कैसे खत्म हो रही पशुपालन की संस्कृति, बता रहे हैं सुभाष चंद्र कुशवाहा

सुभाष चंद्र कुशवाहा Updated Wed, 21 Oct 2020 02:18 AM IST
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प्रतिकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।

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बैलों के गले में घुंघरू और द्वार पर रंभाती गाय, बीते युग की बात लगने लगी हैं। गांवों से पशुओं का रिश्ता खत्म होने लगा है। भोर में उठने, चारा-पानी की व्यवस्था करने जैसे काम लगभग खत्म हो गए हैं। कभी गंवई अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता था पशुधन। गोधन पूजा की परिकल्पना इसी संदर्भ में हुई होगी। घर की आर्थिक दशा को मापने का भी पैमाना था पशुधन। गांवों में शादी-ब्याह के लिए रिश्ते तय करने से पहले हैसियत का आकलन पशुधन से होता था। दान-दहेज में भी गाय, बैल और भैंस दिए जाते थे। पशु मेलों की दूर-दूर तक ख्याति थी। अंग्रेजों के गजेटियरों में पशु-मेलों का जिक्र हुआ है। सोनपुर के मेले में गाय-बैलों से लेकर हाथी-घोड़े तक की बिक्री होती थी।
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गाय तब भी पूज्य थी। गांधी जी ने गौवध के संबंध में किसी कानून की कभी वकालत नहीं की, बल्कि उन्होंने यह कहा था कि हमारे मुस्लिम भाई, गाय का धार्मिक महत्व समझते हुए उसकी कुर्बानी नहीं देंगे। आखिर यह कैसी नीति बनी कि अब गांव के दरवाजों से पशु नदारद हो गए? वे गांवों को छोड़कर हाइवे की ओर रुख कर गए। खेतों में पशुओं के आवारा चरने-घूमने के कारण खेती-किसानी का एक अलग संकट आ खड़ा हुआ। किसानों ने उन्हें खदेड़ना शुरू किया। फसलों को बचाने के लिए रात में पहरा देना शुरू किया। किसान और पशुओं का रिश्ता दुश्मनी में तब्दील हो गया। इस क्रम में कई बार हिंसक सांड़ों ने किसानों की जानें भी ले लीं। किसान और पशुओं का संघर्ष और तेज हुआ, तो आवारा पशुओं के झुंड हाइवे पर दिखने लगे। 
हाइवे पर आने से आदमी और जानवर, दोनों के लिए समस्याएं आ खड़ी हुईं। सड़क दुर्घटनाएं बढ़ गईं। गाड़ियों से टकराकर जानवर भी मारे जाने लगे और आदमी भी। इन्हें बचाने के लिए जो गौशालाएं खुलीं, वे कारगर न हुईं। कुछ लोगों ने उन्हें सिर्फ चंदा वसूलने का धंधा बना लिया। उनसे न तो गायों की नस्लों का विकास हुआ और न संख्या बढ़ी। पशुओं को किसान विरोधी बनाकर कभी उनकी संख्या नहीं बढ़ाई जा सकती। गांव में जो परती जमीनें थीं, उन्हें चारागाह में तब्दील करने के बजाय पट्टे पर दे दिया गया। अब गांवों में सार्वजनिक जमीनें बची ही नहीं, जहां जानवरों को चराया जा सके। चारागाह खत्म हुए, तो चरवाही खत्म हो गई और उसी के साथ पशुओं को पालने की संस्कृति भी खत्म हो गई। अब देशी हल का जमाना भी लद गया। टैक्टर और कम्बाइन ने उन्हें विस्थापित कर दिया। इसलिए पड़वों की हल खींचने में उपयोगिता खत्म हो गई। ऊपर से हमने बूचड़खानों के लिए उनकी बिक्री को रोक कर राजनीति का अखाड़ा बना दिया। ऐसे में उनके लिए सड़कों पर स्वतंत्र विचरण के अलावा कोई उपाय न था। पालक और पशु का रिश्ता खत्म हो गया। अब ‘दो बैलों की जोड़ी’ कहानी नहीं लिखी जा सकती। गाय को हमने धर्म और संप्रदाय में बांट दिया। हमारी गलत नीतियों से चमड़ा उद्योग खतरे में पड़ गया है और हड्डियों से तैयार खाद की किल्लत बढ़ गई है।
आज गोबर की कमी से देसी खाद की अनुपलब्धता ने किसानों के सामने नई मुसीबत खड़ी कर दी है। गोबर की खाद के बिना खेत बंजर बनते जा रहे हैं। रासायनिक खादों के बल पर खेती बहुत आगे तक लाभदायक नहीं रहने वाली है। पशुओं के गोबर का खेती में जो योगदान था, उसका फिलहाल कोई विकल्प नहीं दिखता। जो गायें दूध देने की स्थिति में नहीं रहेंगी, उन्हें किसान दरवाजे पर बांधने का बोझ कैसे उठा सकता है? उनका होगा क्या-इस पर विचार किया जाना चाहिए था। मैदानों में छुट्टा छोड़ दिए गए गाय, बछड़े और सांड़ों ने फसलों को बर्बाद करना शुरू कर दिया है। इन समस्याओं के चलते किसानों ने गाय पालना बंद कर दिया है। 

दूध उत्पादन का कम हो जाना, उसी का परिणाम है। हमें गंवई अर्थव्यवस्था की पूरी संरचना को समझना होगा। गायों को बचाने के लिए, इनके पालन-पोषण, बिक्री को राजनीति से मुक्त करना होगा। चारागाह की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए बड़े-बड़े जोतदारों की जमीनें अधिग्रहित कर चारागाहों का निर्माण करना होगा। तभी गाय माता की वंश परंपरा कायम रह सकती है और पशुधन की संस्कृति बची रह सकती है।
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