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सचिन को अभी खेलना चाहिए था
हेमंत रस्तोगी
Updated Fri, 18 Oct 2013 08:13 PM IST
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सचिन तेंदुलकर के स्वर्णिम काल का एक बड़ा हिस्सा अंशुमन गायकवाड़ की कोचिंग में गुजरा। उन्हें सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर, दोनों के साथ बेहद नजदीकी से समय बिताने का मौका मिला। हेमंत रस्तोगी से उन्होंने सचिन से जुड़े अपने रोचक अनुभवों को साझा किया-
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सचिन तेंदुलकर के संन्यास का क्या यह उचित समय है?
यह समय हर क्रिकेटर की जिंदगी में आता ही है, चाहे वह गावस्कर हों या फिर सचिन। सचिन को अभी एक या दो शृंखलाएं खेलनी चाहिए थीं। संन्यास का निर्णय व्यक्तिगत जरूर होता है, पर एक बात तय है कि उन्होंने यह निर्णय अचानक नहीं लिया है। वह कुछ समय से जरूर इस बारे में सोच रहे होंगे।
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क्या अब कोई दूसरा सचिन पैदा होगा?
जब सुनील गावस्कर ने संन्यास लिया था, तब भी कहा जा रहा था कि अब कोई दूसरा गावस्कर पैदा नहीं होगा। लेकिन कुछ वर्षों में देश को सचिन तेंदुलकर मिल गए। अब तेंदुलकर जा रहे हैं, तो निश्चित रूप से उनके कद का देर-सबेर जरूर कोई सामने आएगा। बल्कि विराट कोहली में वह माद्दा दिखता है। लेकिन सचिन की किसी से तुलना नहीं हो सकती। जो चीज सचिन को तमाम क्रिकेटरों से अलग करती है, वह है, उनका बिना किसी विवाद के चौबीस वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना। इसके लिए उन्होंने फिटनेस के साथ खेलने के जुनून को जिस तरह बनाए रखा, वह अद्भुत है।
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आपने लंबे समय तक गावस्कर के साथ बतौर ओपनर खेला है। फिर सचिन के साथ भी कोच और चयनकर्ता की भूमिका में लंबा समय बिताया है। इन दोनों की बल्लेबाजी को आप कैसे अलग करेंगे?
मैं तुलना में विश्वास नहीं करता। लेकिन एक बात जरूर कहूंगा कि गावस्कर जब 80 या 90 पर पहुंचते थे, तब वह बेहद संभल जाते थे। उनका एकमात्र लक्ष्य शतक की मंजिल तक पहुंचना रहता था। वह इसे हासिल भी करते थे। लेकिन सचिन के बारे में ऐसा नहीं है। यह लड़का हमेशा बल्लेबाजी का आनंद लेता है। वह 80 या 90 पर भी अपना नेचुरल खेल खेलता है। उसने कभी नहीं सोचा कि उसे सौ बनाने हैं या दो सौ। वह सिर्फ अच्छे ढंग से बल्लेबाजी में विश्वास रखता है। यही कारण है कि सचिन 90 के स्कोर के दौरान भी कई बार आउट हुए हैं।
सचिन मैदान पर जितने समर्पित रहते हैं, उसी तरह नेट पर भी। इसका क्या राज है?
वह दरअसल बल्लेबाजी को जीते हैं। वह कभी संतुष्ट नहीं होते। हर मैच में वह सौ प्रतिशत देने की कोशिश करते हैं। इसीलिए नेट पर वह पूरी मेहनत करते हैं। किसी भी स्ट्रोक पर जब तक उन्हें तसल्ली नहीं हो जाती, तब तक वह अभ्यास करते हैं। मैं उनकी संतुष्ट नहीं होने वाली बात का कायल हूं। वह चाहें सौ कर दे या दो सौ, हमेशा और अच्छा करने के लिए खेलते हैं।
क्या आप सचिन का आखिरी टेस्ट मैच देखने मुंबई जाएंगे?
बिलकुल। सच्ची बात यह है कि मैं सचिन के साथ खेल चुका हूं। गुजरात के खिलाफ जब सचिन ने रणजी ट्राफी में पदार्पण किया था, तब मैं बड़ौदा का कप्तान था। उसी सत्र में ठाणे में बंबई के खिलाफ मेरा मैच था। उस दौरान बंबई टीम का एक खिलाड़ी सचिन को मेरे पास लेकर आया था। तब से सचिन का साथ है। मैं तो खुद को खुशनसीब मानता हूं कि मुझे सचिन जैसे खिलाड़ी का साथ मिला।
सचिन के लिए किस तरह की विदाई चाह रहे हैं?
मैं तो यही चाहता हूं कि सचिन अच्छा खेलकर क्रिकेट को विदा करें। लंबे समय से उन्होंने कोई शतक नहीं बनाया है। मुझे उम्मीद है कि इस शृंखला में सचिन का एकाध शतक देखने को मिल सकता है।