फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   An attempt to find a way to the Supreme Court on agricultural law

कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट की रास्ता तलाशने की कोशिश

Thu, 14 Jan 2021 08:12 AM IST
सुभाष कश्यप सुभाष कश्यप, लोकसभा के पूर्व महासचिव
सुभाष कश्यप, लोकसभा के पूर्व महासचिव Published by: सुभाष कश्यप Updated Thu, 14 Jan 2021 08:12 AM IST
विज्ञापन
सार
सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ परिस्थिति को शांत करने के लिए राष्ट्रहित में एक रास्ता ढूंढ़ने की कोशिश की है। उसे उम्मीद थी कि उसकी पहल से किसान मान जाएंगे और सरकार भी थोड़े समय चैन की सांस लेगी। एक रास्ता यह हो सकता है कि ये कानून राज्यों पर छोड़ दिए जाएं।
 
loader
An attempt to find a way to the Supreme Court on agricultural law
किसानों का आंदोलन - फोटो : पीटीआई

विस्तार

कृषि कानूनों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का संविधान से सीधे कोई लेना-देना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रहित और जनहित में स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश की है। उसने दोनों पक्षों की मदद की कोशिश है, ताकि गतिरोध टूटे। इससे किसानों, जिन्हें तथाकथित किसान कहना उचित होगा, को संतुष्टि मिल जाएगी कि तीनों कानून स्थगित कर दिए गए हैं और लोगों के घर लौटने से सरकार को भी राहत मिलेगी, और इस तरह स्थिति को सामान्य बनाने में मदद मिल सकती है। मेरे निजी विचार से, तो इसमें सुप्रीम कोर्ट की कोई भूमिका थी ही नहीं। 



संविधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट तीन परिस्थितियों में केंद्रीय कानूनों के बारे में अख्तियार रखता है, पहला, संसद ने ऐसा कानून पारित किया हो, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो; किसी ऐसे विषय पर जो राज्य का विषय हो और इस पर संसद कोई कानून बनाए, तो सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल दे सकता है। दूसरा, यदि किसी व्यक्ति के मूल अधिकार का उल्लंघन हुआ हो, तो वह सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है। तीसरा, किसी विषय पर केंद्र और राज्य के बीच झगड़ा हो, या कोई ऐसा कोई कानून बनाया गया हो, जिसमें केंद्र और राज्य के दृष्टिकोण भिन्न हों, तो यह विषय सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है। मगर मौजूदा तीनों कृषि कानूनों के मामले में ये तीनों ही बातें लागू नहीं होतीं। जहां तक मूल अधिकार के उल्लंघन की बात है, तो जो लोग धरने पर बैठे हैं, वे आम लोगों के मूल अधिकारों का हनन कर रहे हैं। उनके धरना-प्रदर्शन से शहर और गांव के लोगों को परेशानी हो रही है, क्योंकि सड़कें बंद कर दी गई हैं। आंदोलन कर रहे किसानों के मौलिक अधिकारों के हनन का तो सवाल ही नहीं उठा है। यह सवाल भी नहीं  उठा है कि केंद्र और राज्यों के बीच कृषि कानूनों को लेकर झगड़ा है।


अलबत्ता कृषि राज्य सूची में शामिल है, लेकिन जो कानून बनाए गए हैं, वे उन विषयों से संबंधित हैं जो केंद्र सूची में शामिल हैं या समवर्ती सूची में शामिल हैं, कानून मंत्रालय ने इसका बारीकी से परीक्षण किया था। मसलन, अंतर राज्यीय व्यापार, तो यह केंद्र का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इन कानूनों को लेकर ये तीन बातें नहीं कही हैं, यानी इसमें किसी तरह का सांविधानिक उल्लंघन नहीं हुआ है। यानी साफ है कि तीनों कृषि कानूनों से संबंधित मामले सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उसे मिले विशेषाधिकार का उपयोग किया है। इस अनुच्छेद के तहत सुप्रीम कोर्ट तथ्यों और परिस्थितियों के आधा र पर कोई आदेश पारित कर सकता है। 

