किसान विरोधी छवि बनने लगी है
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नरेंद्र मोदी से मेरी लंबी बातचीत पहली बार हुई थी अगस्त, 2013 में। वह बातचीत थी, इंटरव्यू नहीं था। हुआ यह कि मैंने अंग्रेजी के एक कॉलम में लिखा था कि लुटियन्स दिल्ली के निवासी मोदी से नफरत इसलिए करते हैं, क्योंकि उनको वे अपने बराबर नहीं मानते। इसलिए उनकी पूरी कोशिश थी उस समय मोदी को दिल्ली से दूर करने की। इस लेख के छपने के अगले दिन मुझे गुजरात के मुख्यमंत्री के दफ्तर से फोन आया, और कविता नाम की एक महिला ने कहा कि मुझसे मुख्यमंत्री जी मिलना चाहते हैं। ऐसे निमंत्रण को कोई पत्रकार 'ना' नहीं कह सकता, इसलिए अगले ही दिन मैं अहमदाबाद के लिए रवाना हुई।
मोदी से मिलते ही उन्होंने मेरे लेख का जिक्र करते हुए कहा, आपने बिल्कुल ठीक लिखा। मैं दिल्ली में रहा जरूर हूं, पर दिल्ली का कभी बना नहीं। हमेशा ऐसा लगा कि बाहर से आया हूं।
मोदी जब मिलते हैं किसी पत्रकार से, तो अक्सर उसका असर इतना अच्छा होता है कि उनके दुश्मन भी नरम हो जाते हैं। यह मैंने तब देखा, जब कुछ महीने पहले वरिष्ठ पत्रकारों के एक गुट में मैं भी उनसे मिलने गई प्रधानमंत्री निवास। उस टोली में कुछ ऐसे लोग थे, जो सोनिया गांधी के प्रशंसक थे, लेकिन वे लोग भी मोदी से प्रभावित होकर बाहर आए। समस्या यह है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने पत्रकारों को इतनी दूर रखा है कि मीडिया उनके खिलाफ हो गया है। इसके सुबूत पिछले हफ्ते बहुत बार मिले। राहुल गांधी अपनी लंबी छुट्टी से लौटने के बाद बहुत बोले हैं कई बार। रामलीला मैदान में भी और लोकसभा के अंदर भी। ज्यादातर झूठ बोले, झूठे इल्जाम लगाए। उनका यह कहना सरासर झूठ है कि मोदी किसानों की जमीनें जब्त कर उद्योगपतियों को देना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने चुनाव के समय उनसे करोड़ों रुपये कर्ज लिए थे। उनका यह कहना भी झूठ है कि भूमि अधिग्रहण कानून में मोदी सरकार संशोधन लाना चाहती है, क्योंकि वह किसान-विरोधी है।
मोदी जब से प्रधानमंत्री निवास में विराजमान हुए हैं, इतनी दूर हो गए हैं हम मीडिया वालों से, जैसे मीडिया की शक्ति भूल चुके हों। अमेरिका के उनके दौरे पर मैं भी उन पत्रकारों में थी, जो न्यूयॉर्क और वाशिंगटन गए। बहुत कोशिश की हम लोगों ने प्रधानमंत्री से मिलने की, लेकिन सारी कोशिशें नाकाम रहीं। मोदी सिर्फ विदेशी पत्रकारों से मिले। मीडिया वालों को इतनी दूर रखने का खामियाजा अब मोदी भुगतने लगे हैं। भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन जरूरी हैं। इनके बिना न देहातों में सड़कें बन सकेंगी, न बिजली घर, और न ही वे निवेशक आएंगे, जिनके बिना रोजगार भी नहीं आ सकेगा।
कृषि क्षेत्र में अब क्षमता नहीं रही रोजगार पैदा करने की, और यह बात किसान खुद जानते हैं अच्छी तरह, पर उनको गुमराह करने में राहुल गांधी काफी सफल हुए हैं। अरविंद केजरीवाल भी शायद होते, अगर उनकी सभा में वह शर्मनाक हादसा न होता। बेमौसम बरसात से लाखों किसान तबाह हो चुके हैं, और इसका भी दोष विपक्षी दल मोदी के सिर लगाने में सफल हो गए हैं। यह सब हुआ है, क्योंकि प्रधानमंत्री समझ नहीं पाए हैं अभी तक कि मीडिया वालों का समर्थन अगर उनको चाहिए अपनी नीतियों के लिए, तो उनको दूर नहीं रखा जा सकता। किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं होता, क्योंकि पश्चिमी राजनेता बहुत पहले समझ चुके हैं मीडिया की शक्ति।