुश्किल है। न केवल सदन के नेता संसद की अनदेखी करते हैं, बल्कि पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी) के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार इमरान खान का नजरिया भी इससे अलग नहीं है।
इस साल का अंत पाकिस्तानी समाज के उस विरोधाभास के साथ भी हो रहा है, जिसमें पीपीपी के सांसद फरहतुल्लाह बाबर ने शिकायत की थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड और राष्ट्रीय वैचारिक ब्रिगेड, दोनों मुल्क को जिन्ना के बताए मार्ग से अलग दिशा में ले जा रहे हैं। यह साल एक विवादास्पद मुल्ला मुफ्ती अब्दुल कवी के राउत-ए हिलाल कमेटी से निष्कासन के लिए भी जाना जाएगा। राउत-ए हिलाल कमेटी एक पुरानी संस्था है, जिसे पिछले दो ईद से चांद पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। कवी को पीटीआई से भी निकाला गया, क्योंकि राष्ट्रीय वैचारिक ब्रिगेड के रूप में काम करने वाली सरकार ने उन्हें सोशल मीडिया की हस्ती कंदील बलोच के साथ तस्वीर खिंचवाने का दोषी पाया था।
क्या पाकिस्तान को 2017 से उम्मीद रखनी चाहिए? उम्मीद पर ही लोग और मुल्क जीते हैं। इस्लाम में उम्मीद छोड़ देना कुफ्र (अभिशाप) है, इसलिए लोगों को अच्छे दिनों की उम्मीद करनी चाहिए। ज्यादातर पाकिस्तानी उम्मीद करते हैं कि पंजाबी जेहादी जैसे नॉन स्टेट ऐक्टर्स को सीमापार के मुल्कों के खिलाफ इस्तेमाल करने की नीतियां खत्म होनी चाहिए और सुरक्षा प्रतिष्ठानों को घरेलू सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
गलियों में आप किसी से भी बात कर लीजिए, कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा, जो सीमापार आतंकवाद का समर्थन करता हो। कोई नियंत्रण रेखा पर 2003 के संघर्ष विराम उल्लंघन का समर्थन भी नहीं करता, जिसके कारण शांति काल में भी दोनों तरफ के जवान मारे जाते हैं। हालांकि कुछ पाकिस्तानी जरूर यह कहते मिल जाएंगे कि चाहे भारत हो या अफगानिस्तान, उनकी खुफिया एजेंसियां साजिश में शामिल होती हैं और पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवादियों का समर्थन करती हैं। असल में आरोप-प्रत्यारोप की सूची काफी लंबी है। लेकिन यदि कोई भारत के प्रतिष्ठित राजनयिक और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की ताजा किताब चॉइसेज को पढ़ेगा, तो यह पाकर जरूर प्रभावित होगा कि भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय संबंध भारत की विदेश नीति की एक बड़ी विफलता है। मेनन 'खोए हुए अवसरों' और 'भारत-पाकिस्तान संबंध के मामले में अधूरी संभावनाओं को गंवाने' की एक लंबी सूची भी पेश करते हैं।
तो क्या 2017 ऐसा वर्ष होगा, जिसमें दोनों मुल्कों के नागरिक नीतियों में परिवर्तन देखेंगे, जब भारत की मोदी सरकार चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर ध्यान देगी? यह तकदीर बदल देने वाली परियोजना है और लगता है कि इसे काफी महत्व मिल रहा है, क्योंकि ईरान, अफगानिस्तान, रूस तथा मध्य एशियाई गणराज्यों के देश इसमें शामिल होने में दिलचस्पी रखते हैं। यह सामान्य बात नहीं है कि पाकिस्तान का एक वरिष्ठ जनरल सीधे भारत सरकार से बात कर इस परियोजना में शामिल होने का न्योता दे। नई दिल्ली को निमंत्रण सैन्य मुख्यालय में नेतृत्व परिवर्तन के बाद दिया गया है। निश्चित रूप से दक्षिणी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आमिर रियाज ने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा की सहमति के बिना सीमा पार यह संदेश नहीं भेजा होगा। इस मामले में चीनी विदेश मंत्रालय भी सक्रिय हो गया है और एक सवाल का जवाब देते हुए वहां की एक महिला प्रवक्ता ने हैरानी जताई कि क्या मोदी सरकार पाकिस्तानी जनरल के निमंत्रण को एक सद्भावना संकेत के रूप में लेगी। वास्तव में बीजिंग ने भी सीपीईसी में भारत के शामिल होने की संभावना का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि सीपीईसी क्षेत्रीय संपर्क, शांति, स्थिरता और समृद्धि में मदद करेगा। सिंघुआ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ली जिगुआंग के मुताबिक, कश्मीर एक नरम सीमा है, पर सीपीईसी इसे श्रीनगर के साथ एक शानदार क्षेत्रीय नेटवर्क का हिस्सा बनाएगा। याद रखिए, पहले भी कश्मीर सिल्क रोड के पड़ाव के रूप में राजनायिकों द्वारा इस मार्ग का इस्तेमाल होता था और यह मध्य एशिया, कशगर, लद्दाख और नई दिल्ली को जोड़ता था।