मजबूत होते संबंध: एंटनी ब्लिंकन का दौरा और अमेरिका को भारत से उम्मीद
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अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की भारत यात्रा ऐसे समय हुई है, जब अफगानिस्तान में हालात तेजी से बदल रहे हैं और दुनिया कोविड महामारी से निपटने के लिए जूझ रही है। जो बाइडन प्रशासन में पद संभालने के बाद ब्लिंकन की यह पहली भारत यात्रा थी, इसमें उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि बाइडन सरकार भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना चाहती है। अपने भारतीय समकक्ष एस जयशंकर के साथ साझा प्रेस कांफ्रेस में ब्लिंकन ने कहा कि भारत और अमेरिका की साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और समृद्धि प्रदान करने और दुनिया को यह दिखाने के लिए महत्वपूर्ण होगी कि लोकतंत्र अपने लोगों के लिए कैसे काम कर सकता है। दुनिया में ऐसे बहुत कम रिश्ते हैं, जो भारत और अमेरिका के बीच के रिश्ते से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
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भारत और अमेरिका के लोग मानवीय गरिमा और अवसर की समानता, कानून के शासन, धर्म और विश्वास की स्वतंत्रता सहित मौलिक स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं। ये हमारे जैसे लोकतंत्र के मूल सिद्धांत हैं। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ ब्लिंकन ने अफगानिस्तान समेत क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर बातचीत की। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण, सुरक्षित और स्थिर अफगानिस्तान में भारत और अमेरिका की गहरी रुचि है। इस क्षेत्र में एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में, भारत ने अफगानिस्तान की स्थिरता और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और वह उसे जारी रखेगा। उन्होंने आश्वस्त किया कि अमेरिका और भारत अफगान लोगों के फायदे के लिए मिलकर काम करना जारी रखेंगे और क्षेत्रीय स्थिरता का समर्थन करने के लिए काम करेंगे। मगर वास्तविकता यह है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी से केवल तालिबान और पाकिस्तान को फायदा हुआ है।
हम कहते हैं कि तालिबान ने अफगानियों की जिंदगी खराब कर दी, लेकिन अमेरिका के वहां जाने के बाद करीब 65,000 अफगान मरे हैं और एक लाख अफगान घायल हुए हैं। इतनी बर्बादी के बाद भी अमेरिका ने अब तक यह नहीं बताया है कि वह अफगानिस्तान में चाहता क्या था और अब क्या चाह रहा है। रूस ने अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी को उचित ही एक गैर-जिम्मेदाराना कार्रवाई बताया है। पाकिस्तान यह उम्मीद कर रहा है कि तालिबान अफगानिस्तान पर कब्जा करेगा और उसके जरिये वह अफगानिस्तान में अपनी मनमानी करेगा। बहुत से टिप्पणीकार भी कह रहे हैं कि अफगानिस्तान में अस्थिरता आने से भारत के लिए मुश्किलें पैदा होंगी। पर मेरा मानना है कि अफगानिस्तान में अस्थिरता आने से बेशक वहां के लोगों (जिनसे हमारा बहुत पुराना संबंध रहा है और हमने उनके लिए वहां काफी कुछ किया भी है) को नुकसान होगा, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान को होगा, क्योंकि क्वेटा के इलाके में तालिबान पहले से अपनी पैठ बनाए हुए है। इससे पाकिस्तान में शरणार्थी की समस्या भी बढ़ सकती है।
हमारा नुकसान यह हो सकता है कि हमने जो वहां निवेश किया है और वहां सड़क, पुल, बांध, अस्पताल जैसी बुनियादी संरचनाएं तैयार की हैं, उन्हें तालिबान तोड़ सकते हैं। हालांकि तालिबान ने कहा है कि वे ऐसा कुछ नहीं करेंगे, लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्होंने हाल ही में भारतीय नागरिकों पर हमले किए हैं। इसलिए अफगानिस्तान में अमेरिका की जो विफलता है, उसमें हमें अपने हाथ डालकर खुद को घायल करने की कोई जरूरत नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या भारत ईरान के जरिये अफगानिस्तान को मदद कर सकता है या नहीं और क्या अमेरिका इस मामले में भारत को आगे बढ़ने देगा या रुकावट डालेगा। एंटनी ब्लिंकन ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ कई द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय मुद्दों पर बात की, जिसमें संबंधों को अगले स्तर पर ले जाने पर जोर दिया गया। माना जाता है कि इस वार्ता में अफगानिस्तान के हालात और हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर बात हुई होगी। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के साथ भारत क्वाड में शामिल है। लेकिन इसमें सबसे बड़ी खामी यह है कि क्वाड ने अभी तक यह एलान नहीं किया है कि वह चीन के खिलाफ है। यदि चीन के खिलाफ नहीं हैं, तो फिर क्वाड नामक यह सैन्य रणनीतिक गठजोड़ क्यों है?
हाल ही में अमेरिका ने कहा था कि क्वाड सहयोगी देशों के बीच कोविड के खिलाफ मदद करेगा। ऐसे में ब्लिंकन को यह स्पष्ट करना चाहिए था कि क्या क्वाड एक सैन्य रणनीतिक गठजोड़ है या एक लोकतंत्र समर्थक पहल है। बहुत से देश ऐसे हैं, जो कोविड महामारी के दौरान जब डूब रहे थे, तो भारत के अलावा अन्य किसी भी लोकतांत्रिक देश ने उनकी मदद नहीं की। ऐसे में कुछ अफ्रीकी देशों और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में चीन अपनी परछाईं बढ़ाता जा रहा है। माना जाता है कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पर भी बातचीत हुई होगी, जिसमें सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, आतंकवाद विरोध, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे मसले शामिल हैं। लेकिन भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के मामले में अमेरिका भारत के लिए और क्या कर सकता है? ट्रंप प्रशासन द्वारा किए गए वादे (नौसेना के लिए यूएवी, हेलिकॉप्टर आदि) अब तक पूरे नहीं हुए हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका भारत में सिर्फ हथियार बेचेगा या भारत के रक्षा उद्योग को भी आगे बढ़ने का मौका देगा! भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा मिलाप का बिंदु है, जलवायु परिवर्तन। बाइडन प्रशासन का लक्ष्य है कि उनके कार्यकाल में इस मुद्दे पर दुनिया ऐसे पैरामीटर्स अपनाए, जिससे बदलते जलवायु परिवर्तन पर थोड़ा नियंत्रण किया जा सके। इस मामले में उसे सबसे ज्यादा समर्थन देने वाला देश है भारत, क्योंकि मोदी सरकार ने आगे बढ़कर जलवायु परिवर्तन के मामले में पहल की है। इसके अलावा, ब्लिंकन ने कहा कि कोविड संकट के दौरान भारत द्वारा की गई मदद को वह नहीं भूलेंगे और अब भारत की मदद से भी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने वैक्सीन निर्माण के लिए 2.5 करोड़ डॉलर की मदद की बात की। इन सबके अलावा द्विपक्षीय व्यापार एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका ने ऐसी-ऐसी घोषणाएं की हैं, जिनसे भारत का काफी नुकसान हुआ है। अमेरिका ने टैरिफ शुल्क बढ़ा दिया है, जिससे कई भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजारों में जा नहीं पा रहे हैं और हमारे निर्यातकों को नुकसान हो रहा है। इस मसले को भी बाइडन प्रशासन को आगे बढ़कर सुलझाना होगा।