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सिद्धू की बैटिंग से टर्निंग ट्रैक बनी पंजाब की चुनावी पिच

Mon, 25 Jul 2016 06:03 PM IST
अलका सक्सेना, संपादक, amarujala.com
अलका सक्सेना, संपादक, amarujala.com Updated Mon, 25 Jul 2016 06:03 PM IST
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Alka Saxena blog: Navjot Singh Sidhu revolt has complicated  Punjab election scene
- फोटो : gettyimages
नवजोत सिंह सिद्धू ने क्रिकेट की पिच पर एक से बढ़कर एक छक्के लगाए। लेकिन राजनीति में आने के बाद लंबे समय तक वह सिंगल और डबल लेकर काम चलाते रहे। अगर मैं कहूं कि सिद्धू ने भाजपा छोड़कर अपनी राजनीतिक पारी का पहला छक्का लगाया है, तो गलत नहीं होगा। चर्चा गरम है कि सिद्धू आम आदमी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। लेकिन यहां सवाल सिर्फ पार्टी छोड़ने भर का नहीं है बल्कि दूसरी पार्टी में जाकर वह क्या जिम्मेदारी संभालते हैं, यह ज्यादा अहम है? 
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'आप' के सूत्रों के हवाले से मीडिया में खबर चल रही है कि सिद्धू को सीएम कैंडिडेट के तौर पर पेश नहीं किया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषक मानकर चल रहे हैं कि 'आप' में सिद्धू को चुनाव प्रचार की कमान सौंपी जा सकती है। सिद्धू 'आप' में कब शामिल होंगे, उन्हें क्या जिम्मेदारी दी जाएगी, यह तो आने वाले वक्त में पता चल ही जाएगा। लेकिन इसमें शक नहीं कि इस समय 'आप' में सिद्धू को लेकर गहन मंथन चल रहा है। 2017 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में 'आप' फ्रंटरनर के तौर पर उभरी है। अकाली दल के खिलाफ लोगों में रोष है और सिद्धू के बार-बार कहने के बाद भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को यह बात समझ नहीं आई। 
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सिद्धू के पार्टी छोड़ने के पीछे कोई एक कारण नहीं है। उनकी कई सालों से पार्टी में अनदेखी होती रही। दरअसल, सूबे की राजनीति में अकाली दल के नेताओं के साथ सिद्धू का छत्तीस का आंकड़ा लंबे समय से चल रहा है। 2014 के आम चुनाव में अकाली दल ने अमृतसर सीट से सिद्धू का पत्ता कटवाकर यह संदेश दिया कि गठबंधन के सामने सिद्धू की कोई अहमियत नहीं है। सिद्धू को नीचा दिखाने के लिए अकाली दल ने दबाव डालकर अरुण जेटली को उनकी सीट से टिकट देने की पैरवी की। इसका परिणाम यह निकला कि मोदी लहर के बाद भी जेटली हार गए। वैसे तो लोकसभा चुनाव के परिपेक्ष्य में भी यह बड़ी घटना थी। लेकिन इसका व्यापक असर 2017 पंजाब विधानसभा चुनाव में देखने को मिलेगा। शायद भाजपा के रणनीतिकार सिद्धू को सिर्फ टीवी कमेंटेटर समझ बैठे। वे भूल गए कि प्रचंड मोदी लहर में जिस सीट से जेटली जैसे मंझे हुए नेता को हार का सामना करना पड़ा, उस सीट पर सिद्धू ने लगातार तीन बार भाजपा को जीत दिलाई। लेकिन पंजाब में अमित शाह ने जो किया वह उनकी छवि के अनुरूप नहीं था। पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद से वह हर राज्य में भाजपा को अपने दम पर खड़ा करने की कोशिश करते दिखे, सिवाय पंजाब के। शायद वह अकालियों के खिलाफ लोगों में व्याप्त रोष पढ़ने में भूल कर बैठे या यूं कहें कि कर रहे हैं। बहरहाल, अब तो तीर कमान से निकल चुका है और भाजपा के पास अब बेहद कम विकल्प बचे हैं। सिद्धू का पार्टी छोड़ना स्पष्ट संकेत देता है कि अगले साल भाजपा, अकालियों के साथ ही चुनाव मैदान में उतरेगी। सिद्धू इस बात का विरोध कर रहे थे, जिसे नहीं सुना गया। 
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दूसरी ओर अकालियों की दुखती रग पकड़ने में आम आदमी पार्टी ने थोड़ी तेजी दिखाई। उड़ता पंजाब को लेकर छिड़ा विवाद इसी का संकेत था। इस ‌फिल्म ने अकालियों को काफी हद तक असहज कर दिया। वह विवाद शाहिद कपूर, करीना और आलिया जैसे कलाकारों के लिए भले ही तकलीफदेह था, लेकिन आम आदमी पार्टी के लिए सुकून देने वाला रहा। हालांकि, राजनीति में हर दिन एक जैसा नहीं होता। एक गलत फैसला शतरंज की पूरी बाजी पलटकर रख देता है। 'आप' की मौजूदा स्थिति कुछ ऐसी ही है, क्योंकि जरूरी नहीं कि सिद्धू को पार्टी में लाकर बड़ी जिम्मेदारी देना उनके लिए 'ऑल इज वेल' वाली स्थिति ले आए। यह कदम उल्टा भी पड़ सकता है, जैसा कि दिल्ली में किरण बेदी को लाने के बाद भाजपा के साथ हुआ था। इसमें तो शक नहीं कि सिद्धू ने कई दौर के मोल-भाव के बाद भाजपा से इस्तीफा दिया है। लेकिन अब भी चुनौती कम नहीं हैं। 


अगर सिद्धू को सीएम प्रोजेक्ट नहीं करेंगे तो क्या सिर्फ कैंपेन के लिए लाया जा रहा है? कैंपेन और चुनाव खत्म होने के बाद सिद्धू करेंगे क्या? जाहिर है पार्टी में उनका रोल क्या होगा, चुनाव के पहले और चुनाव के बाद, इसकी पटकथा पहले ही तैयार हो चुकी है। क्या सिद्धू को सीएम कैंडिडेट घोषित न करने के पीछे पार्टी में बगावत रोकना है? और अगर ऐसा है तो खुद को पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवियों की पार्टी मानने वाली 'आप' के जमीनी कार्यकर्ता क्या इतने मासूम हैं कि वे इस पैंतरे को नहीं समझ पाएंगे?   
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