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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   almost impossible to take off debt of mother

मां का ऋण उतार पाना नामुमकिन

Tue, 19 Mar 2013 01:55 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Tue, 19 Mar 2013 01:55 PM IST
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हमारे नीतिशास्त्रों में कई ऐसी कहानियां हैं, जो मां के महत्व को स्थापित करती हैं। ऐसे प्रसंग बताते हैं कि मां के ऋण से किसी का भी उऋण होना नामुमिकन है। स्वामी विवेकानंद ने भी निधन से पूर्व अपनी अंग्रेज शिष्या भगिनी निवेदिता को आदेश दिया था कि वह ब्रिटेन में विधवा जीवन बिताने वाली अपनी मां के स्वास्थ्य की जानकारी अवश्य लेती रहें।

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जनवरी, 1909 में निवेदिता को पता चला कि उनकी मां मेरी ईसावेल कैंसर रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु से जूझ रही हैं। वह व्यथित हो उठीं और तुरंत इंग्लैंड जा पहुंचीं। मेरी ईसावेल ने शैय्या के पास अपनी पुत्री मारग्रेट एलिजाबेथ नोबुल को खड़ा देखा, तो वह भावविह्वल होकर उठ बैठीं। उन्होंने कहा, बेटी, अब तो तुम पूरे संसार के आध्यात्मिक सिरमौर भारत की सेवा के लिए समर्पित हो चुकी हो। मेरे लिए वहां से क्या उपहार लाई हो?
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भगिनी निवेदिता ने थैले में से श्रीमद्भगवद्गीता तथा रुद्राक्ष की माला निकाली और मां के हाथों में थमाकर बोली, मां, गीता संसार भर को श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देने वाला महान ग्रंथ है। उन्होंने चांदी की गंगाजली दिखाते हुए कहा, इसमें दिव्य-पवित्र गंगाजल है, जिसकी एक-एक बूंद को भारतीय तरसते हैं।
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पुत्री अपनी मां की सेवा में जुट गई। 26 जनवरी को मेरी ईसावेल ने अपनी पुत्री की गोद में सिर रखकर अंतिम सांस ली।

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