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एक दृढ़ संकल्प भरी विदेश नीति

Thu, 26 Jun 2014 07:19 PM IST
मनोज जोशी
मनोज जोशी Updated Thu, 26 Jun 2014 07:19 PM IST
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An assertive foreign policy

नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति दो अहम तत्वों पर आधारित होनी चाहिए। पहला, आधुनिक सुविधाओं से लैस सशस्त्र बलों के नेतृत्व में राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाया जाए, और दूसरा, दक्षिण एशिया में भारत की प्रधानता स्थापित की जाए। पड़ोस में शांति और स्थिरता रहेगी, तभी भारत पश्चिमी एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र जैसे बाहरी क्षेत्रों में प्रभाव जमाने में सक्षम हो पाएगा।

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ये दोनों चीजें आसान हैं। मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा के अभाव में ही विदेश नीति में मुसीबतें आती हैं। यही कारण है कि पिछले 67 वर्षों से पाकिस्तान हमारे लिए मुश्किलें खड़ी करता रहा है। अगर भारत ने शुरू से मजबूत सैन्य दबदबा बनाए रखा होता, तो न केवल संपूर्ण जम्मू एवं कश्मीर भारत के नियंत्रण में होता, बल्कि पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते भी स्वाभाविक होते। मजबूत रक्षा क्षमता चीन के साथ भी हमारे रिश्ते को अलग धरातल पर ले जा सकती थी। लेकिन भारत ने निष्क्रिय रक्षात्मक मुद्रा बनाए रखी है, जिस कारण हम कभी क्षेत्रीय प्रमुखता हासिल करने में कामयाब नहीं हुए, जबकि दक्षिण एशिया में अपने आकार और भौगोलिक स्थिति के लिहाज से हमें वह महत्व मिलना चाहिए था।
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एक दृढ़ संकल्प भरी विदेश नीति को सहारा देने के लिए जिस मजबूत सैन्य शक्ति की जरूरत पड़ती है, उसका अभाव होने के कारण ही हम चुनौतियों का ठीक से जवाब नहीं दे पाते। बल्कि पाकिस्तान के परमाणु शक्तिसंपन्न होकर उभरने से यह समस्या बढ़ी ही है। भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए उसने अपनी इस ताकत का इस्तेमाल किया है। जब भी जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे पाक आतंकी संगठनों ने भारत को निशाना बनाया, हम उनका माकूल जवाब देने में विफल रहे। वर्ष 2001 में संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम के तहत हमने अपनी पूरी सेना सीमा पर झोंक दी। इसके बावजूद पाकिस्तान से आश्वासन के अलावा ठोस कुछ हासिल नहीं कर पाए।
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मुंबई हमले के बाद तो हमारी सरकार ने किसी तरह की सैन्य प्रतिक्रिया की भी जहमत नहीं उठाई, जबकि ऐसा कोई कदम उठाने की जरूरत थी। इसके बावजूद हमने जवाब नहीं दिया, तो इसलिए कि हमारी सेना उस तरह के युद्ध के लिए तैयार नहीं थी, जिसमें तत्काल हमला बोला जाता है। मुंबई हमले के बाद लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालय पर हवाई हमला माकूल जवाब हो सकता था। पर हमारी सरकार ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि इससे भयानक युद्ध छिड़ने का डर था और सेना की तैयारी में कमी की बात सामने आ जाती। जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारी सेना के पास उचित गोला-बारूद का अभाव है और हवाई हमले के मोर्चे पर भी हम कमजोर हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार के सामने सशस्त्र बलों को व्यवस्थित करने के लिए एक लंबा एजेंडा है। लेकिन फिलहाल सबसे जरूरी रक्षा मंत्रालय को एक योग्य और पूर्णकालिक मंत्री उपलब्ध कराना है। अरुण जेटली अपनी क्षमताओं के लिए जाने जाते हैं, पर वित्त एवं रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का संचालन करने के लिए उन्हें सुपरमैन बनना पड़ेगा। रक्षा मंत्रालय में अगले पांच वर्षों में काफी कुछ करने की जरूरत होगी। न केवल सशस्त्र बलों, बल्कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास और रक्षा उद्योग क्षेत्र में भी सुधार और पुनर्गठन की जरूरत है।

यह तो स्पष्ट है कि मोदी सरकार की विदेश नीति में दक्षिण एशिया पर मुख्य ध्यान केंद्रित किया जाएगा। शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेस देशों के नेताओं को आमंत्रित कर और पहली विदेश यात्रा के लिए भूटान को चुनकर उन्होंने यह जाहिर भी कर दिया है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का बांग्लादेश दौरा इसी नीति के तहत हुआ है। मोदी ने तमिलनाडु को भी यह संकेत दिया है कि श्रीलंका के बारे में भारतीय नीति किसी एक राज्य की राजनीतिक सनक से तय नहीं होगी। संभवतः सुषमा स्वराज भी ऐसा ही संदेश लेकर बांग्लादेश गई हैं।

आज एक दूसरे देशों के साथ रिश्तों में जुड़ने के पीछे आर्थिक सहयोग ही प्रमुख कारण है। अमेरिका के बड़े व्यापार कारोबारी मैक्सिको और कनाडा जैसे उसके पड़ोसी देश ही हैं। फ्रांस और जर्मनी, चीन और जापान तथा दक्षिण कोरिया और ताइवान के बीच रिश्ते के पीछे भी यही सच है। दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय व्यापार क्षेत्रीय जीडीपी के दो फीसदी से भी कम है, जबकि पूर्वी एशिया में यह आंकड़ा 20 फीसदी है।

दक्षिण एशिया में भारत की श्रेष्ठता साबित करने की दिशा में चीन सबसे बड़ी चुनौती है। बीजिंग के सहयोग से ही पाकिस्तान भारत की बराबरी करना चाहता है। पांच दक्षिण एशियाई देशों के साथ सीमा साझा करने के कारण इस क्षेत्र में चीन के व्यापक हित हैं। वर्ष 2003 से लेकर 2012 के बीच चीन ने बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में दोगुने से भी ज्यादा निर्यात किया है। इसके अलावा, यह भारत के बड़े व्यापार साझीदार के रूप में भी उभरा है। चीन पाकिस्तान के जरिये पश्चिम एशिया तक पहुंचना चाहता है। वह म्यांमार, भारत और बांग्लादेश के रास्ते एक और कॉरिडोर का भी निर्माण करना चाहता है।


चीन से हम दो तरीके से निपट सकते हैं-एक तो निवेश और व्यापार के मामले में हमारे क्षेत्र में उसे परास्त कर, और उसकी किसी भी धमकी या हमारे छोटे पड़ोसियों के माध्यम से हमें कमजोर करने की कोशिश का प्रतिरोध करने के लिए सैन्य तंत्र को मजबूत कर। प्रतिस्पर्धा और सहयोग ही भारत-चीन संबंधों का भविष्य होगा। पर इस खेल को प्रभावी बनाने के लिए हमें क्षेत्रीय श्रेष्ठता के साथ मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा आधारित विदेश नीति बनाने की भी जरूरत है।

(ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली के प्रतिष्ठित फेलो)

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