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कोरोना काल में 'एनिमल फार्म'

Thu, 16 Jul 2020 11:03 AM IST
मनोज मिश्रा मनोज मिश्र
मनोज मिश्र Published by: मनोज मिश्रा Updated Thu, 16 Jul 2020 11:03 AM IST
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Animal Farm in the Coronavirus period
coronavirus - फोटो : PTI
ऑल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम आर मोर इक्वल यानी सभी जानवर बराबर हैं, लेकिन कुछ ज्यादा बराबर हैं। ऐसे वक्त में जब कोरोना महामारी की आड़ लेकर दुनिया के तमाम राजनेता जनता के हितों की दुहाई देते हुए सत्ता को और अधिक केंद्रीयकृत करते जा रहे हैं, खुद को इस  दौर का खुदा बनाते चले जा रहे हैं, तब बिहार के एक कस्बाई जिले मोतिहारी में जन्मे ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल के बहुचर्चित उपन्यास एनिमल फार्म का यह वाक्य अनायास मस्तिष्क में कौंधता है और कभी पढ़े जा चुके इस उपन्यास को एक बार फिर शेल्फ से उठाने के लिए बाध्य करता है।

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कालजयी रचनाओं की यही खासियत होती है। वह बदलते समय और संदर्भ में नए अर्थ ग्रहण करके न केवल अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती हैं, बल्कि कहीं ज्यादा अर्थवान हो जाती हैं। एनिमल फार्म की ख्याति इसलिए है कि इसमें तत्कालीन सोवियत सत्ता के एकाधिकारवाद का उपहास उड़ाया गया है। स्टालिन के दौर में जिस तरह सत्ता का केंद्रीयकरण हुआ और निजता मानवाधिकार न रहकर कुछ मुठ्ठी भर लोगों का विशेषाधिकार बन गई, उस पर यह उपन्यास जानवरों की कहानी के बहाने मारक ढंग से प्रहार करता है।

उपन्यास की कहानी बेहद सीधी है। शोषण से तंग आकर एनिमल फार्म के जानवर अपने मालिक के खिलाफ विद्रोह का निर्णय लेते हैं। क्रांति का नेतृत्व करते हैं दो सुअर, नेपोलियन और स्नोबॉल। लेकिन, समानता और भाईचारे के आदर्श के साथ शुरू हुई क्रांति कुछ दिनों में तानाशाही का पर्याय बन जाती है। बड़े-बड़े सपने दिखाने वाला नेपोलियन सारी सत्ता अपने हाथ में ले लेता है। वह सत्ता के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को बंद कर देना चाहता है। निजता के कोई मायने नहीं रह जाते।

जॉर्ज ऑरवेल घटनाक्रम का ऐसा ताना-बाना बुनते हैं कि क्रांति के भीतर की तमाम विसंगतियां, विद्रूप तथा विरोधाभास खुल कर सामने आ जाते हैं। उपन्यास की अंतिम पंक्तियां हैं- ‘कई आवाजें गुस्से में चिल्ला रही हैं और सभी आवाजें एक- सी लग रही हैं। कोई सवाल नहीं कर रहा था कि सुअरों के चेहरों को क्या हो गया है। फॉर्म हाउस के बाहर खड़े प्राणी कभी सुअरों को देखते, कभी इंसानों को। फिर इंसानों से लगने वाले सुअरों को। लेकिन, अब यह कहना असंभव हो गया था कि कौन चेहरा किसका है।’

मनुष्यता और पशुता के बीच का मिटता फासला जॉर्ज ऑरवेल के एनिमल फार्म  का ही सच नहीं है, यह हमारे समय का भी सच है। इस दौर में नायक और खलनायक के बीच का फर्क 1945 के अपेक्षा कहीं ज्यादा धुंधला हुआ है। सामान्यजन के लिए तय करना मुश्किल है कि कौन वास्तविक नायक है और कौन बड़े-बड़े वादे कर भरमा रहा एनिमल फार्म का नेपोलियन।

यह उपन्यास जब 1945 में छपकर आया, तो पश्चिमी दुनिया ने हाथों-हाथ लिया, लेकिन आज 2020 में पश्चिम शायद ही इसकी चर्चा करना चाहे। अब यह किताब उन्हें ही आईना दिखा   रही है। वरिष्ठ अमेरिकी चिंतक नोआम चॉम्स्की हों या फिर इजरायल के विख्यात दार्शनिक- इतिहासकार युवाल नोहा हरारी, सभी अपने लेखन के जरिये इन चेहरों को रोज ब रोज बेनकाब कर रहे हैं।

बता रहे हैं कि पिछली कई शताब्दियों में मानव सभ्यता ने विभिन्न संघर्षों के जरिये समानता, भ्रातृत्व, अभिव्यक्ति की आजादी और निजता का अधिकार इत्यादि जो भी श्रेष्ठ मूल्य अर्जित किए थे, उन्हें इस सदी के पहले दो दशकों में ही एनिमल फार्म के नेपोलियन या तो छीन चुके हैं या फिर दांत गड़ाए बैठे हैं।

लेकिन क्या आज के नेपोलियन इस बात को समझेंगे, ना निरापद कोई नहीं है/ न तुम, न मैं, न वे/ न वे, न मैं, न तुम।’ इसी कविता में भवानी प्रसाद मिश्र आगे जोड़ते हैं - सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की!’ आसक्ति पद की, आसक्ति सत्ता की, आसक्ति यश की और आसक्ति अमर होने की।
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