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...और तब हमने पढ़ा रघुवीर जी का लिखा तुक्तक

Sun, 23 Mar 2014 12:00 AM IST
कैलाश वाजपेयी
कैलाश वाजपेयी Updated Sun, 23 Mar 2014 12:00 AM IST
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kailash vajpayee article

लखनऊ विश्वविद्यालय ने हमें अनेक लेखक, कवि और चिंतक दिए हैं। फिर भी इन तमाम नामों में से दो नाम जरूर ऐसे हैं, जिन्हें हम हिंदी कविता के क्षेत्र में सर्वोपरि मानकर उन्हें नमन करते हैं। पहला नाम है आदरणीय कुंवर नारायण का और दूसरा रघुवीर सहाय का।

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लखनऊ में ही जन्मे रघुवीर जी की शिक्षा-दीक्षा भी लखनऊ में ही हुई। हमने जब लखनऊ विश्वविद्यालय में कदम रखे, तब तक रघुवीर जी शिक्षा पूरी कर वहीं ‘नवजीवन’ दैनिक में कार्यरत हो चुके थे। पचास के दशक में लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए हमें श्रीकुंवर नारायण को जानने का सुअवसर मिला।
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यह साक्षात्कार उनके पहले कविता संग्रह ‘चक्रव्यूह’ के प्रकाशन के ही साथ हुआ। जबकि रघुवीर जी से पहली भेंट एक रेडियो कवि गोष्ठी में हुई। एक बार जब रघुवीर जी का सान्निध्य हमें मिला तो वह रघुवीर जी की अर्थी में कंधा देने तक, निगमबोधघाट पर उनके देहदाह तक चलता रहा। समय कितनी जल्दी बीत जाता है, आज रघुवीर जी को गए तेईस वर्ष से भी अधिक हो गए। सर्दियों के दिन थे, रघुवीर जी, कुंवर भाई और विनोद भारद्वाज हमारे इसी आवास डी-203 में बैठे हुए थे। रूसी लेखक एलेक्जेंडर सेंकेविच हमारे मेहमान थे।
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दूरदर्शन के कुबेरदत्त कैमरा लेकर आए हुए थे। हम सभी की रचनाएं और काव्य संबंधी टिप्पणियों को रिकॉर्ड कर, जब कुबेर सहित सभी चाय पीने की तैयारी में थे कि तभी रघुवीर जी भीतर आकर रूपा, जिसे रघुवीर जी अपू कहकर बुलाते थे, से क्षमा मांगकर बाहर चले गए। यहां यह स्पष्ट करना अनुपयुक्त न होगा कि रघुवीर जी साकेत के पास बने प्रेस एंक्लेव में रहते थे, जहां हम दोनों अक्सर उन्हीं के अपार्टमेंट के पीछे बने कब्रिस्तान की घास पर चटाई बिछाकर बतियाया करते थे। रघुवीर जी जहां एक ओर सत्ता और वाणी के तीव्रतर होते द्वंद्व में सत्ता द्वारा वाणी पर होने वाले आक्रमणों के विरुद्ध लिखते रहना, लेखक के लिए जीवित रहने का अंतिम उपाय मानते थे।

वहीं दूसरी तरफ अपनी विनोदभरी मन: तरंग में अमेरिकी कवि ऑग्डेन नैश की तरह तुक्तक भी लिखा करते थे। याद नहीं वह कौन सा वर्ष था, हम सब भारत भूषण अग्रवाल के कमरे में बैठे हुए थे। भारत जी बोले, 'कल शाम से आज तक सोया नहीं हूं। लिखने बैठा था कुछ गंभीर चीज और बनकर निकल पड़ा यह तुक्तक-

नींद भी न आई गिने भी न तारे
गिनती ही भूल गए बिरहा के मारे
सारी रात यादकर
गुणा और भागकर
गिनती जब याद हुई
डूब गए तारे।'
पंक्तियां सचमुच गुदगुदा देने वाली थीं। तभी मनोहर श्याम जोशी बोले- 'ऐसा कुछ तो हमने भी लिखा था-
हमारे पांव पांव
तुम्हारे पांव चरन
क्या बात करते हो भैय्या हरचरन।'

रघुवीर जी उस दिन तो कुछ नहीं बोले। मगर एक सप्ताह बाद होली के आसपास हम रघुवीर जी के आवास पर गए। द्वार खुला था, रघुवीर जी स्नानागार में थे। हम बैठ गए। सामने रघुवीर जी की डायरी भी औंधी पड़ी थी। जो पंक्तियां हमने पढ़ीं, अब तक याद हैं- पढ़िए गीता/ बनिए सीता /फिर इस सबमें लगा पलीता/निज घरबार बसाइए/ हौंय कटीली/ अंखियां गीली/ घर की सबसे बड़ी पतीली/ भर भर भात पकाइए।
पता नहीं ये पंक्तियां उनके किसी संकलन में हैं या नहीं मगर हैं अविस्मरणीय।

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