{"_id":"432f2c5d456651162373315e826297fa","slug":"alleviate-poverty","type":"story","status":"publish","title_hn":"दल से नहीं, गरीबी से मुक्त कीजिए","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
दल से नहीं, गरीबी से मुक्त कीजिए
विनोद अग्निहोत्री
Updated Tue, 20 Aug 2013 08:01 PM IST
विज्ञापन
भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान की कमान संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा दिया है। कुछ महीने पहले त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव प्रचार में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कम्युनिस्टों को देश से बाहर फेंकने का आह्वान किया था। हालांकि अभी तक न तो भाजपा ने मोदी को और न ही कांग्रेस ने राहुल को लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। मगर जिस तरह भाजपा ने मोदी को कमान सौंपकर उन्हें अपना चुनावी चेहरा बनाया है, उससे अब प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी उम्मीदवारी की घोषणा औपचारिकता ही रह गई है। कांग्रेस में राहुल गांधी की जो हैसियत है, उसमें तो उनके लिए ऐसी औपचारिक घोषणा की भी जरूरत नहीं है।
विज्ञापन
भारतीय समाज की ही तरह भारतीय लोकतंत्र बहुलवादी है। यहां हर तरह के विचार और दल को फलने-फूलने की जो आजादी संविधान ने दी है, उसके बीज स्वतंत्रता आंदोलन में ही पड़ गए थे। यही वजह है कि आजादी के आंदोलन में एक तरफ महात्मा गांधी की अगुआई में कांग्रेस का स्वतंत्रता आंदोलन का अहिंसक महासागर था, तो दूसरी तरफ सशस्त्र क्रांति के जरिये क्रांतिकारियों की धाराएं थीं।
विज्ञापन
दोनों ही एक दूसरे से वैचारिक धरातल पर असहमत थे, लेकिन किसी ने एक-दूसरे से मुक्त भारत की कल्पना नहीं की। यहां तक कि भगत सिंह ने महात्मा गांधी को जो पत्र बम का दर्शन (फिलॉस्फी ऑफ दि बम) लिखा था, उसके अंत में उन्होंने अपने लिए लिखा था- आपका अनेक में एक। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा था।
विज्ञापन
यही नहीं, आजादी के आंदोलन के दौरान ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन भी सक्रिय थे। गांधी जी की हत्या के बाद भले ही आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन बाद में न सिर्फ उससे प्रतिबंध हटा, बल्कि उसके अनुषांगिक संगठन (राजनीतिक शाखा) भारतीय जनसंघ को वह सारी आजादी हासिल रही, जो किसी दूसरी पार्टियों को थी।
समाजवादी आंदोलन के प्रणेता डॉ राममनोहर लोहिया ने कांग्रेस के एकछत्र शासन के खिलाफ गैर कांग्रेस दलों को एकजुट करने के लिए गैर कांग्रेसवाद का नारा तो दिया, लेकिन उन्होंने भी कांग्रेस मुक्त भारत की बात नहीं कही। आपातकाल में इंदिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण समेत सभी दलों के नेताओं को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था, लेकिन उन्होंने भी विपक्ष मुक्त भारत का नारा नहीं दिया। वर्ष 1984 में महज दो सीटों पर सिमट गई भाजपा अगर 1996, 1998 और 1999 में तीन बार अपने नेता अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला पाई, तो इसीलिए कि कांग्रेस समेत किसी भी दल ने भाजपा मुक्त भारत की बात नहीं की।
ऐसा कोई भी नारा भारतीय लोकतंत्र और जनमानस को स्वीकार नहीं होगा, जिसमें किसी दल विशेष और विचार विशेष से देश को पूरी तरह मुक्त करने की बात कही जाए। हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरवादी संगठन, शिवसेना और अकाली दल जैसे क्षेत्रीय और धार्मिक अस्मिता आधारित दल, कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे वर्ग संघर्ष की विचारधारा पर आधारित दल, बसपा, सपा, राजद, लोजपा, जद (यू) जैसे सामाजिक न्याय आधारित दल, तेदेपा, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, बीजद, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, झामुमो और पूर्वोत्तर के क्षेत्रीय दल इसीलिए फल-फूल रहे हैं कि राजनीति की मुख्यधारा ने कभी भी, किसी भी दल से मुक्त भारत का नारा देने की बात नहीं की।
अगर नरेंद्र मोदी कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देते हैं, या राहुल गांधी कम्युनिस्टों को देश से बाहर फेंकने की बात करते हैं, तो उसे लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप कतई नहीं माना जा सकता है। बेहतर हो कि देश का नेतृत्व संभालने का सपना संजोने वाले नेता गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आतंकवाद, सांप्रदायिकता, जातिवाद, अलगाववाद, शोषण और नारी उत्पीड़न से मुक्त भारत का नारा दें। जरूरत देश को किसी दल या विचार विशेष से मुक्त करने की नहीं, बल्कि नकारात्मक और विघटनकारी राजनीति से मुक्त करके समतामूलक विकासवादी और सकारात्मक राजनीति को प्रोत्साहित करने की है।