मैं समझता हूं कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ परिस्थिति को शांत करने के लिए राष्ट्रहित में एक रास्ता ढूंढ़ने की कोशिश की है। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को उम्मीद थी कि इससे किसान भी मान जाएंगे, क्योंकि इससे तीनों कृषि कानून के अमल पर रोक लगाई जा रही है और सरकार को भी थोड़े समय के लिए चैन की सांस मिलेगी। उसने जो समिति बनाई है, वह यदि कोई रास्ता ढूंढ़ लेती और दोनों पक्ष राजी हो जाते, तो सुप्रीम कोर्ट को अपने अधिकार क्षेत्र से जुड़े दूसरे सवालों पर सर खपाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट कुछ ज्यादा आशावान था, क्योंकि तथाकथित किसानों की ओर से इस समिति को स्वीकार ही नहीं किया गया है। ऐसा लगता है कि किसानों के कथित प्रतिनिधि समाधान चाहते ही नहीं, उनकी दिलचस्पी राजनीति में अधिक दिखाई दे रही है। यह राजनीति मोदी और भाजपा विरोध की राजनीति है, आंदोलन स्थल पर लहराने वाले लाल झंडों से इसका अंदाजा होता है। वहां कथित तौर पर खालिस्तान के तत्व भी घुस आए हैं। समिति के सदस्यों के कृषि कानूनों के रुख को लेकर भी असहमतियां हैं। लेकिन मेरा मानना है कि यह धारणा की बात है। किसानों के प्रतिनिधि उन्हें सरकार के पक्षधर बताएंगे और समिति के सदस्य कहेंगे कि सरकार से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। 

यह सवाल भी बार-बार उठाया जा रहा है कि तीनों कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को आगे आना पड़ा। यह समझने की जरूरत है कि देश में संविधान सर्वोपरि है और उससे ऊपर हैं भारत के लोग। संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्थापना की और इन तीनों के अधिकार क्षेत्र स्पष्ट रूप से परिभाषित और परिसीमित किए गए। कोई भी सर्वोच्च नहीं है, न संसद, न कार्यपालिका और न ही सुप्रीम कोर्ट। कानून बनाने के क्षेत्र में संसद सर्वोच्च है, कानून और संविधान की व्याख्या करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है और कानून पर अमल करने के बारे में कार्यपालिका सर्वोच्च है। हमारे यहां सांविधानिक शासन है, और सरकार संविधान के अनुसार चलती है। हमारे यहां लोकतंत्र है भीड़तंत्र नहीं। जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कानून बनाते हैं। जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों ने कृषि कानून बनाए, इसलिए यह नहीं कह सकते कि सरकार गलत थी। उसे जनहित में जो उचित लगा वह उसने किया। संस्कृत के एक श्लोक का भावार्थ है, बहरा कौन है? जो अपने हित की बात भी न सुनता हो। 

मौजूदा गतिरोध को देखते हुए मैं एक आम आदमी की तरह सोचता हूं कि क्या इन कानूनों को राज्यों की सरकारों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, हालांकि इसकी कानूनी स्थिति को देखना होगा। सरकार की ओर से कहा गया है कि सिर्फ दो राज्यों के लोग ही इसके विरुद्ध हैं, बाकी सारे राज्यों के लोग इसके पक्ष में हैं। अगर ऐसा है, तो क्या राजनीतिक प्रबंधन के तहत, जिन दो राज्यों के लोग ये कानून नहीं चाहते उन्हें छोड़कर बाकी राज्यों में इन्हें लागू किया जाए? इसके बाद जो अनुभव हो, उसके आधार पर ये दो राज्य भी फैसला ले सकते हैं। यानी एक रास्ता यह हो सकता है कि ये कानून राज्यों पर छोड़ दिए जाएं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed