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'एक देश एक चुनाव' क्यों जरूरी है, बता रहे हैं आलोक मेहता

Sun, 29 Nov 2020 02:49 AM IST
आलोक मेहता आलोक मेहता
आलोक मेहता Published by: आलोक मेहता Updated Sun, 29 Nov 2020 02:49 AM IST
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Alok Mehta is telling why one nation one election is important
ईवीएम - फोटो : PTI

भारत का लोकतंत्र हमारे घर से शुरू होता रहा है। राम और लक्ष्मण के युद्ध के निर्णय पर भिन्न राय होती थी, श्रीकृष्ण और बलराम के भी विचारों की भिन्नता और कौरव पांडव के प्रति कई बार अलग रुख देखने को मिले। आधुनिक युग में महात्मा गांधी के अनुयायियों में विभिन्न विचारों के लोग शामिल होते थे। मेरे अपने परिवार में एक सदस्य आर्य समाजी, तो उनकी जीवन साथी पक्की मूर्ति पूजक। एक कक्ष में यज्ञ के साथ मंत्रोच्चार और दूसरे कक्ष में सुंदर मूर्तियों के सामने पुरे मनोयोग से पूजा-भजन कीर्तन। इन दिनों सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में यह देखकर तकलीफ होती है, जब सहमति या असहमति को घोर समर्थक अथवा विरोधी करार दिया जाता है। कम से कम कुछ राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सौहार्दपूर्ण विचार विमर्श से दूरगामी हितों और भविष्य निर्माण के लिए संयुक्त रूप से निर्णय क्यों नहीं लिए जा रहे हैं। 'एक देश, एक चुनाव' का मुद्दा भी इसी तरह का समझा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यदि इसे उठाया है, तो इसे केवल उनकी पार्टी के एकछत्र राज और अनंत काल तक सत्ता बनी रहने वाला मुद्दा क्यों समझा जाना चाहिए? केवल तानाशाही अथवा कम्युनिस्ट व्यवस्था में यह संभव है।


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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई नया मोदी मंत्र नहीं है। संविधान निर्माताओं द्वारा स्थापित लोकतंत्र के आधार पर 1952 से 1967 तक चली आदर्श व्यवस्था को पुनः अपनाना मात्र है। ऐसा भी नहीं कि देश में एक साथ चुनाव होने पर करोड़ों का खर्च बढ़ जाएगा अथवा क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर की पार्टी अथवा निर्दलीय उम्मीदवार नहीं जीत सकेंगे। सत्तर वर्षों का इतिहास गवाह है कि अरबपति उद्योगपति, राजा महाराजा, प्रधानमंत्री तक चुनाव हारे हैं और पंचायत स्तर तक जनता के बीच चुनकर आए बिना मंत्री और प्रधानमंत्री भी रहे हैं। हां, मंडी के बिचौलियों की तरह चुनावी धंधों से हर साल करोड़ों रुपया कमाने वाले एक बड़े वर्ग को आर्थिक नुकसान होगा। यही नहीं निरंतर चुनाव होते रहने पर अपनी आवाज और समर्थन के बल पर पार्टियों में महत्व पाने वाले नेताओं को भी घाटा उठाना पड़ेगा और किसी सदन में रहकर ही अपनी धाक जमानी पड़ेगी।

जहां तक खर्च की बात है, राजनीतिक दलों को ही नहीं लाभ होगा, बल्कि देश के लाखों मतदाताओं- करदाताओं का करोड़ों रुपया बच जाएगा। भारत के प्रतिष्ठित शोध संस्थान सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब साठ हजार करोड़ रूपये खर्च हुए। जरा सोचिये लोकसभा के पहले तीन चुनावों यानी 1952, 1957 और 1962 में केवल दस करोड़ रूपये खर्च होते थे। उदार अर्थ व्यवस्था आने के बाद पार्टियों और उम्मीदवारों के पंख आकाश को छूने वाले सोने-चांदी, हीरे-मोती से जड़े दिखने लगे।

अदालतों और चुनाव आयोग ने उनके वैधानिक चुनावी खर्च की सीमा बढ़ाकर सत्तर लाख रुपये और विधानसभा क्षेत्र के लिए अट्ठाइस लाख रुपये कर दी, लेकिन व्यावहारिक जानकारी रखने वाले हर पक्ष को मालूम है कि पार्टी और निजी हैसियत वाले नेता लोकसभा चुनाव में पांच से दस करोड़ रुपये खर्च करने में नहीं हिचकते। कागजी खानापूर्ति के लिए उनके चार्टर्ड अकाउंटेंट हिसाब बनाकर निर्वाचन आयोग में जमा कर देते हैं। महाराष्ट्र के एक बहुत बड़े नेता ने तो सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया था कि लोकसभा चुनाव में आठ करोड़ खर्च हो जाते हैं। पिछले चुनाव में तमिलनाडु के कुछ उम्मीदवारों ने लगभग तीस से पचास करोड़ रूपये तक बहा दिए। आंध्र में कुछ उम्मीदवारों ने हर मतदाता को दो-दो हजार रुपये दे दिए।

वहीं चुनावी व्यवस्था करने वाले आयोग को सरकारी खजाने से करीब बारह हजार करोड़ खर्च करने पड़ रहे हैं। इस तरह विशेषज्ञों का आकलन है कि लोकसभा के एक निर्वाचन क्षेत्र पर औसतन एक सौ करोड़ रूपये खर्च हो जाते हैं। विधानसभा चुनावों में खर्च केवल अधिक सीटों की संख्या के अनुसार बंट जाता है। यह ठीक है कि लोकसभा के चुनाव सामान्यतः पांच साल में होते हैं, लेकिन राज्य विधानसभाओं में अस्थिरता की वजह से पिछले दशकों में उनके चुनावी वर्ष अलग अलग होने लगे। नतीजा यह है कि हर तीसरे चौथे महीने किसी न किसी विधानसभा, स्थानीय नगर निगमों - पालिकाओं या पंचायतों के चुनाव होते हैं। इस तरह देश और मीडिया में ऐसा लगता है, मानो पूरे साल चुनावी माहौल बना हुआ है। इसके साथ ही सरकारों पर आचार संहिता लगने से विकास खर्चों पर अंकुश और विश्राम के दरवाजे लग जाते हैं। राजनीतिक लाभ किसी को हो सर्वाधिक नुकसान सामान्य नागरिकों का होता है।

 

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