Pakistan: आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान में चुनाव की मांग, क्या कहते हैं जमीनी हालात
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विस्तार
पाकिस्तान जैसे मुल्क में मार्शल लॉ के जरिये सीधे सैन्य शासन के विरोध को अगर छोड़ दें, तो ताकतवर सत्ता के खिलाफ दशकों का विरोध दुर्लभ ही रहा है। लेकिन हालिया नियमों और परंपराओं ने यहां की बनी-बनाई राजनीति को बदल दिया है, जिसके तहत सीधे सैन्य शासन के बजाय चुनाव के जरिये सेना अपने किसी पिट्ठू को सत्ता में बिठाती आई है। पिछले आम चुनाव में यहां यही हुआ था, जब पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा और आईएसआई के तत्कालीन मुखिया जनरल फैज हमीद ने पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ) के मुखिया इमरान खान को सत्ता में बिठा दिया था। यानी इमरान खान के प्रधानमंत्री काल में रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय का इस्लामाबाद स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय के जरिये देश पर सीधे शासन था। यही नहीं, तब जनरल बाजवा ने यह भी सुनिश्चित किया था कि उन्हें सेनाध्यक्ष के रूप में तीन साल का सेवा विस्तार मिले।
और हाल के दौर में हमने प्रतिरोध की बातें सिर्फ इस्लामाबाद में ही देखी हैं, सत्ता के विरोध में आवाज उठाती भीड़ को भी केवल इस्लामाबाद तक ही सीमित देखा गया है। पाकिस्तान के बाकी हिस्सों में किसी को इसकी परवाह नहीं है और वहां जीवन पहले की तरह ही चलता रहता है। इसी तरह रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय के किसी दरवाजे पर कभी लोगों को विरोध प्रदर्शन करते नहीं देखा गया था। दूसरे देशों के सैन्य मुख्यालय की तरह रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय भी चारों ओर से घिरा हुआ और पूरी तरह चाक-चौबंद व सुरक्षित है। पाकिस्तान में किसी प्रधानमंत्री ने कभी अपने समर्थकों के साथ सैन्य मुख्यालय के सामने प्रदर्शन करने का साहस नहीं किया।
लेकिन पिछले साल इमरान खान ने यह परंपरा तोड़ने का साहस दिखाया था, जब वह अपने समर्थकों के साथ रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय गए थे, ताकि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपनी पसंद का सेनाध्यक्ष न चुन सकें। दरअसल शहबाज शरीफ ने सेनाध्यक्ष के रूप में जनरल आसिम मुनीर का नाम आगे किया था। यह वही शख्स थे, जिन्हें इमरान खान ने प्रधानमंत्री रहते हुए आईएसआई प्रमुख के पद से हटा दिया था। इमरान खान की चिंता यह थी कि अगर आसिम मुनीर सेनाध्यक्ष बन गए, तो खुद उनकी आगे की राजनीतिक योजना पर विराम लग जाएगा। इमरान खान को लग रहा था कि भविष्य में वह फिर से प्रधानमंत्री बन जाएंगे। लेकिन आसिम मुनीर के सेनाध्यक्ष बन जाने पर यह संभव ही नहीं था, क्योंकि वह प्रधानमंत्री के रूप में इमरान खान का समर्थन कतई न करते। अलबत्ता इमरान खान की योजना पर तब उनके समर्थकों ने ही पानी फेर दिया, क्योंकि सैन्य मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन करने इमरान के कम ही समर्थक पहुंचे थे। हताश-निराश पूर्व प्रधानमंत्री ने उसके बाद किसी विरोध प्रदर्शन का आयोजन नहीं किया।
पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन के रूप में वर्ष 2007 को याद किया जा सकता है, जब सैन्य तानाशाह जरनल परवेज मुशर्रफ ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति इफ्तिखार चौधरी को बर्खास्त कर दिया था। तब न्यायपालिका की स्वतंत्रता के नारे लगाते हुए राजधानी की मुख्य सड़क कंस्टीट्यूशन एवेन्यू पर प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई थी। उनमें हजारों वकील और राजनीतिक कार्यकर्ता थे, जो मुशर्रफ के खिलाफ नारे लगा रहे थे। वह अचानक ही पाकिस्तान में एक ऐसे सहजात जन आंदोलन में तब्दील हो गया था, जिसका नतीजा आखिरकार न्यायपालिका की विजय के रूप में सामने आया। हालांकि उसके बाद वह राष्ट्रीय आंदोलन न रहकर एक प्रांतीय आंदोलन में सीमित हो गया।
बलूचिस्तान के ग्वादर में हुए ऐसे एक आंदोलन में पहली बार गांवों से महिलाओं और बच्चों ने निकलकर शिरकत की। उसमें उन्होंने अपने अधिकारों के बारे में भी आवाजें उठाईं। मसलन, उन्होंने समुद्र में मछली पकड़ने वाली जाल लगी विदेशी नावों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की, जिससे स्थानीय मछुआरों को मुश्किलें हो रही थीं। उसके बाद अविश्वास प्रस्ताव पर हार जाने से सत्ता छोड़ने वाले इमरान खान का विरोध प्रदर्शन ही उल्लेखनीय था। लेकिन चूंकि उन्हें सेना का समर्थन नहीं था और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी उनका विरोध कर रहे थे, इसलिए उन्हें वह महत्व नहीं मिला, जिसकी वह उम्मीद कर रहे थे। आंदोलन के दौरान उन पर हमले की कोशिश के बाद उन्होंने ऐसे विरोध प्रदर्शन न करने का फैसला लिया, और अब अपने समर्थकों को संबोधित करने के लिए वह सिर्फ सोशल मीडिया का ही इस्तेमाल करते हैं।
विरोध के दौरान इमरान खान ने तब तो अति ही कर दी थी, जब वह अदालत द्वारा विभिन्न मामलों में उन्हें बार-बार बुलाए जाने पर भी वहां नहीं पहुंचे। लेकिन शीर्ष न्यायपालिका ने उनके प्रति नर्म रुख का परिचय देते हुए न सिर्फ उनके आने का इंतजार किया, बल्कि हर मामले में उन्हें जमानत भी दी। पाकिस्तान के दूसरे किसी भी राजनेता के मामले में अदालत इतनी नर्म नहीं रही है, चाहे वह जुल्फिकार अली भुट्टो रहे हों या बेनजीर भुट्टो, नवाज शरीफ रहे हों या शहबाज शरीफ-या कोई अन्य शीर्ष नेता। इस सप्ताह तो हद ही हो गई, जब इमरान खान अपने समर्थकों के साथ अदालत पहुंचे थे, जहां उनके लोगों ने अदालत का दरवाजा तोड़ दिया और सुरक्षा गार्डों से हाथापाई की।
संसदीय लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन अमूमन संसद में दिखता है। लेकिन जब से शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री बने हैं और पीटीआई के दर्जनों सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है, तब से संसद के निचले सदन यानी नेशनल एसेंबली का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है।
चूंकि पाकिस्तान इन दिनों वित्तीय और न्यायिक संकटों से गुजर रहा है, और आर्थिक मुश्किलें झेलने के कारण लोग बुरी तरह निराश हैं, ऐसे में उनके बीच से नए चुनाव की मांग भी उठ रही है, ताकि चौतरफा संकट के समय उन्हें नया नेतृत्व मिले। आखिर संकटों के बीच पाकिस्तान सांविधानिक रास्ते से ही नया समाधान खोज सकता है। इससे पहले भी मुश्किलों के बीच पाकिस्तान को संविधान के जरिये ही हल मिला है। कानून का शासन और संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने तथा भविष्य की बेहतरी के लिए देश के सभी राजनीतिक पार्टियों का एक साथ होना बहुत आवश्यक है। लेकिन यह बात कहना जितना आसान है, उस पर अमल करना उतना ही मुश्किल।