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कनाडा से सीखे अमेरिका

Sun, 13 Sep 2015 04:23 PM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 13 Sep 2015 04:23 PM IST
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America have to learn from canada

अमेरिका के राष्ट्रपति निस्संदेह दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स हैं। यही वजह है कि वहां राष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर इतना ज्यादा आकर्षण रहता है। 2016 का चुनावी अभियान फिलहाल शुरुआती दौर में है। मगर इस बीच जिस प्रत्याशी ने सबसे ज्यादा छाप छोड़ी है, वह हैं वरमोंट के सीनेटर बर्नी सैंडर्स। लोकतांत्रिक प्राथमिक चुनाव में वह अद्भुत ढंग से आगे बढ़ रहे हैं। 74 वर्ष के सैंडर्स प्रतिस्पर्द्धा में शामिल सबसे उम्रदराज व्यक्ति हैं। वह स्व-घोषित समाजवादी हैं, वह भी ऐसे देश में जहां समाजवादियों को लंबे समय तक सोवियत संघ या चीन का पिट्ठू माना जाता रहा है। पिछले साल दनेशन मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में सैंडर्स ने देश को लेकर अपने आदर्शों पर बात की। वह अमेरिका पर कुछ अरबपति परिवारों का प्रभुत्व नहीं चाहते, जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर नियंत्रण रखते हों। उन्होंने एक ऐसे अमेरिका की उम्मीद जताई, जहां सभी लोगों के पास बेहतर शिक्षा, रोजगार और आय का अधिकार हो। अपने राजनीतिक दर्शन को संक्षेप में बताते हुए उन्होंने कहा, 'यह अफसोसनाक सच है कि कॉरपोरेट मीडिया उन बड़ी उपलब्धियों को अनदेखा कर रहा है, जो कि डेनमार्क, फिनलैंड, स्वीडन और नॉर्वे जैसे देशों में हासिल की गई हैं। लोकतांत्रिक समाजवादी या लेबर सरकारों का लंबा इतिहास रखने वाले इन देशों में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा और शिक्षा की उत्कृष्ट व्यवस्था है, जिसकी बदौलत ये देश गरीबी उन्मूलन और अमेरिका से भी ज्यादा समतावादी समाज बनने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं। मेरा विचार यह है कि उनके आर्थिक और सामाजिक मॉडल से काफी कुछ सीखा जा सकता है। और, मैं इसी पर बात करना चाहूंगा।''


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अमेरिका जिन देशों का अनुकरण कर सकता है, उनकी जो सूची सैंडर्स ने दी है, वह पूरी तरह से हैरतअंगेज तो नहीं, लेकिन दिलचस्प जरूर है। पश्चिम यूरोप के देशों ने दरअसल जिस तरह से पूंजीवाद और समाजवाद की विशेषताओं को अपनाया है, उसे लेकर काफी लंबे समय से उनकी तारीफ होती रही है। अपने नागरिकों को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं देते हुए इंटरप्रैन्योर से जुड़े नवाचारों को प्रोत्साहन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षा देकर इन देशों ने यह उपलब्धि हासिल की है।

सैंडर्स के विचारों से बेशक अमेरिका के दूसरे राजनेता सहमत न हों, मगर कुछ विद्वान पहले भी अमेरिका के यूरोप की ओर भी देखने की जरूरत की ओर इशारा कर चुके हैं। 2010 की अपनी एक किताब इल फेयर्स द लैंड  में अमेरिका में बस चुके मशहूर इतिहासकार टोनी ज्यूड अमेरिका में प्रचलित असमानताओं को आड़े हाथ लेते हैं। साथ ही, वह अमेरिका को स्वीडन और डेनमार्क के मॉडल से सीख लेने का सुझाव भी देते हैं। गौरतलब है कि हाल ही में दो खंडों में लिखे गए राज्य तंत्रों के अपने तुलनात्मक इतिहास में फ्रांसिस फुकुयामा डेनमार्क को दुनिया का सर्वाधिक आदर्श देश मानते हैं। अमेरिकियों को यह मानने में हमेशा दिक्कत रही है कि कुछ देशों की व्यवस्था अमेरिका से भी बेहतर ढंग से संचालित हो सकती है और वहां के नागरिक अमेरिकियों से ज्यादा संतुष्ट हो सकते हैं। अमेरिका का राजनीतिक और बौद्धिक अभिजात वर्ग मानता है कि उनका देश ही मानवता के लिए उम्मीद की आखिरी किरण है। ऐसे में, सैंडर्स, ज्यूड और फुकुयामा के अखिल वैश्विक और आत्म-आलोचनात्मक नजरिये का स्वागत करना ही चाहिए।

