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कानून की नजर में सब नौकरशाह बराबर

Wed, 14 May 2014 08:03 PM IST
सुधांशु रंजन
सुधांशु रंजन Updated Wed, 14 May 2014 08:03 PM IST
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All beaurocratcs equal in the eyes of the law

एक महत्वपूर्ण निर्णय में उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ ने दिल्ली पुलिस विशेष स्थापन अधिनियम की धारा 6-ए को अवैध करार दिया है। इसमें प्रावधान है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 के तहत केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव एवं उससे ऊपर के अधिकारी के खिलाफ जांच करने के पहले सीबीआई को केंद्र सरकार की पूर्वानुमति लेनी पड़ेगी। पूर्व में ‘एकल निर्देश’ के रूप में माने जाने वाले एक कार्यकारी आदेश का यह नया अवतार है, जिसे ठोस कानूनी आधार दे दिया गया है। न्यायालय ने धारा 6-ए को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना है, जो हर व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता तथा समान संरक्षण का अधिकार देता है।

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अनुच्छेद 14 में दो वाक्यांश हैं- 'कानून के समक्ष समानता' एवं 'कानून का समान संरक्षण'। पहली अभिव्यक्ति हर व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की उद्घोषणा है। इसमें किसी व्यक्ति के पक्ष में विशेषाधिकार निषेध है। ए वी डायसी ने समानता की अवधारणा के बारे में लिखा है कि इंग्लैण्ड में इसे कैसे व्यवहार में लाया गया- 'हमारे लिए हर अधिकारी, प्रधानमंत्री से लेकर एक सिपाही या कर संग्रह करने वाला, किसी अवैध कार्य के लिए उतना ही जिम्मेदार है, जितना कोई दूसरा नागरिक।' दूसरी अभिव्यक्ति, 'कानूनों का समान संरक्षण', पहली अभिव्यक्ति का ही उपसिद्धांत है, जो अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन की प्रथम धारा से लिया गया है।
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सवाल उठता है कि कैसे इतना भेदभाव करने वाला प्रावधान कानून की पुस्तक में प्रवेश कर गया। 'एकल निर्देश' 1980 के दशक में लाया गया था। इसका औचित्य यह बताया गया कि संयुक्त सचिव या उनसे ऊपर स्तर के अधिकारी नीतिगत निर्णय लेते हैं और विवेकाधिकार का प्रयोग करते हैं। इसलिए उन्हें परेशान करने वाले मुकदमों से बचाने की आवश्यकता है। सरकारी कर्मचारियों को पहले से ही अपराध दंड विधान की धारा 197 तथा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 19 के तहत अभियोजन से सुरक्षा है, जो सरकार की पूर्वानुमति के बिना नहीं शुरू की जा सकती है। इस तरह वरिष्ठ अधिकारियों को जांच एवं अभियोजन, दोहरी सुरक्षा थी।
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उच्चतम न्यायालय ने विनीत नारायण मामले में ‘एकल निर्देश’ को इस कारण अवैध करार दिया कि सीबीआई को किसी अपराध के विरुद्ध जांच करने का अधिकार डीएसपीई ऐक्ट की धारा तीन के अंतर्गत प्राप्त है। अदालत ने कहा, कि कानून अपराधियों को अलग-अलग वर्गों में नहीं बांटता है, ताकि उनकी हैसियत के अनुरूप उनके विरुद्ध जांच एवं अभियोजन हो। अदालत ने साफ किया कि एक अपराध करने वालों के साथ कानून के अनुसार समान व्यवहार किया जाएगा। अदालत ने आगे कहा कि जहां घूसखोरी जैसे मामलों में भ्रष्टाचार का आरोप प्रत्यक्ष साक्ष्यों पर आधारित हो, वहं उन्हें अलग वर्ग में रखने का तार्किक आधार नहीं है, क्योंकि निर्णय लेने की प्रक्रिया अनुमान पर निर्भर नहीं करती है। आय से अधिक संपत्ति के मामले में भी ऐसा ही है।


उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय सतर्कता आयोग को वैधानिक आधार देने का निर्देश दिया, जो सीबीआई पर निगरानी करेगा। इस निर्देश का अनुपालन करने के बजाय केंद्र सरकार ने मामले को विधि आयोग को भेज दिया, गोया वह सर्वोच्च अदालत के ऊपर अपील का एक मंच हो। आयोग ने ‘एकल निर्देश’ खत्म करने के साथ ही कुछ अन्य ऐसी अनुशंसाएं की, जो बाबुओं को पसंद नहीं थीं। इसलिए इस रिपोर्ट को मंत्रिमंडल की जानकारी में लाए बिना दबा दिया गया। यह सही है कि ईमानदार अधिकारियों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। पर सरकार एक भी ऐसा उदाहरण पेश नहीं कर पाई कि जिस दरम्यान एकल निर्देश नहीं था और किसी को फालतू मुकदमे में फंसाया गया।

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