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सभी प्राणियों में सम दृष्टि रखो
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 06 Feb 2013 01:42 AM IST
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अच्छा आचरण मानव जीवन को कितना बदल देता है, इससे संबंधित कई प्रसंग हमारे धर्मग्रंथों में हैं। उन प्रसंगों में बताया जाता है कि सद्जीवन बिताने से देश-समाज में प्रतिष्ठा तो मिलती ही है, परलोक भी सुधर जाता है। कुछ ऐसी ही कहानी जाने-माने इंजीनियर अमृतलाल ठक्कर की है। वह मुंबई नगर निगम की सेवा में कार्यरत थे।
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अधिकारी होने के नाते उन्हें कुछ दिन मेहतरों की बस्ती में हो रहे निर्माण-कार्य की देखभाल का मौका मिला। उन्होंने उन लोगों की दयनीय स्थिति को जब देखा, तो उनका मन उन्हें धिक्कारने लगा कि वह सुविधापूर्ण अच्छे मकान में रहते हैं, अच्छे कपड़े पहनते हैं, अच्छा भोजन करते हैं, जबकि ये गरीब रात-दिन मेहनत करने के बावजूद दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते।
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सवेरे वह गीता का पाठ करने बैठे, तो भगवान श्रीकृष्ण की 'सभी प्राणियों में सम दृष्टि रखो' की वाणी ने उनका हृदय झकझोर डाला। अगले ही दिन उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और गरीबों तथा वंचितों की सेवा का संकल्प लेकर रचनात्मक सेवा-कार्यों में जुट गए।
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उनकी सेवा-भावना पर मुग्ध होकर आचार्य विनोबा भावे ने उनसे कहा, अमृत भाई, तुम बचपन से गीता पाठ करते थे। बाल्यकाल से ही श्रीकृष्ण की पूजा करते थे। किंतु अब तो तुमने अपना जीवन गीतामय बना लिया है। वास्तव में जो सेवा के लिए हर क्षण तत्पर रहता है, वही गीता का सच्चा उपासक है।