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निजता के खिलाफ खड़ा अमेरिका

Tue, 25 Jun 2013 08:59 PM IST
सुधांशु रंजन
सुधांशु रंजन Updated Tue, 25 Jun 2013 08:59 PM IST
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america against individualism

अमेरिकी नागरिक एडवर्ड स्नोडेन ने निगरानी कार्यक्रम प्रिज्म के बारे में सनसनीखेज खुलासा कर पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया है। स्नोडेन पहले अमेरिका की खुफिया संस्था सीआईए के तकनीकी सहायक थे, जो बाद में रक्षा ठेकेदार बूज ऐलेन हैमिल्टन की कंपनी में काम करने लगे। बूज ऐलेन एवं डेल जैसे बाहरी ठेकेदारों के कर्मचारी के रूप में वह अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) के लिए गत चार वर्षों से काम कर रहे थे।

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स्नोडेन द्वारा किए गए खुलासे के अनुसार, एनएसए करोड़ों अमेरिकियों के फोन रिकॉर्ड जमा करती है, जबकि गैर-अमेरिकियों के बारे में वह अमेरिकी इंटरनेट कंपनियों तथा कंप्यूटर नेटवर्क आदि के जरिये सूचनाएं इकट्ठा करती है। फिलहाल अमेरिकी खुफिया विभाग की तरफ से भगोड़ा घोषित यह शख्स हांगकांग से निकलकर रूस की तरफ कूच कर चुका है, जहां से उसके इक्वाडोर जाने का अनुमान है।
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यह खुलासा व्यक्ति की निजता में घुसपैठ का एक भयावह मामला है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस कार्यक्रम का औचित्य इस रूप में ठहराया कि इंटरनेट एवं ई-मेल पर की जा रही निगरानी अमेरिकी नागरिकों तथा अमेरिका मे रह रहे लोगों के ऊपर लागू नहीं है। ऐसा कहकर उन्होंने बराबरी के सिद्धांत को खारिज कर दिया, जबकि वहां समानता पर अत्यधिक जोर रहा है। यह लोगों के निजता के अधिकार पर कुठाराघात है, जिसका दंश गैर-अमेरिकी नागरिक ज्यादा भुगत रहे हैं, जबकि अमेरिकी कम।
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यह विडंबना है कि जो देश निजता के अधिकार का जनक होने का दावा करता है, उसी देश में आज इस अधिकार का उल्लंघन भी देखने को मिल रहा है। 19वीं सदी के अंत में चार्ल्स वारेन तथा लूई ब्रैंडाइस ने हॉर्वर्ड लॉ रिव्यू में द राइट टू प्राइवेसी नामक एक सारगर्भित आलेख लिखा था। ऐसा माना जाता है कि निजता के अधिकार को पहचान सर्वप्रथम उसी से मिली। रॉस्को पाउंड ने उस आलेख के बारे में टिप्पणी की कि उसने कानून में एक नया अध्याय जोड़ दिया।

बाद में ग्रिजवर्ल्ड मामले (1965) में जस्टिस डगलस ने अपने निर्णय में एक थीसिस ही लिख दी कि यद्यपि 'बिल ऑफ राइट्स' में इसका जिक्र नहीं है, इसके तहत जो गारंटी दी गई है, उसमें अमूर्त रूप से यह विद्यमान है। इस प्रकार देखें, तो ताजा खुलासे से यही साबित होता है कि अमेरिका अपनी विरासत एवं अपने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की ही अवमानना कर रहा है। ऐसा अधिनायकवादी देशों में होता है, जहां निजता की अवधारणा को अनैतिक, समाज विरोधी एवं व्यक्तिवाद का अवांछनीय हिस्सा माना जाता है।
 
बहरहाल, तीन अंतरराष्ट्रीय कानूनों में निजता के अधिकार को पहचान मिली है। यूनिवर्सल डिक्लैरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स (1948) के अनुच्छेद 12 के अनुसार, किसी की निजता, परिवार, घर या पत्राचार के साथ एकतरफा हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। इंटरनेशनल कॉवनेंट ऑन सिविल ऐंड पॉलिटिकल राइट्स का अनुच्छेद दो तथा यूरोपियन कंवेंशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऐंड फंडामेंटल फ्रीडम्स, 1950 का अनुच्छेद आठ भी ऐसी गारंटी देती हैं।

इन सबके बावजूद आज यदि अमेरिका इस तरह की निगरानी कर रहा है, तो साफ है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के लिए उसकी नजर में कोई सम्मान नहीं है।

यह निर्विवाद है कि आज इस गति से सूचना और प्रौद्योगिकी का विकास हो रहा है कि निजता में घुसपैठ अत्यंत सरल हो गया है। इसी कारण साइबर अपराध मे लगातार वृद्धि हो रही है। अमेरिका सारी मर्यादा एवं कानूनों का उल्लंघन कर पूरी दुनिया के लोगों की निजी जिंदगी में प्रवेश कर चुका है।


आतंकवाद से बचाव के नाम पर वह अपने कृत्य को उचित भी ठहरा सकता है, जैसा कि ओबामा ने कहा कि ऐसा अमेरिकी नागरिकों के विरुद्ध नहीं हो रहा है। लेकिन यह समझना होगा कि जब लोकतंत्र का उदय हुआ, तो प्रारंभ में यह धारणा थी कि सरकार का कर्तव्य नागरिकों की जिंदगी, आजादी एवं संपत्ति की रक्षा करना है। बाद में लोक कल्याणकारी राज्य का सिद्धांत आया, किंतु यह कभी नहीं सोचा गया कि सरकार ही उस आजादी को कुचल देगी। प्रिज्म संबंधी खुलासे से तो स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका पूरी दुनिया के लोगों की व्यक्तिगत आजादी और निजता के अधिकार को तार-तार कर रहा है।

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