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ये पब्लिक है सब (नहीं) जानती है!

Thu, 26 Dec 2013 07:52 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 26 Dec 2013 07:52 PM IST
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All of this knows public, is not!

राजनीति की यही सबसे बड़ी दिक्कत है कि पब्लिक का काम भी करो और फिर उसे बताओ भी। कभी देखा है आपने कि सरकार ने कोई भला किया और उसका एहसान मानते हुए जनता ने आभार रैली जैसा कुछ निकाला हो! मांग के लिए तो रैली, मोर्चा, प्रदर्शन, धरना सब कर लेंगे, मगर मांग पूरी होने पर रसीद भी नहीं देते। तब सरकार इसी चक्कर में रहती है कि लोगों को पता भी है या नहीं कि उनका भला हो गया है।

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सरकार इसी भ्रम में रहती है कि जनता को पता है और जनता इसी गुस्से में कि अभी तक उसका ‘कल्याण’ नहीं हुआ है। आखिर सरकार को भी तो पता लगना चाहिए न कि जनता को उसके काम के बारे में पता है। लेकिन सरकारों का दुख तो यही है कि उन्हें अपने किए का कभी क्रेडिट नहीं मिलता।
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जनता को तो रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा कुछ समझ में नहीं आता। मगर सरकार को तो जनता का हर तरह से भला करना होता है, जिसमें मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने जैसे काम भी शामिल हैं। ये बातें आप पब्लिक को नहीं समझा सकते। इसीलिए आपने देखा होगा कि सरकार जैसे ही एक साल पूरा कर लेती है, जनता को बताने लगती है कि उसने उसका किस तरह से भला किया है। पांच करोड़ का काम बताने के लिए सरकार को बीस करोड़ रुपये भी खर्च करना पड़े, तो वह पीछे नहीं हटती। जनता को पता ही न चले, तो ऐसे पांच करोड़ तो गए न पानी में।
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देश में साक्षरता का प्रतिशत कम है, इसलिए यह तो हो नहीं सकता कि चौराहे-चौराहे डोंडी पिटवाई जाए। तब यही तरीका बाकी रह जाता है कि अपने काम का बखान करें। इससे होता यह है कि जो पढ़ा-लिखा तबका है, वह जान लेता है कि सरकार ने साल भर में कितना उद्धार किया है। पढ़े-लिखों को बता दो, तो समाज में बात वैसे ही फैल जाती है, क्योंकि उनके पास अफवाहें फैलाने के अलावा कोई काम तो होता नहीं है। दस निरक्षर को समझाने से बेहतर है कि एक साक्षर को बताया जाए। अब यदि इस पर विपक्षी दलों के पेट दुख रहे हैं, तो कोई क्या करे। काम किया है, तो बताने में क्या हर्ज है।


सरकार तो प्रचार पर एक पैसा भी खर्च न करे और उस पैसे से दस-बीस विदेश यात्राएं कर ले, मगर मजबूरी है कि जनता को यह समझ में ही नहीं आता है कि सरकार उसके लिए दिन-रात खट रही है। जिस दिन जनता यह समझ जाएगी, उसी दिन यह फिजूलखर्ची एकदम बंद कर दी जाएगी, यह वायदा रहा।

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