{"_id":"03c421c49039b0c1893172225e11fa94","slug":"amar-ujala-satire","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब थप्पड़ की हवा चली","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
अब थप्पड़ की हवा चली
सहीराम
Updated Thu, 13 Feb 2014 09:14 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इधर एक दिन में दो थप्पड़ जड़े गए जी। अपने देश में इतनी तेजी से काम करने का रिवाज नहीं है। यह तो ऐसा लगता है, जैसे एक दिन में दो प्रोजेक्ट पूरे हुए हों। खैर जी, जैसे जूते चलने के लिए होते हैं, वैसे थप्पड़ जड़ने के लिए होते थे। हालांकि वे नगीने नहीं होते। इन्हें जड़े जाने को जड़ाऊ काम नहीं माना जाता। रहपटा, झापड़, चांटा, तमाचा आदि इसके अन्य रूप हैं। घूंसा अलग चीज है। वह जड़ा नहीं जाता। अकेला वह चलता भी कम ही है। लात-घूंसे जब साथ मिलकर चलते हैं, तो ज्यादा असर छोड़ते हैं।
विज्ञापन
थप्पड़ एक जमाने में जन्मजात आशिकों के मुंह पर ही जड़ा जाता था। पर इधर जब से इश्क कमीना हुआ है, वे चाकुओं, छुरियों और पिस्तौलों से लैस हो लिए हैं। और कुछ नहीं, तो एसिड तो उनके पास होता ही है। इसलिए माशूकाएं इन दिनों उन्हें यह तोहफा दे पाने में खुद को असमर्थ पाती हैं। पर इधर थप्पड़ ने विकल्प ढूंढ लिया है। वह जन्मजात आशिकों के मुंह पर जड़े जाने के बजाय अब नेताओं के मुंह पर भी जड़ा जाने लगा है। अभी तक तो नेताओं के मुंह पर अक्सर मुस्कान ही जड़ी रहती थी, जो कभी-कभी बड़ी कुटिल भी हो जाती थी। पर अब उन्हीं नेताओं के मुंह पर थप्पड़ जड़े जाने लगे हैं। और इधर तो एक दिन में ही दो थप्पड़ जड़े गए। एक दिल्ली में, तो दूसरा हरियाणा में। बस डर है कि कहीं थप्पड़ की हवा न बह निकले।
विज्ञापन
हालांकि थप्पड़ नेताओं के मुंह पर कोई पहली बार नहीं जड़ा गया है। कुछ दिन पहले ही उसे शरद पवार जी के मुंह पर जड़ दिया गया था, और जिस पर अन्ना हजारे ने कहा था-बस एक ही थप्पड़! उस थप्पड़ ने जितनी अन्ना जी की गरिमा कम की थी, उतनी पवार की नहीं की थी। पर वह सिलसिला आगे नहीं बढ़ा था। उम्मीद करनी चाहिए कि यह सिलसिला भी आगे नहीं बढ़ेगा। फिर भी इसके चलने का डर तो अपनी जगह है ही। क्योंकि जिस जमाने में नेताओं पर जूते चल रहे थे, तो बस जूते ही चल रहे थे।
विज्ञापन
नेताओं पर जूते चलने की जो शुरुआत बुश से हुई थी, उसने दूसरे देशों की तरह अपने यहां भी काफी रंग दिखाया था-कभी चिदंबरम जी पर चलकर और कभी जर्नादन द्विवेदी जी पर चलकर। लेकिन उन जूतों का चलना तो शुभ ही रहा। जब वे जूते चले थे, तो कांग्रेस चुनाव जीत गई थी। इसलिए हरियाणा में कांग्रेस को और दिल्ली में आप को इन थप्पड़ों को शुभ मानकर ही चलना चाहिए। थप्पड़ शुभ हो!