अखिलेश के पास अब भी एक मौका है
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औद्योगीकरण को लेकर अखिलेश यादव सरकार के इरादों को सहारा देने के लिए भारत की तमाम अग्रणी कंपनियों ने पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश में कई बड़े निवेश करने का फैसला किया है। दरअसल हाल ही में उत्तर प्रदेश में संपन्न निवेशकों के सम्मेलन में राज्य सरकार ने व्यापार अवसरों, खासकर खाद्य प्रसंस्करण, कृषि, बुनियादी संरचना, उद्योग और सूचना तकनीकी क्षेत्रों की जानकारी दी। खबरों के मुताबिक एस्सेल समूह, रिलायंस जियो और फोर्टीस समेत 17 दूसरी कंपनियों ने राज्य में 39,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का निवेश करने के लिए कुछ शुरुआती समझौतों पर हस्ताक्षर किए। राज्य में पिछले कुछ समय में बलात्कार और हत्याओं की बर्बर घटनाओं को लेकर लोगों की नाराजगी झेल रहे मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा, 'बड़े निवेशों के ये वायदे उत्तर प्रदेश में विकास के अगले चरण की बुनियाद रखेंगे।'
उत्तर प्रदेश के लिए यह बेहद अच्छी खबर है, क्योंकि लंबे समय से राज्य में ऐसे निवेशों की दरकार थी। गौरतलब है कि 20 करोड़ से भी ज्यादा जनसंख्या वाले इस राज्य के तकरीबन 30 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। चाहे कोई भी सामाजिक सूचकांक हो, उत्तर प्रदेश नीचे के 10 राज्यों में ही आता है। ऐसे में, अगर निवेशों के ये वायदे उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को सक्रिय बनाते हुए नए रोजगारों का सृजन कर पाते हैं, तो यह वास्तव में राज्य के लिए खुशी का अवसर होगा।
हालांकि यह भी सच है कि आर्थिक चिंताओं के अलावा राज्य के सामने दूसरी कई महत्वपूर्ण चुनौतियां भी हैं। उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की हालत बेहद दयनीय है। हाल कि दिनों में बलात्कारों और हिंसक अपराधों की कई घटनाएं इसकी पुष्टि करते हैं। अमूमन यह देखा गया है कि इन हालात का सबसे ज्यादा असर प्रदेश के सबसे गरीब और कमजोर तबके पर पड़ता है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि आर्थिक विकास बेशक हो जाए, मगर उत्तर प्रदेश के उन युवाओं की सुध कौन लेगा, जो सामाजिक संरचना की निचली पायदान पर खड़े हैं, और डर के साये में अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। इनमें से कई तो डर के मारे घर से एक कदम भी बाहर नहीं रख पा रहे हैं, और कुछ ने तो स्कूल तक जाना बंद कर दिया है। ऐसे में आर्थिक विकास का फायदा उठाने में वे खुद को कैसे तैयार कर पाएंगे?
बदायूं के कटरा सआदतगंज में दो युवा लड़कियों का अपहरण के बाद गैंगरेप कर रस्सी से जिस तरह लटका दिया गया, उससे वाकई घृणा होती है, मगर उत्तर प्रदेश में तो ऐसी घटनाओं की भरमार है। पीड़ितों के बारे में कोई नहीं सोचता। आखिर उनके भी कुछ अरमान रहे होंगे, जिन्हें कुचल दिया गया। इनमें से एक लड़की के पिता ने एक रिपोर्टर को बताया कि उनकी बेटी को पढ़ना और काम करना बेहद पसंद था, और उसका सपना डॉक्टर बनने का था।
दबाव पड़ने पर उत्तर प्रदेश की सरकार त्वरित न्याय की वकालत करने लगी, कुछ गिरफ्तारियां हुईं, कुछ नौकरशाहों का तबादला किया गया और मामले को सीबीआई के सुपुर्द किया गया। मगर मूल समस्या पर किसी का ध्यान नहीं जाता। समाज में फैली जातिवादी सोच और कुशासन के चलते ही ऐसी घटनाएं बार-बार घटती हैं।
दूसरी ओर अखिलेश यादव हैं, जिनके पास ऐसी आलोचनाओं का नपा-तुला जवाब है। उनका कहना है कि बलात्कार तो हर राज्य में होते हैं, मगर वहां तो मुख्यमंत्री की फोटों के साथ खबरें नहीं चलाई जाती। यह सच है कि बलात्कार और दूसरे अपराध केवल उत्तर प्रदेश में नहीं होते। मगर इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ऐसे मामलों में उत्तर प्रदेश का रिकॉर्ड सबसे खराब है। तिस पर प्रदेश के प्रशासन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों का बलात्कार की हालिया घटनाओं को लेकर जैसा रुख रहा है, वह उन्हें कठघरे में खड़ा करने के लिए काफी है। आंकड़े भी प्रदेश की शर्मनाक स्थिति के गवाह हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की मानें, तो 2012 में पूरे देश में अपहरण के जितने मामले सामने आए, उनमें से 18.7 फीसदी यानी कुल 8.878 मामले उत्तर प्रदेश के थे।
2012 में जब अखिलेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, तब दूसरों की तरह उनसे मुझे भी काफी उम्मीदे थीं। वजह यह थी कि एक युवा पर्यावरण इंजीनियर आधुनिकता के संदेश के साथ भारत के सर्वाधिक जनसंख्या वाले और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाने वाले राज्य की बागडोर संभालने जा रहा था। दरअसल यह प्रदेश न केवल भारतीय राजनीति का केंद्र माना जाता है, बल्कि हालिया वर्षों में इसकी अर्थव्यवस्था ने विकास के चिह्न भी दिखाए हैं। मगर ब्राजील से भी ज्यादा जनसंख्या वाले इस राज्य में ऐसे लोगों की बड़ी तादाद है, जो अब भी गरीबी, अशिक्षा और बीमारियों से घिरे हुए हैं।
इसमें संदेह नहीं कि इतने महत्वपूर्ण राज्य को संभालना अखिलेश यादव के लिए बड़ी चुनौती है, मगर इसमें उनके लिए एक अवसर भी छिपा हुआ है। अफसोस कि वह अब तक इस अवसर को भुनाते नहीं दिखे। अपने क्षेत्र में हुई किसी भी दुर्घटना की जिम्मेदारी लेना एक अच्छे नेता की पहचान होता है। जो नेता होता है, वह अपनी गलतियां छिपाने के लिए दूसरों की कमियों का हवाला नहीं देता। सवाल यह है कि क्या प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री कानून-व्यवस्था की कमियों को दूर कर पाएंगे, क्या मानव विकास सूचकांक पर प्रदेश की स्थिति को मजबूत कर पाएंगे और क्या विकास के ग्राफ पर राज्य को जरूरी ऊंचाई दे पाएंगे। उम्मीदें अब भी कायम हैं।
जिंदगी साइकिल चलाने जैसी होती है। संतुलन बनाने के लिए बढ़ते रहना जरूरी होता है। समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के पास अब भी एक मौका है। उम्मीद है कि प्रदेश की कच्ची सड़कों पर अपने चुनाव चिह्न साइकिल की सवारी करते हुए अखिलेश यादव ने यह पाठ सीख लिया होगा। मगर अब बारी है इस पाठ को अंजाम देने की। यह जरूरी है राज्य को अंधकार और निराशा से निजात दिलाने के लिए।