और अब देबराय कमेटी
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यह वर्ष 2001 की शुरुआत की बात है, जब राकेश मोहन कमेटी ने भारतीय रेल के संकट के बारे में चेतावनी दी थी। कमेटी ने कहा था कि देश के सबसे बड़े परिवहन तंत्र के रूप में रेलवे की अनिवार्यता बनाए रखने के लिए सरकार को मौजूदा टालू रवैया छोड़कर तत्काल ठोस कदम उठाने होंगे। तब से लेकर आठ मंत्री, तीन सरकारें, 11 कमेटी, 144 सुझाव और दो श्वेतपत्र अस्तित्व में आ चुके हैं, पर भारतीय रेलवे में शायद ही किसी विवेकपूर्ण सलाह का असर दिखता हो। इसका सीधा-सा कारण है कि समय-समय पर विभिन्न कमेटियों द्वारा सौंपी गई सिफारिशों पर बहुत कम अमल हुआ।
पिछले हफ्ते बिबेक देबराय कमेटी ने भारतीय रेल के संकट पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। उन्होंने एक रेलवे विनियामक प्राधिकरण बनाने, बीएसएनएल एवं ओएनजीसी की तरह रेलवे का कॉरपोरेटीकरण करने, ट्रेनों के परिचालन एवं सेवा में निजी क्षेत्र के प्रवेश के लिए उदार नीति अपनाने, सामाजिक लागत से संबंधित बिल रेलवे केंद्र एवं राज्य सरकारों को भेज सके, इसके लिए एक नई लेखा प्रणाली शुरू करने और रेलवे के कामकाज में लगे 16 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को ज्यादा स्वायत्त बनाने के लिए एक एसपीवी यानी स्पेशल पर्पस ह्विकिल बनाए जाने की सिफारिश की है। पिछले पंद्रह वर्षों में भारतीय रेल के संकट पर यह बारहवीं रिपोर्ट है।
अक्सर हंसते हुए कहा जाता है कि देश जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, उन पर अध्ययन के लिए सरकार ने एक कमेटी बना दी है। फिर भी समस्याएं बनी रहती हैं और कमेटियां बनती रहती हैं। मोदी सरकार ने भी जरूरी वजहों से कमेटियों का गठन किया। अब तक गठित कमेटियों की ठीक-ठीक गणना तो नहीं की गई है, लेकिन केंद्र सरकार से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इनकी संख्या 60 से 75 के बीच तो होगी ही। ध्यान रहे कि ये कमेटियां संस्थागत और अंतर-मंत्रालयी समितियों के अतिरिक्त हैं।
कुछ मंत्रियों को लेकर एक कमेटी का गठन एक बुनियादी धारणा है। उदाहरण के लिए, रेल मंत्रालय को ही ले लीजिए। बिबेक देबराय कमेटी की रिपोर्ट से पहले रेलवे की वित्तीय सेहत पर मित्तल कमेटी की रिपोर्ट आई थी। फिर ट्रैफिक ग्रोथ पर कमेटी, रेलवे में सुधार और कामकाज के प्रदर्शन पर श्रीधरन कमेटी, रेलवे वित्त का एडवाइजरी बोर्ड, रतन टाटा के नेतृत्व में कायाकल्प काउंसिल, पीपीपी सेल के पुनर्निर्माण के लिए कमेटी, टेक्नोलॉजी मिशन और आईटी विजन-यानी यह सूची काफी लंबी है।
आम तौर पर कमेटियों का यह मिश्रण उदात्त और अतियथार्थवादी रहा है। मसलन, वैज्ञानिकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से 65 साल करने के लिए भी एक कमेटी है, जबकि हमारी अर्थव्यवस्था को निरंतर बढ़ते कार्यबल के दबाव का सामना करना पड़ रहा है! दिल्ली को भीड़-भाड़ से मुक्त करने पर भी एक कमेटी है। इसी तरह, आपदा के दौरान संचार नेटवर्क को बेहतर बनाने पर एक कमेटी है, जल संसाधन मंत्रालय का नदियों को जोड़ने के लिए एक कार्यबल और एक स्पेशल कमेटी है, पेट्रोलियम मंत्रालय के अंतर्गत ऑटो फ्यूल विजन पर मसौदा नीति बनाने के लिए एक कमेटी है और परिवहन मंत्रालय के अंतर्गत एक राष्ट्रीय परिवहन विकास नीति कमेटी है। और फिर पीपीपी मॉडल है- इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित लगभग सभी मंत्रालयों का सार्वजनिक निजी भागीदारी के गठन का अपना अलग संस्करण है।
व्यवसाय शुरू करने के लिए विभिन्न पूर्व अनुमतियों से छुटकारा दिलाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति है। एक ऐसी कमेटी के गठन के बारे में आपका क्या विचार है, जो केंद्र से लेकर राज्य स्तरों तक व्याप्त बहुस्तरीय अनुमतियों से छुटकारा दिलाए और परमिशन राज को खत्म करे? अगस्त, 2014 में व्यय प्रबंधन आयोग का गठन किया गया था। बिमल जालान पैनल ने सरकारी लेखा, सब्सिडी, वितरण तंत्र और प्रौद्योगिकी के उपयोग पर अपनी अंतरिम रिपोर्ट पेश की। शायद ही इसकी विषय वस्तु या इसके क्रियान्वयन पर कभी कोई बहस हुई हो। शांता कुमार कमेटी ने भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन एवं सरकारी खरीद व जनवितरण प्रणाली में सुधार पर अपनी रिपोर्ट इसी वर्ष जनवरी में सौंपी थी, लेकिन यह जून का महीना है, मगर अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि इसे स्वीकार किया गया या खारिज कर दिया गया। गहरे समुद्र में मछली पकड़ने से संबंधित मुद्दों (यह ऐसा मुद्दा था, जिसने कई राज्यों और सांसदों को उत्तेजित किया था) पर एक समिति ने अपनी रिपोर्ट अगस्त, 2014 में पेश की थी। क्या आपको पता है कि रिपोर्ट का कौन-सा हिस्सा स्वीकार किया गया और किसे खारिज कर दिया गया?
यहां एक सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या कमेटियों, उनके सुझाव एवं उनके क्रियान्वयन की केंद्रीय स्तर पर लेखा-जोखा रखने की कोई व्यवस्था है। अक्सर कमेटियों के बाद एक रिव्यू कमेटी का गठन किया जाता है। रक्षा पर केलकर समिति ने वर्ष 2005 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। एक दशक बाद अब एक नई समिति रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के कामकाज की समीक्षा कर रही है। पारंपरिक ज्ञान बताता है कि विशेषज्ञों का निष्कर्ष समस्या के हल में मदद करता है। यूपीए ने समितियों और आयोगों का एक बेड़ा तैयार किया और उनसे समाधान के लिए टनों दस्तावेज उत्पन्न हुआ। पिछले दशक की परिपाटी हमें बताती है कि समस्याओं के समाधान के लिए एक के बाद एक बनी समितियों ने समाधान को स्थगित करने का ही काम किया।
कमेटी राज का मतलब है, समस्याओं को लंबित रखना। मोदी सरकार को इसके ऑडिट के लिए व्यवस्था करनी चाहिए और समितियों के सुझावों पर अमल के लिए अविलंब एक समय-सीमा निर्धारित करनी चाहिए। क्या सरकार इसके लिए वाकई तैयार है?
-अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक