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मोहल्ले का भावी पीएम घोषित कर दो
अशोक गौतम
Updated Mon, 06 Jan 2014 07:05 PM IST
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मेरे बेटे को भी आजकल पता नहीं क्या हो गया है? उसने अपनी नाक को तो धुंआ देकर रखा ही है, पर मेरी नाक में भी दम कर रखा है। आजकल वह बड़े-बड़े सपने देखता है। पहले तो मैंने सोचा कि ताजा-ताजा जवानी का जोश है, दो दिन बाद फूलगोभी के रेट-सा अपने-आप उतर जाएगा, तो सब ठीक हो जाएगा!
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लेकिन जब मैं उसकी इस बेहूदी हरकत से तंग आ गया, तो मैंने उसे प्यार से समझाते हुए कहा भी, बेटा! माना, तू बड़ा हो रहा है, पर उम्र के साथ सपनों का कोई संबंध नहीं होता। यह जरूरी नहीं कि आदमी को बढ़ती उम्र के साथ सपने भी बड़े देखने चाहिए! मैं कहता हूं, तू इस दुनिया में सबकुछ देख! पर अपनी उम्र से बड़े सपने मत देख।
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हमारे जैसे परिवारों के बच्चे एक तो सपने नहीं देखते, पर अगर गलती से देख ही लें, तो अपनी उम्र से बड़े सपने देखने का दुस्साहस सपने में भी नहीं करते। केवल इंटरव्यू की कॉल लैटर लाने वाले डाकिये का रास्ता देखते हैं। पर वह किसी की सुने तब न! सपने में भी राम जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है।
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असल में उसको सपने दिखाने में उसकी मां ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। शेष रहे उसके रिश्तेदार! वे तो जब देखो, तब यह कहते नहीं थकते कि हमारा पोता-नाती तो जन्मजात मुहल्ले का पीएम है। पर उसका बाप होने के नाते मैंने उसे सच्चाई से वाकिफ कराने के इरादे से अकेले में कल फिर समझाया, बेटा, अभी दादा घर के पीएम हैं, तो उन्हें चलने दे।
अभी नेकी हमारी तो बदी उनकी चली है। देखो न, अपने घर की साख आजकल मुहल्ले की नजरों में पाक-साफ नहीं चल रही है। अपने घर को मुहल्ले में आजकल कोई दो आने का भी नहीं समझ रहा। कोई भी हमें कुछ भी कह कर चला जाता है और हम हैं कि चुपचाप सह रहे हैं। इसलिए अपनी जिद छोड़ और किसी और रेस में दौड़, पर वह माने तब न!
वह बस सोए-सोए भी एक ही रट लगाए है कि मुझे मुहल्ले का भावी पीएम घोषित कर दो बस। मैं कम से कम पीएम की दावेदारी की कुर्सी पर बैठकर मोहल्ले का नौकर होना चाहता हूं। देखो तो, मुहल्ले में सबने अपने-अपने पीएम घोषित कर दिए हैं।
अगर आप ऐसे ही देर करते रहे, तो देख लेना हमारे हाथ से मोहल्ले की यह कुर्सी भी न निकल जाए! यार बापू, जो भी करना है, बस जल्दी करो! चुनाव के दिन रह ही कितने गए हैं? अभी नहीं, तो बापू लगता है कभी नहीं!