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एक अफसर को देखा तो...

Fri, 01 Feb 2013 12:36 AM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Fri, 01 Feb 2013 12:36 AM IST
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an officer saw

सट्टेबाजों की तरह मैं भी बहुत ही निराश हूं आजकल के अफसरों से! आम आदमी और अफसर का अंतर तो बना ही रहना चाहिए। यह तयशुदा नियम है कि जहां आम आदमी होगा, वहां अफसर नहीं जाएगा और अफसर के आसपास भी आम आदमी नहीं फटक सकता। अब तक तो यही होता आया है, इसलिए हम अफसर से डरते रहे हैं, बल्कि हम तो यही मानते रहे हैं कि जनता को डराने के लिए ही अफसर बनाए जाते हैं।

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पुराने जमाने में होते थे अफसर। ये बड़ी-बड़ी मूंछें, आवाज ऐसी कड़क कि आसमान में बिजली भी आवाज दबा के रखती थी। ये अफसर काम-धाम भले ही कौड़ी का नहीं करते हों, मगर अफसरी बनाए रखने में दिन-रात भिड़े रहते थे। आज के अफसर तो कर्फ्यू लगाते हैं, फिर भी बच्चा बाहर दिखाई दे जाता है। मगर पुराने समय में तो अफसर ही निकल जाते थे रास्ते से, तो पूरा इलाका घरों में दुबक जाता था।
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अपने से बड़ों के सामने भले ही आम जनता से भी गए-गुजरे नजर आते रहे हों, मगर आम लोगों के बीच हंसना-मुस्कराना तो दूर, सामान्य भी नहीं रहते थे तब के अफसर! वे न चैन से बैठते थे और न ही किसी आसपास वाले को खड़ा रहने देते थे। वही अफसर ज्यादा काबिल समझा जाता था, जिसके पीठ फेरते ही लोग तो लोग, आसपास वाले भी बद्दुआएं देने लगते थे।
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तब के अफसर पूरे चौबीस घंटे खालिस अफसर ही होते थे। यहां तक कि सपने में भी वे अफसर ही बने रहते थे। उन अफसरों की यह खूबी होती थी कि वे सभी को समान रूप से देखते थे। घर में बाई साब और बेबी-बाबा साहब भी तभी हंसते-मुस्कराते थे, जब अफसर टूर पर गए होते थे।

ये अफसर ‘मार्निंग वॉक’ में भी इस अदा से निकलते थे, जैसे कहीं हमला करने जा रहे हों। अब देखिए, आज के अफसरों को! वे जनता से बात करने लगते हैं, उनकी बात समझने लगते हैं, वायदा करते हैं और उसे पूरा करने का भी वायदा करते हैं। ये नेताओं वाले गुण नहीं शोभते अफसरों को! कुछ तो ऐसा हो कि आमजन और अफसर का फर्क समझ आए।

 
वक्त आ गया है कि आम आदमी जैसे इन अफसरों की जगह ‘असली अफसर’ भर्ती किए जाएं। जनता अगर डरेगी नहीं, तो अफसर किस काम के। बराबरी पर खड़े होकर बात करने वाले अफसर तो हो ही नहीं सकते। जनता की तरह लगने वाले इन नए अफसरों से न मुझे उम्मीद है और न ही सटोरियों को।

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