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मंजिलें और भी हैं: किसानों के बीच काम करने के लिए दिल्ली छोड़ दिया

Fri, 20 Sep 2019 08:53 AM IST
Anika Pandey अनिका पांडे
Updated Fri, 20 Sep 2019 08:53 AM IST
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Anika Pandey Work for poverty stricken farmers founded Jagat Kalyan Honey Product Group
Anika Pandey - फोटो : अमर उजाला

मैं कभी सोचती भी नहीं थी कि इस आदिवासी इलाके में किसानों के बीच उनकी लीडर बनकर काम करूंगी। मैं इन किसानों को अतिरिक्त आमदनी के तरीके बता रही हूं। मैंने इससे पहले कभी मधुमक्खी पालन नहीं किया। यों तो मैं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद की रहने वाली हूं। मैंने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ काॅमर्स से ग्रेजुएशन किया है। इसके बाद मैं बंगलूरू में ‘गोल्डमेन सेस एसेट मैनेजमेंट’ के लिए काम करने लगी।


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मैं कभी सोचती भी नहीं थी कि इस आदिवासी इलाके में किसानों के बीच उनकी लीडर बनकर काम करूंगी। मैं इन किसानों को अतिरिक्त आमदनी के तरीके बता रही हूं। मैंने इससे पहले कभी मधुमक्खी पालन नहीं किया। यों तो मैं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद की रहने वाली हूं। मैंने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ काॅमर्स से ग्रेजुएशन किया है। इसके बाद मैं बंगलूरू में ‘गोल्डमेन सेस एसेट मैनेजमेंट’ के लिए काम करने लगी।

साथ ही सप्ताह के अंत में बंगलूरू की एक संस्था ‘मैजिक बस फाउंडेशन’ के लिए वालंटियर के तौर पर काम करती थी। वहां मैं तकरीबन दो हजार बच्चों की मेंटरिंग का काम करती थी। उन बच्चों को खेल के जरिये लाइफ स्किल सिखाती थी। धीरे-धीरे मुझे समाज के लिए काम करने की प्रेरणा मिली। इसके बाद मैं आदिवासी किसानों के साथ काम करने के लिए ओडिशा में एक एनजीओ में शामिल हुई। मैंने किसानों के लिए काम करने का निर्णय लिया।

मुझे लगा कि उनकी समस्या को जानने और समझने के लिए उनके बीच रहना जरूरी है। इसलिए मैं दिल्ली छोड़कर ओडिशा के गजपति जिले में पहुंच गई। जंगलों से घिरे इस इलाके के किसान अतिरिक्त आय के लिए मधुमक्खियों के छत्ते से शहद निकालते थे। मैंने वहां महसूस किया कि स्थानीय लोगों को मधुमक्खियों से डर नहीं लगता और उनको शहद बेचना भी पसंद है।

मैंने देखा कि किसान जब मधुमक्खी के छत्ते से शहद निकालते थे, तो वे उन छत्तों को जला देते थे या फिर छत्ते में लगी मधुमक्खियों को मार देते थे। मधुमक्खी के मरने से उनके द्वारा किया जाने वाला परागण भी खत्म हो जाता था, जिससे किसानों की फसल को बीस-तीस प्रतिशत तक नुकसान होता था। तब मैंने इन किसानों को आधुनिक तरीके से मधुमक्खी पालन सिखाने का विचार किया।

मैंने सबसे पहले कृषि विज्ञान केंद्र से मधुमक्खी पालन की ट्रेनिंग ली और इंटरनेट के जरिये इस पर काफी रिसर्च किया। इसके बाद मधुमक्खी के कुछ बक्सों के साथ मैंने इसकी शुरुआत की। पहले मुझे काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस वक्त किसी को भी मेरे काम पर भरोसा नहीं था, इसलिए कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया। तब मुझे हर काम खुद ही संभालना पड़ता था। इसके बावजूद मैंने अन्य किसानों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया।

मैंने तकरीबन चालीस किसानों को चार-पांच ग्रुप में बांट दिया। हर ग्रुप में एक किसान अध्यक्ष होता है और एक सचिव की भूमिका निभाता है। इससे किसान खुद ही अपने काम को लेकर जिम्मेदार बनने लगे और खुद ही अपना काम करने लगे। इस प्रोजेक्ट को मैंने तीन लाख रुपये लगाकर शुरू किया। यही वजह है कि जब कभी एक भी मधुमक्खी भाग जाती थी, तो उसका नुकसान उठाना पड़ता था। हालांकि अब मैं खुद और मेरे साथ जुड़े अन्य किसान प्राकृतिक रूप से मधुमक्खियां पकड़ना सीख गए हैं।

मैंने इन किसानों का एक ज्यॉइंट अकाउंट भी खुलवाया है, जिसमें वे हर महीने डिब्बे के हिसाब से सौ रुपये डालते हैं। इस रुपये का इस्तेमाल वे नए डिब्बे खरीदने में करते हैं। इन्हीं कोशिशों के चलते अब यहां हर किसान महीने में डेढ़ से दो हजार रुपये का शहद बेच लेता है। इससे किसान को खेती के अलावा अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती है। तकरीबन चालीस किसानों के साथ मेरे पास दो सौ से ज्यादा बक्से हैं, जिनका हम रखरखाव कर रहे हैं।

मैंने किसानों का एक संगठन बनाया है, जिसमें शामिल हर किसान के पास मधुमक्खी के दो डिब्बे हैं। जैसे ही किसान मधुमक्खी पालन को अच्छी तरह से सीख जाएंगे मैं सारे डिब्बे किसानों को सौंप दूंगी। यहां पर जो भी किसान यह काम कर रहे हैं, वे भारतीय प्रजाति की मधुमक्खियां पाल रहे हैं।

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
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