हालांकि जब बात अनुकरणीय मॉडल की हो, तो उसमें कनाडा का नाम न होने से हैरत होती है। स्वीडन और डेनमार्क की तरह कनाडा में भी सार्वजनिक स्वास्थ्य की उत्कृष्ट व्यवस्था है। यहां बेहतर सरकारी स्कूल और यूनिवर्सिटियां हैं। मगर इसकी सबसे शानदार उपलब्धि शायद समाज और संस्कृति के क्षेत्र में है। कभी केवल श्वेतों का मुल्क माने जाने वाले इस देश ने पिछले कुछ समय में बड़ी संख्या में भारतीय उपमहाद्वीप, पूर्वी एशिया और कैरिबियाई देशों से आने वाले प्रवासियों का स्वागत किया है। सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने में इसका रिकॉर्ड अमेरिका की तुलना में कहीं बेहतर है। यहां तक कि स्वीडन और डेनमार्क भी इस मामले में कनाडा से सीख ले सकते हैं, जिन्हें प्रवासियों के सम्मानजनक प्रबंधन में खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ता रहा है। पिछले दशक में मैंने कनाडा की तीन यात्राएं की। इस दौरान मैं वहां के सभी बड़े शहरों में घूमा और विभिन्न वर्गों में बंटे वहां के नागरिकों से भी मिला। कनाडा के विश्वविद्यालयों में मुझे बोलने का मौका मिला और वहां के अस्पतालों से भी मेरा सामना हुआ। वहां की इन दोनों जगहों से मैं खासा प्रभावित हुआ। यहां लिंग समानता को लेकर काफी प्रगति देखने को मिली। इसके अलावा देश की सरकारी प्रसारण सेवाओं की गुणवत्ता (और स्वतंत्रता) पर भी मेरा ध्यान गया। मगर मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित उस सरलता ने किया, जिसके साथ एशियाई, अफ्रीकी, यूरोपीय और अमेरिकी मूल के कनाडावासी एक-दूसरे के साथ संवाद करते हैं। न्यूयॉर्क के रहने वाले अपने शहर के बहुसांस्कृतिक लक्षणों का गुणगान करते रहते हैं। टोरंटो भी उतना ही बहुसांस्कृतिक है, मगर यह इतने सहज ढंग से है कि यहां के नागरिकों को इसका ढिंढोरा नहीं पीटना पड़ता। इतना ही नहीं, कनाडा अपने मूल निवासियों की भी देख-रेख भी अमेरिका से बेहतर ढंग से करता है।

बर्नी सैंडर्स खुद कनाडा की स्वास्थ्य व्यवस्था की तारीफ कर चुके हैं। मगर जब बात उन देशों की आई, जिनसे अमेरिका सीख ले सकता है, तो उसमें उन्होंने डेनमार्क, फिनलैंड, स्वीडन और नॉर्वे का तो लिया, मगर कनाडा को छोड़ दिया। बावजूद इसके कि उनका गृहराज्य वरमोंट कनाडा के साथ 90 मील लंबी सीमा साझा करता है। कनाडा का नाम न लिया जाना महज संयोग है, या फिर सोचा-समझा कदम, यह तो कहा नहीं जा सकता। मगर इसको लेकर सैंडर्स की मजबूरी समझी जा सकती है। अपने उत्तरी पड़ोसी देश से खुद का ऊपर जताने की अमेरिका की प्रवृत्ति से वह अच्छे-से वाकिफ हैं। यह संयुक्त राज्य का इक्यावनवां राज्य है। केवल युद्ध के समय में ही इसे स्वतंत्र अस्तित्व हासिल होता है, जब अमेरिकी सरकार इस आशय के प्रारूप की घोषणा करती है कि जो युवा युद्ध में हिस्सा न लेना चाहें, वे कनाडा में शरण ले सकते हैं।

यह देखते हुए अगर बर्नी यह कहने की हिम्मत दिखाते हैं कि यूरोप के कुछ देश अमेरिका से बेहतर ढंग से संचालित हैं, तो उनकी तारीफ होनी चाहिए। लेकिन, अगर वह इस सूची में कनाडा को जोड़ते तो उनकी अच्छी खबर ली जाती, यह तय था।

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